
कभी बिहार के तालाबों और आर्द्रभूमियों तक सीमित दिखाई देने वाला मखाना अब देश के बड़े शहरों की दुकानों और ऑनलाइन बाजारों से होते हुए दुनिया की थाली तक पहुंच रहा है। हल्का, कुरकुरा और पोषण से भरपूर यह खाद्य पदार्थ अब केवल व्रत या पारंपरिक खान-पान का हिस्सा नहीं रह गया है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता ने इसे प्रीमियम स्नैक की श्रेणी में पहुंचा दिया है।
मखाने की इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका बिहार की है। देश के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी लगभग तीन-चौथाई बताई जाती है, जबकि वैश्विक आपूर्ति में उसकी हिस्सेदारी करीब 80–85 प्रतिशत तक मानी जाती है। खासकर उत्तर बिहार का कोसी, मिथिला और सीमांचल क्षेत्र इस फसल की अर्थव्यवस्था का केंद्र बन चुका है।
लेकिन मखाने की कहानी केवल उत्पादन की कहानी नहीं है। इसके पीछे पानी में उतरकर बीज निकालने वाले किसान हैं, पारंपरिक तरीके से उसकी पॉपिंग करने वाले श्रमिक हैं, छोटे कारोबारी हैं, नए ब्रांड हैं और अब इस पूरी मूल्य श्रृंखला को आधुनिक बनाने की कोशिश करती सरकारी संस्थाएं भी हैं।
यही वजह है कि मखाना आज एक पारंपरिक फसल से आगे बढ़कर कृषि, ग्रामीण रोजगार, खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात की नई संभावनाओं वाला क्षेत्र बनता दिखाई दे रहा है।
बिहार से निकला भारत का सुपरफूड
मखाना का वैज्ञानिक नाम Euryale ferox है। यह सामान्य खेतों में उगने वाली फसल से अलग एक जलीय पौधा है, जिसकी खेती उथले तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों में की जाती है। इसके बीज ही आगे चलकर प्रसंस्करण के बाद उस सफेद, हल्के और कुरकुरे मखाने का रूप लेते हैं जिसे आज देश-विदेश में स्नैक के रूप में खाया जाता है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक देश है। बिहार इसका सबसे बड़ा केंद्र है, जबकि पश्चिम बंगाल और असम में भी इसकी खेती होती है।
उत्तर बिहार के सुपौल, सहरसा और मधेपुरा सहित कोसी क्षेत्र तथा मिथिला और सीमांचल के अनेक इलाकों में मखाने की खेती लंबे समय से किसानों की आजीविका का हिस्सा रही है।
इस पारंपरिक ज्ञान का महत्व अब इसलिए बढ़ गया है क्योंकि वैश्विक खाद्य बाजार में उपभोक्ता तेजी से ऐसे उत्पादों की तलाश कर रहे हैं जो स्वाद के साथ स्वास्थ्य की जरूरत भी पूरी करें।
मखाना इस बदलाव के बिल्कुल अनुकूल बैठता है।
उत्पादन में दिखाई दे रही तेजी
भारत में मखाने का उत्पादन पिछले वर्षों में बढ़ा है। 2024-25 के अंतिम अनुमानों के अनुसार देश में मखाना उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन था। औसत उत्पादकता 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर रही।
2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमानों में उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन पहुंच गया और औसत उत्पादकता 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर आंकी गई।
इसी अवधि में बिहार का उत्पादन लगभग 60,000 मीट्रिक टन रहा। इससे स्पष्ट है कि भारत के मखाना उद्योग की रीढ़ आज भी बिहार ही है।
हालांकि उत्पादन में वृद्धि केवल खेती का क्षेत्र बढ़ने से नहीं हो रही। खेती के नए तरीकों, उन्नत किस्मों और बेहतर तकनीक ने भी इसमें भूमिका निभाई है।
तालाब आधारित पारंपरिक खेती के साथ अब फील्ड-सिस्टम खेती जैसे प्रयोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों का उपयोग भी उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तालाब से खेत तक बदलती खेती
मखाने की खेती की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक इसकी श्रम-प्रधान प्रकृति है।
पारंपरिक प्रणाली में बीजों को पानी के भीतर से एकत्र करना पड़ता है। इसके लिए किसान और श्रमिक तालाब में उतरते हैं। खेती के कई चरण आज भी काफी हद तक हाथ से किए जाते हैं।
यही कारण है कि मखाना केवल एक कृषि उत्पाद नहीं है। इसके साथ बड़ी संख्या में ग्रामीण श्रमिकों की आजीविका जुड़ी है।
लेकिन यही श्रम-प्रधान व्यवस्था इसकी लागत और उत्पादकता से जुड़ी चुनौती भी है। मशीनीकरण सीमित होने के कारण खेती और प्राथमिक प्रसंस्करण में समय और श्रम दोनों अधिक लगते हैं।
अब अनुसंधान संस्थान ऐसी तकनीकों पर काम कर रहे हैं जिनसे उत्पादन के साथ कटाई, सफाई, ग्रेडिंग और पॉपिंग की प्रक्रिया को भी अधिक कुशल बनाया जा सके।
‘मिथिला मखाना’ की अलग पहचान
मखाने को केवल एक कृषि उत्पाद के रूप में बेचने के बजाय उसकी भौगोलिक पहचान को भी मजबूत किया जा रहा है।
‘मिथिला मखाना’ को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग मिलना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। GI टैग किसी विशेष क्षेत्र से जुड़े उत्पाद की विशिष्ट पहचान और प्रतिष्ठा को मान्यता देता है।
मिथिला क्षेत्र में उत्पादित मखाने के लिए यह पहचान बाजार में अलग स्थान बनाने में मदद कर सकती है। इससे नकली या सामान्य उत्पादों से अलग पहचान, बेहतर ब्रांडिंग और प्रीमियम बाजारों तक पहुंच की संभावना बढ़ती है।
यदि GI पहचान का प्रभावी उपयोग किया जाए तो इसका लाभ केवल व्यापारियों को नहीं बल्कि उत्पादक किसानों तक भी पहुंच सकता है।
घरेलू बाजार ने बदली तस्वीर
मखाने की कहानी में निर्यात जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका घरेलू बाजार है।
भारत में हर साल 0.6 लाख मीट्रिक टन से अधिक मखाने का उत्पादन होता है। इसमें से लगभग 40 प्रतिशत यानी करीब 0.23–0.25 लाख मीट्रिक टन निर्यात किए जाने का अनुमान है। बाकी का बड़ा हिस्सा देश में ही खप जाता है।
2021-22 से 2024-25 के बीच घरेलू मखाना बाजार में लगभग 17–18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई।
स्वास्थ्यवर्धक स्नैक्स की लोकप्रियता, साफ-सुथरे यानी ‘क्लीन-लेबल’ उत्पादों की मांग और प्रीमियम खाद्य उत्पादों की ओर बढ़ते रुझान ने मखाने को नया ग्राहक वर्ग दिया है।
आज मखाना केवल बिहार या उत्तर भारत के पारंपरिक उपभोक्ता तक सीमित नहीं है। महानगरों में जिम जाने वाले युवाओं से लेकर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक परिवारों तक इसकी मांग बढ़ी है।
कीमतों में बड़ा बदलाव
मखाने के बाजार में सबसे दिलचस्प बदलाव कीमतों का है।
2020–22 के दौरान औसत कीमत लगभग 500 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास थी। 2025 तक यह बढ़कर लगभग 1,250 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई।
इस वृद्धि के पीछे कई कारण हैं—स्वास्थ्यवर्धक स्नैक की बढ़ती मांग, प्रीमियम ब्रांडिंग, सीमित आपूर्ति वृद्धि और संगठित खुदरा बाजार का विस्तार।
अनुमान है कि घरेलू मखाना बाजार 2029-30 तक 11,000–12,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
यह अनुमान इस बात की ओर संकेत करता है कि मखाने का भविष्य केवल कच्चे उत्पाद की बिक्री में नहीं, बल्कि उसके मूल्य संवर्धन में छिपा है।
खुला मखाना अब ब्रांडेड पैकेट में
मखाने के बाजार में सबसे बड़ा बदलाव शायद इसके स्वरूप में आया है।
जहां पहले खुले बाजार में साधारण मखाना बिकता था, वहीं अब फ्लेवर्ड मखाना, रेडी-टू-ईट स्नैक्स, मखाना आटा और अन्य मूल्यवर्धित उत्पाद बाजार में आ रहे हैं।
घरेलू बाजार में हर महीने लगभग 3,000–3,500 मीट्रिक टन पॉप्ड मखाने की खपत का अनुमान है। त्योहारों के दौरान यह मांग करीब 5,000 मीट्रिक टन तक पहुंच सकती है।
संगठित FMCG और स्नैक कंपनियां हर महीने लगभग 1,800–2,000 मीट्रिक टन की खपत वाली बाजार श्रेणी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। वहीं खुला और असंगठित खुदरा बाजार अभी भी करीब 1,200–1,400 मीट्रिक टन की मासिक खपत करता है।
इस बदलाव का अर्थ साफ है—मखाना अब सिर्फ कृषि उपज नहीं रहा। वह तेजी से ब्रांडेड कंज्यूमर प्रोडक्ट बन रहा है।
अमेरिका से जर्मनी तक पहुंच
मखाने की वैश्विक यात्रा भी तेजी से आगे बढ़ रही है।
2025 से पहले मखाने के उत्पादों के लिए अलग HSN कोड की अनुपस्थिति के कारण इसके विशिष्ट निर्यात आंकड़े स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं थे। 2025 में DGFT द्वारा पॉप्ड मखाना और अन्य मखाना उत्पादों के लिए अलग HSN कोड जारी किए जाने के बाद इस क्षेत्र के निर्यात को अधिक स्पष्ट रूप से मापा जा सका।
2025-26 में भारत ने 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया। इसका निर्यात मूल्य 19,296.08 लाख रुपये रहा।
भारत के प्रमुख बाजारों में अमेरिका सबसे आगे है। कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। कनाडा करीब 20 प्रतिशत और संयुक्त अरब अमीरात करीब 17 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं।
इन तीन बाजारों को मिलाकर कुल निर्यात का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा बनता है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
मात्रा नहीं, कीमत की भी है कहानी
मखाना निर्यात के आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण संकेत छिपा है।
अमेरिका, कनाडा और यूएई बड़े बाजार हैं, लेकिन वहां प्रति किलोग्राम औसत प्राप्ति कुछ छोटे बाजारों की तुलना में कम है।
अमेरिका में यह करीब 19.5 डॉलर प्रति किलोग्राम, कनाडा में 15.8 डॉलर और यूएई में 13.3 डॉलर प्रति किलोग्राम बताई गई है।
इसके विपरीत जर्मनी में औसत प्राप्ति करीब 26 डॉलर प्रति किलोग्राम, नेपाल में 21.6 डॉलर और ऑस्ट्रेलिया में करीब 21 डॉलर प्रति किलोग्राम है।
इससे भारत के सामने एक नई संभावना दिखाई देती है—निर्यात की मात्रा बढ़ाने के साथ बाजारों का रणनीतिक विविधीकरण।
यदि भारतीय कंपनियां प्रीमियम बाजारों में ब्रांडेड और मूल्यवर्धित मखाना पहुंचाने में सफल होती हैं तो निर्यात से होने वाली आय में मात्रा की तुलना में अधिक तेजी आ सकती है।
किसान से उपभोक्ता तक लंबी मूल्य श्रृंखला
मखाने की वास्तविक कीमत केवल खेत से निकलने वाले बीज में नहीं बनती।
कटाई, बीज संग्रह, सुखाना, सफाई, रोस्टिंग, पॉपिंग, ग्रेडिंग, पॉलिशिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात—हर चरण उत्पाद के मूल्य को बढ़ाता है।
समस्या यह है कि मूल्य श्रृंखला के शुरुआती चरणों में काम करने वाले किसानों और श्रमिकों को अंतिम उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत का कितना हिस्सा मिलता है।
यही वह क्षेत्र है जहां किसान उत्पादक संगठन यानी FPO, सहकारी मॉडल और स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
यदि किसान केवल कच्चा माल बेचने के बजाय प्रसंस्करण और पैकेजिंग से जुड़ते हैं तो मूल्य संवर्धन का बड़ा हिस्सा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रह सकता है।
सरकार की नई पहल
मखाना क्षेत्र के बढ़ते महत्व को देखते हुए केंद्र सरकार ने बजट 2025-26 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की।
15 सितंबर 2025 को बिहार में बोर्ड का औपचारिक शुभारंभ किया गया।
इसके साथ मखाना विकास के लिए केंद्रीय क्षेत्र योजना को भी मंजूरी दी गई। 2025-26 से 2030-31 तक इस योजना के लिए कुल 476.03 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
इस योजना का फोकस केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसमें अनुसंधान एवं नवाचार, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसानों का कौशल विकास, कटाई और कटाई के बाद की तकनीक, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, विपणन, निर्यात और गुणवत्ता नियंत्रण को शामिल किया गया है।
2025-26 के लिए 30 करोड़ रुपये और 2026-27 के लिए 90 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं।
अनुसंधान से निकलती नई तकनीक
मखाना क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।
राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र किसानों को उन्नत खेती और प्रसंस्करण तकनीकों से जोड़ने का काम कर रहा है। केंद्र ने उन्नत किस्मों, जल-कुशल खेती और मखाना-सह-मछली पालन जैसी प्रणालियों पर भी काम किया है।
किसानों को बेहतर बीज उपलब्ध कराने की दिशा में भी प्रयास हुए हैं। पिछले वर्षों में किसानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और विभिन्न संस्थानों को 15,824.1 किलोग्राम उन्नत मखाना बीज वितरित किए गए।
2012 से 2023 के बीच 3,000 से अधिक किसानों को उन्नत खेती, प्रसंस्करण और विपणन से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया।
ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए 24 उद्यमों को तकनीकी सहायता भी प्रदान की गई।
मशीनों से बदल सकता है श्रम-प्रधान उद्योग
मखाना उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक प्रसंस्करण की पारंपरिक व्यवस्था है।
बीज धोने, सुखाने, ग्रेडिंग और पॉपिंग जैसी प्रक्रियाओं में आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल अभी व्यापक स्तर पर नहीं हुआ है।
इसी दिशा में मखाना बीज वॉशर, बीज ग्रेडर, प्राथमिक रोस्टिंग मशीन, पॉपिंग मशीन और पॉप्ड मखाना ग्रेडर जैसी तकनीकें विकसित की गई हैं।
इन तकनीकों का व्यावसायिक उपयोग बढ़ने पर उत्पाद की गुणवत्ता में एकरूपता आ सकती है, श्रम की जरूरत कम हो सकती है और प्रसंस्करण की गति बढ़ सकती है।
लेकिन इससे भी बड़ा लाभ यह हो सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे प्रसंस्करण केंद्र स्थापित हों और किसान उत्पादन के साथ स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन से भी जुड़ें।
पोषण ने बदली मखाने की पहचान
मखाने को ‘सुपरफूड’ के रूप में प्रचारित किए जाने के पीछे उसका पोषण प्रोफाइल भी एक महत्वपूर्ण कारण है।
इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और आहार फाइबर के साथ मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसकी वसा मात्रा कम बताई जाती है और यह कोलेस्ट्रॉल-मुक्त खाद्य पदार्थ है।
यही गुण इसे स्वास्थ्य-केंद्रित खाद्य बाजार के लिए आकर्षक बनाते हैं।
हालांकि किसी भी खाद्य पदार्थ को किसी बीमारी के इलाज के रूप में देखना उचित नहीं है। मखाना संतुलित आहार का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसके स्वास्थ्य संबंधी दावों को वैज्ञानिक प्रमाण और व्यक्तिगत आहार आवश्यकताओं के संदर्भ में ही समझना चाहिए।
इसके बावजूद यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि वैश्विक खाद्य बाजार में कम वसा, पौध-आधारित और अपेक्षाकृत प्राकृतिक स्नैक्स की मांग बढ़ रही है और मखाना इस बदलती उपभोक्ता पसंद से लाभ उठा सकता है।
आगे की राह: सिर्फ निर्यात नहीं, ब्रांड इंडिया
भारत के सामने अब मखाना क्षेत्र को बड़े पैमाने पर विकसित करने का अवसर है।
लेकिन इसके लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा।
गुणवत्ता, मानकीकरण, आधुनिक प्रसंस्करण, पैकेजिंग, खाद्य सुरक्षा, निर्यात प्रमाणन और ब्रांडिंग पर भी समान ध्यान देना होगा।
अमेरिका और खाड़ी देशों जैसे बड़े बाजारों में भारतीय मखाने की उपस्थिति पहले से मजबूत है। अब यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अन्य प्रीमियम बाजारों में उच्च मूल्य वाले उत्पादों की संभावनाएं तलाशने की जरूरत है।
मखाने को केवल ‘बिहार का उत्पाद’ या ‘व्रत का भोजन’ बताने के बजाय इसे भारतीय प्रीमियम हेल्थ स्नैक के रूप में वैश्विक पहचान देने की रणनीति अधिक प्रभावी हो सकती है।
तालाब से वैश्विक बाजार तक
मखाने की कहानी दरअसल भारत के कृषि क्षेत्र में हो रहे एक बड़े बदलाव की छोटी-सी तस्वीर है।
एक पारंपरिक फसल, जिसे स्थानीय किसान पीढ़ियों से उगाते रहे, अब अनुसंधान, तकनीक, ब्रांडिंग और वैश्विक बाजार से जुड़ रही है।
इसके केंद्र में बिहार का किसान है, लेकिन संभावनाएं पूरे देश के लिए हैं।
यदि उत्पादन बढ़ाने के साथ किसान की हिस्सेदारी बढ़ती है, स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित होती हैं, युवाओं के लिए रोजगार पैदा होता है और भारतीय कंपनियां प्रीमियम वैश्विक बाजारों में मजबूत ब्रांड बनाती हैं, तो मखाना केवल एक सफल कृषि उत्पाद नहीं रहेगा।
वह भारत की उस नई कृषि अर्थव्यवस्था का प्रतीक बन सकता है, जिसमें परंपरा और तकनीक मिलकर स्थानीय उत्पाद को वैश्विक बाजार तक पहुंचाती हैं।
तालाबों से निकला यह छोटा-सा बीज अब दुनिया की बड़ी खाद्य अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बना रहा है। सवाल सिर्फ इतना है कि इस बढ़ती वैश्विक मांग का सबसे बड़ा लाभ किसे मिलेगा—बिचौलियों और बड़े ब्रांडों को, या उस किसान को जिसके हाथों से मखाने की यह यात्रा शुरू होती है।
यही आने वाले वर्षों में मखाना क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होगी।


