
भारत की खेती का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि खेत में कितनी जमीन है। आने वाले वर्षों में यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि उस जमीन के लिए पानी कितना उपलब्ध है और उसका इस्तेमाल कितनी कुशलता से किया जा रहा है।
देश में उपलब्ध जल संसाधनों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कृषि सिंचाई में इस्तेमाल होता है। इसके बावजूद शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा ही सिंचाई सुविधाओं से जुड़ा है। एक तरफ खेती की पानी की जरूरत बढ़ रही है, दूसरी तरफ कई क्षेत्रों में भूजल स्तर पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
ऐसे समय में ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ यानी पीडीएमसी केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि भारतीय कृषि के सामने खड़ी एक बड़ी चुनौती का तकनीकी जवाब बनकर उभर रही है।
इसका मूल विचार सरल है—पानी को खेत में फैलाने के बजाय सीधे फसल तक पहुंचाया जाए और हर बूंद का अधिकतम उपयोग किया जाए।
जुलाई 2026 तक देश में 115 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि को ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के तहत लाया जा चुका है।
लेकिन आंकड़ों के पीछे एक बड़ा सवाल भी है—क्या यह तकनीक वास्तव में किसान की लागत घटा रही है, उत्पादन बढ़ा रही है और उसकी आय में सुधार कर रही है?
उपलब्ध अध्ययनों और किसानों के अनुभव इस दिशा में सकारात्मक संकेत देते हैं।
पानी का संकट और खेती की मजबूरी
भारत की कृषि लंबे समय तक मानसून और पारंपरिक सिंचाई प्रणालियों पर निर्भर रही है। बाढ़ सिंचाई यानी खेत में बड़ी मात्रा में पानी छोड़ देना आज भी अनेक क्षेत्रों में आम तरीका है।
इस व्यवस्था में पौधे को जरूरत से अधिक पानी मिल सकता है और पानी का एक हिस्सा वाष्पीकरण, बहाव या जमीन में अनियंत्रित रिसाव के जरिए बर्बाद हो जाता है।
ड्रिप सिंचाई इस व्यवस्था से बिल्कुल अलग है।
इसमें पाइप और छोटे उत्सर्जकों के माध्यम से पानी धीरे-धीरे पौधे की जड़ तक पहुंचाया जाता है। यानी पानी वहां दिया जाता है जहां उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
स्प्रिंकलर प्रणाली में पानी को दबाव के साथ नोजल के जरिए फुहार के रूप में खेत में वितरित किया जाता है।
दोनों प्रणालियों का उद्देश्य एक ही है—कम पानी में अधिक प्रभावी सिंचाई।
‘प्रति बूंद अधिक फसल’ की यात्रा
आज जिस पीडीएमसी को कृषि जल दक्षता से जोड़ा जाता है, उसकी शुरुआत अचानक नहीं हुई।
जनवरी 2006 में सूक्ष्म सिंचाई के लिए केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में इसकी शुरुआत हुई। 2010-11 में इसे राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन का रूप दिया गया।
2014-15 में इसे राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के अंतर्गत ‘ऑन-फार्म वाटर मैनेजमेंट’ घटक में शामिल किया गया।
2015-16 से 2021-22 के दौरान यह ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ के नाम से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के प्रमुख घटकों में शामिल रही।
2022-23 से पीडीएमसी को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना यानी पीएम-आरकेवीवाई के तहत लागू किया जा रहा है।
इस लंबे सफर से यह स्पष्ट है कि सूक्ष्म सिंचाई को अब केवल एक सिंचाई तकनीक नहीं, बल्कि कृषि संसाधन प्रबंधन की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
115 लाख हेक्टेयर तक पहुंची सूक्ष्म सिंचाई
जुलाई 2026 तक पीडीएमसी के तहत देश में 115 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के दायरे में लाया गया।
यह देश के शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 8.11 प्रतिशत है।
2025-26 में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में सूक्ष्म सिंचाई के तहत सबसे अधिक क्षेत्र दर्ज किया गया।
इस योजना से करीब 12.30 लाख किसान लाभान्वित हुए। लाभार्थियों में लगभग 20 प्रतिशत महिलाएं थीं।
यह आंकड़ा बताता है कि सूक्ष्म सिंचाई अब केवल बड़े किसानों या आधुनिक कृषि उद्यमों तक सीमित नहीं रह गई है।
किसान के खेत में तकनीक का असर
आंध्र प्रदेश के पलनाडु के किसान एलएएम श्रीनिवास राव का उदाहरण सूक्ष्म सिंचाई के संभावित प्रभाव को समझने में मदद करता है।
उन्होंने अपने दो एकड़ के अम्लीय नींबू बागान में पारंपरिक बाढ़ सिंचाई की जगह ड्रिप सिंचाई अपनाई।
इसके साथ फर्टिगेशन यानी सिंचाई के पानी के साथ पोषक तत्व सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी की गई।
इसके बाद उनके खेत में उपज 90 से बढ़कर 105 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई।
खेती की लागत करीब 30 लाख रुपये से घटकर लगभग 2.4 लाख रुपये हुई और शुद्ध आय 1.5 लाख रुपये से बढ़कर 2.85 लाख रुपये तक पहुंची।
इस उदाहरण में सबसे महत्वपूर्ण बात केवल उत्पादन बढ़ना नहीं है। असली बदलाव पानी, उर्वरक और श्रम के अधिक नियंत्रित इस्तेमाल में दिखाई देता है।
हालांकि किसी एक किसान का अनुभव पूरे देश के किसानों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। मिट्टी, फसल, जलवायु, बाजार और तकनीक की गुणवत्ता के आधार पर परिणाम बदल सकते हैं। फिर भी यह उदाहरण सूक्ष्म सिंचाई की संभावनाओं को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार देता है।
फर्टिगेशन: पानी के साथ पोषण
सूक्ष्म सिंचाई की उपयोगिता केवल पानी बचाने तक सीमित नहीं है।
फर्टिगेशन में उर्वरकों को सिंचाई के पानी के साथ पौधे की जड़ तक पहुंचाया जाता है। इससे पोषक तत्वों को अधिक नियंत्रित तरीके से उपलब्ध कराया जा सकता है।
इसका फायदा यह है कि किसान आवश्यकता के अनुसार पानी और पोषक तत्व दोनों दे सकता है।
लेकिन यहां भी तकनीकी ज्ञान जरूरी है। गलत मात्रा में उर्वरक या गलत सिंचाई कार्यक्रम अपनाने पर अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकता।
इसलिए सूक्ष्म सिंचाई के साथ किसान प्रशिक्षण और फसल-विशिष्ट सलाह उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पाइप और उपकरण।
छोटे किसानों के लिए सब्सिडी का सहारा
सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली की शुरुआती लागत कई किसानों के लिए बड़ी बाधा हो सकती है।
इसीलिए पीडीएमसी के तहत प्रति लाभार्थी अधिकतम पांच हेक्टेयर तक वित्तीय सहायता का प्रावधान है।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए लागत का 55 प्रतिशत तक तथा अन्य किसानों के लिए 45 प्रतिशत तक सहायता दी जाती है।
पिछले तीन वर्षों में केंद्र सरकार की ओर से करीब 8,123.24 करोड़ रुपये की सहायता जारी की गई है।
कुछ राज्य अपनी ओर से अतिरिक्त सहायता भी देते हैं।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि तकनीक की लागत किसान को सूक्ष्म सिंचाई अपनाने से रोकने वाली सबसे बड़ी बाधा न बने।
सात साल बाद फिर सहायता
किसानों के लिए एक ही भूमि पर सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के लिए सात वर्ष बाद दोबारा वित्तीय सहायता प्राप्त करने का प्रावधान भी है।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिंचाई की पाइपलाइन, उत्सर्जक और अन्य उपकरण समय के साथ रखरखाव और प्रतिस्थापन की मांग कर सकते हैं।
लेकिन वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि सब्सिडी के साथ किसान को गुणवत्तापूर्ण उपकरण और स्थापना के बाद सेवा भी मिले।
सस्ती लेकिन खराब गुणवत्ता वाली प्रणाली किसान के लिए अतिरिक्त खर्च और परेशानी पैदा कर सकती है।
केवल ड्रिप नहीं, स्प्रिंकलर भी
सूक्ष्म सिंचाई को अक्सर ड्रिप सिंचाई से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन पीडीएमसी के अंतर्गत स्प्रिंकलर प्रणालियां भी महत्वपूर्ण हैं।
स्प्रिंकलर में पानी को दबाव के साथ नोजल के जरिए फुहार के रूप में खेत में वितरित किया जाता है। यह विशेष रूप से उन फसलों और परिस्थितियों में उपयोगी हो सकता है जहां पौधों का घनत्व अधिक हो या पूरे क्षेत्र में समान रूप से पानी पहुंचाना जरूरी हो।
पोर्टेबल स्प्रिंकलर, माइक्रो स्प्रिंकलर, मिनी स्प्रिंकलर, अर्ध-स्थायी प्रणाली और रेन-गन इसके अलग-अलग रूप हैं।
रेन-गन जैसी प्रणालियां कम समय में बड़े क्षेत्र में पानी पहुंचाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं।
इसलिए सूक्ष्म सिंचाई का चुनाव फसल, मिट्टी, खेत की बनावट और उपलब्ध जल स्रोत के अनुसार होना चाहिए।
पानी का भंडारण भी उतना ही जरूरी
ड्रिप सिस्टम लगा देने भर से जल संकट खत्म नहीं होता।
यदि खेत में पानी उपलब्ध ही नहीं है तो सबसे कुशल सिंचाई प्रणाली भी काम नहीं करेगी।
इसी कारण पीडीएमसी में जल संरक्षण और जल भंडारण को भी महत्व दिया जा रहा है।
डिग्गी, खेत तालाब और अन्य जल संचयन संरचनाओं को बढ़ावा देने का उद्देश्य यह है कि किसानों के पास सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को चलाने के लिए अपेक्षाकृत भरोसेमंद जल स्रोत उपलब्ध हो।
नई व्यवस्था में राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जल संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों में अधिक धन खर्च करने की स्वतंत्रता दी गई है।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में जल संकट हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं है। कहीं भूजल गिर रहा है, कहीं वर्षा कम है और कहीं पानी उपलब्ध होने के बावजूद उसका भंडारण नहीं हो पाता।
पीएम-आरकेवीवाई से जुड़ा बड़ा ढांचा
अक्टूबर 2024 में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना को पुनर्गठित कर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना बनाया गया।
इसका उद्देश्य कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में राज्य-विशिष्ट जरूरतों के आधार पर विकास को बढ़ावा देना है।
इस व्यापक ढांचे में पीडीएमसी के साथ कृषि मशीनीकरण, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, फसल विविधीकरण और कृषि स्टार्टअप से जुड़े घटक भी शामिल हैं।
इस मॉडल की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि राज्य अपनी स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुसार विभिन्न घटकों में संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं।
2025-26 में पीएम-आरकेवीवाई के लिए 8,957.72 करोड़ रुपये स्वीकृत या जारी किए गए, जिसमें पीडीएमसी के लिए 3,226.36 करोड़ रुपये शामिल थे।
सूक्ष्म सिंचाई का सबसे बड़ा लाभ: लागत में कमी
पानी की बचत सूक्ष्म सिंचाई का सबसे चर्चित लाभ है, लेकिन किसान के लिए आर्थिक प्रभाव उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
उपलब्ध स्वतंत्र अध्ययनों में सूक्ष्म सिंचाई से पानी, ऊर्जा, श्रम और उर्वरक के उपयोग में कमी के संकेत मिले हैं।
आर्थिक समीक्षा 2020-21 में 20 से 48 प्रतिशत तक पानी की बचत, 10 से 17 प्रतिशत ऊर्जा बचत, श्रम लागत में 30 से 40 प्रतिशत कमी और उर्वरक बचत में 11 से 19 प्रतिशत तक सुधार का उल्लेख किया गया था।
वहीं फसल उत्पादकता में 20 से 38 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई।
नीति आयोग के 2020-21 के मूल्यांकन में किसानों की आय में 10 से 69 प्रतिशत तक लाभ और जल उपयोग दक्षता में 30 से 70 प्रतिशत तक सुधार की जानकारी सामने आई।
ये आंकड़े अध्ययन-विशिष्ट हैं और हर किसान या हर फसल के लिए समान परिणाम की गारंटी नहीं देते। फिर भी वे इस तकनीक के आर्थिक महत्व की ओर मजबूत संकेत करते हैं।
भूजल संकट वाले क्षेत्रों के लिए ज्यादा जरूरी
भारत के कई कृषि क्षेत्रों में किसान ट्यूबवेल और बोरवेल पर निर्भर हैं।
जब भूजल का स्तर लगातार नीचे जाता है तो पानी निकालने के लिए ज्यादा ऊर्जा और ज्यादा लागत की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसे क्षेत्रों में सूक्ष्म सिंचाई का महत्व बढ़ जाता है क्योंकि कम पानी में फसल की जरूरत पूरी करने की कोशिश की जा सकती है।
पीडीएमसी में जल की कमी और गिरते भूजल स्तर वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देने का प्रावधान इसी चुनौती से जुड़ा है।
हालांकि यहां एक सावधानी भी जरूरी है—पानी बचाने वाली तकनीक अपने आप भूजल का पुनर्भरण नहीं करती।
यदि बचा हुआ पानी फिर अधिक क्षेत्र में सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने लगे तो कुल भूजल खपत में अपेक्षित कमी नहीं भी आ सकती। इसलिए सूक्ष्म सिंचाई के साथ जल बजट, फसल चयन और भूजल प्रबंधन को भी जोड़ना जरूरी है।
फसल का चुनाव भी पानी की नीति है
भारत में जल संकट से निपटने की चर्चा अक्सर सिंचाई तकनीक तक सीमित रहती है।
लेकिन यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसान कौन-सी फसल उगा रहा है।
यदि किसी क्षेत्र में पानी की भारी कमी है और वहां अत्यधिक जल मांग वाली फसल का विस्तार होता रहता है, तो केवल ड्रिप लगाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी।
भविष्य की कृषि नीति में तीन चीजों को साथ देखना होगा—
फसल का चुनाव, पानी की उपलब्धता और सिंचाई की दक्षता।
यही दृष्टिकोण भारत को वास्तव में जल-स्मार्ट कृषि की ओर ले जा सकता है।
महिला किसानों की बढ़ती भागीदारी
पीडीएमसी के लाभार्थियों में करीब 20 प्रतिशत महिलाएं हैं।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कृषि में महिलाओं की भूमिका अक्सर खेत के वास्तविक काम से लेकर पशुपालन और फसल प्रबंधन तक व्यापक होती है, लेकिन तकनीकी योजनाओं में उनकी भागीदारी हमेशा उतनी दिखाई नहीं देती।
सूक्ष्म सिंचाई के साथ महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय जानकारी और किसान समूहों से जोड़ने पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसका प्रभाव और व्यापक हो सकता है।
तकनीक के साथ सेवा भी जरूरी
सूक्ष्म सिंचाई की सफलता केवल सब्सिडी और उपकरण खरीदने से तय नहीं होगी।
ड्रिप लाइन बंद होना, फिल्टर की सफाई, पानी का दबाव, उत्सर्जकों की कार्यक्षमता और पाइपलाइन की मरम्मत जैसे मुद्दे नियमित रखरखाव मांगते हैं।
यदि किसान को स्थापना के बाद तकनीकी सहायता नहीं मिलती तो महंगी प्रणाली कुछ समय बाद बेकार भी हो सकती है।
इसलिए भविष्य की नीति में ‘सिस्टम लगाने’ से ज्यादा ‘सिस्टम चलाने’ पर ध्यान देना जरूरी है।
डिजिटल व्यवस्था से बढ़ सकती है पारदर्शिता
पीडीएमसी में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और डिजिटल कार्यान्वयन को महत्व दिया गया है।
इससे सब्सिडी के वितरण में पारदर्शिता बढ़ाने और किसानों तक वित्तीय सहायता पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
लेकिन डिजिटल व्यवस्था की सफलता के लिए यह भी जरूरी है कि ग्रामीण किसान आवेदन, सत्यापन और भुगतान प्रक्रिया को आसानी से समझ सके।
तकनीक तभी समावेशी बनती है जब उसका इस्तेमाल करने वाला किसान भी उसे आसानी से अपना सके।
खेती का भविष्य: ‘कम पानी’ नहीं, ‘सही पानी’
जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और भूजल संकट के बीच भारत को कृषि उत्पादन बनाए रखने के लिए जल दक्षता पर गंभीरता से काम करना होगा।
प्रति बूंद अधिक फसल की अवधारणा इसी जरूरत का उत्तर है।
ड्रिप सिंचाई पौधे की जड़ तक पानी पहुंचाती है। स्प्रिंकलर पानी का अधिक समान वितरण कर सकते हैं। फर्टिगेशन पानी के साथ पोषक तत्व पहुंचाने में मदद करता है। खेत तालाब और जल संचयन संरचनाएं पानी की उपलब्धता को मजबूत कर सकती हैं।
लेकिन इन सभी उपायों को अलग-अलग देखने के बजाय एक समेकित जल प्रबंधन प्रणाली के रूप में देखना होगा।
हर बूंद में भविष्य
भारतीय कृषि के सामने चुनौती केवल अधिक उत्पादन करने की नहीं है। उसे कम संसाधनों में अधिक उत्पादन करना है।
यही कारण है कि ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ जैसी योजनाओं का महत्व आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है।
115 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के दायरे में लाना निश्चित रूप से एक बड़ा विस्तार है, लेकिन भारत की विशाल कृषि भूमि को देखते हुए यात्रा अभी लंबी है।
अगली चुनौती होगी—छोटे किसानों तक पहुंच, गुणवत्तापूर्ण उपकरण, स्थापना के बाद सेवा, स्थानीय जल प्रबंधन, फसल विविधीकरण और किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण।
अगर इन पहलुओं को साथ लेकर आगे बढ़ा गया तो ड्रिप और स्प्रिंकलर केवल पानी बचाने की मशीनें नहीं रहेंगीं। वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लागत घटाने, उत्पादकता बढ़ाने और किसान की आय को अधिक स्थिर बनाने का माध्यम बन सकती हैं।
कृषि का भविष्य शायद इस बात में नहीं है कि खेत को कितना पानी दिया गया।
भविष्य इस बात में है कि दिया गया पानी पौधे तक कितनी कुशलता से पहुंचा और उससे कितनी फसल पैदा हुई।
यही है—प्रति बूंद अधिक फसल की असली कहानी।


