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हस्ताक्षर से बाजार तक: भारत के व्यापार समझौतों का असर

एफटीए के जरिए वैश्विक बाजारों में बढ़ती भारतीय पहुंच, निर्यात, रोजगार और सेवाओं के लिए खुल रहे नए रास्ते

किसी व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर होना अपने आप में मंजिल नहीं है। असली परीक्षा तब शुरू होती है, जब उस समझौते के जरिए किसी भारतीय कंपनी का उत्पाद विदेशी बाजार में पहुंचता है, किसी किसान को नया खरीदार मिलता है, किसी छोटे उद्यम को निर्यात का अवसर मिलता है या किसी भारतीय पेशेवर को दूसरे देश में काम करने का रास्ता खुलता है।

भारत की हालिया व्यापार नीति इसी दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। मुक्त व्यापार समझौतों यानी एफटीए का दायरा बढ़ाने के साथ अब जोर इस बात पर है कि इन समझौतों में मिली बाजार पहुंच का वास्तविक कारोबारी लाभ भारतीय निर्यातकों तक पहुंचे।

पिछले कुछ वर्षों में संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय देशों, ब्रिटेन, ओमान और अन्य साझेदारों के साथ हुए समझौतों ने भारत के व्यापारिक संबंधों को नया विस्तार दिया है। इनके शुरुआती परिणाम निर्यात के आंकड़ों, मूल प्रमाण-पत्रों के बढ़ते इस्तेमाल और विदेशी बाजारों में भारतीय उत्पादों की बढ़ती विविधता में दिखाई दे रहे हैं।

बढ़ता निर्यात, बढ़ती वैश्विक मौजूदगी

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात 863.1 अरब डॉलर तक पहुंचा। इसमें 441.8 अरब डॉलर का वस्तु निर्यात शामिल था। वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत में भी निर्यात की गति बनी रही। अप्रैल से जून 2026 के दौरान वस्तुओं और सेवाओं का संयुक्त निर्यात अनुमानतः 232.73 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 11.37 प्रतिशत अधिक है।

इस व्यापक निर्यात तस्वीर में एफटीए साझेदार देशों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने आसियान देशों को लगभग 38.42 अरब डॉलर और दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र यानी एसएएफटीए के अंतर्गत आने वाले देशों को लगभग 25.77 अरब डॉलर का माल निर्यात किया।

द्विपक्षीय एफटीए साझेदारों में संयुक्त अरब अमीरात सबसे बड़े बाजारों में रहा। भारत का यूएई को माल निर्यात 37.36 अरब डॉलर रहा। इसके बाद ब्रिटेन को 13.44 अरब डॉलर, सिंगापुर को 11.86 अरब डॉलर, नेपाल को 7.45 अरब डॉलर और ऑस्ट्रेलिया को 7.28 अरब डॉलर का निर्यात हुआ।

जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड और ओमान जैसे बाजार भी भारत के निर्यात नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

इन आंकड़ों का महत्व केवल व्यापार की मात्रा में नहीं है। यह इस बात का संकेत भी है कि भारतीय उत्पाद अलग-अलग क्षेत्रों और उपभोक्ता बाजारों में अपनी जगह बना रहे हैं।

यूएई: समझौते से कारोबार तक

भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता यानी सीईपीए 1 मई 2022 को लागू हुआ। इसे भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक पड़ाव माना गया, क्योंकि एक दशक में यह भारत का पहला पूर्ण मुक्त व्यापार समझौता था और इसकी बातचीत केवल 88 दिनों में पूरी हुई थी।

समझौते के बाद दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों में तेजी दिखाई दी। वित्त वर्ष 2025-26 में यूएई को भारत का माल निर्यात 37.36 अरब डॉलर रहा।

वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 100.06 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया। समझौते के लागू होने के कुछ ही वर्षों के भीतर यह स्तर हासिल होना दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच बढ़ती व्यापारिक निर्भरता को दर्शाता है।

अब दोनों देशों ने 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।

यूएई की भूमिका केवल एक खरीदार के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए। खाड़ी क्षेत्र, पश्चिम एशिया और अफ्रीकी बाजारों तक पहुंच बनाने में भी यूएई भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के साथ बढ़ता व्यापार

भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौता यानी ईसीटीए 29 दिसंबर 2022 को लागू हुआ। यह किसी विकसित अर्थव्यवस्था के साथ एक दशक से अधिक समय में भारत का पहला व्यापार समझौता था।

इसके बाद ऑस्ट्रेलिया को भारत का निर्यात लगातार बढ़ा। वित्त वर्ष 2020-21 में करीब 4 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में यह लगभग 7.28 अरब डॉलर हो गया। यानी कुछ वर्षों में निर्यात में 80 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई।

समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया ने अपनी 98.3 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर तत्काल शून्य शुल्क पहुंच उपलब्ध कराई। वर्ष 2026 से भारतीय निर्यात के लिए शून्य शुल्क पहुंच का दायरा और व्यापक हुआ।

ईसीटीए को अब एक और व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते की नींव के रूप में देखा जा रहा है। प्रस्तावित व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते में वस्तुओं के साथ सेवाओं, पेशेवरों की आवाजाही, डिजिटल व्यापार और मूल नियमों जैसे विषयों को भी अधिक विस्तार मिल सकता है।

एफटीए का लाभ तभी, जब निर्यातक उसका इस्तेमाल करे

व्यापार समझौता किसी देश के लिए बाजार का दरवाजा खोल सकता है, लेकिन उस दरवाजे से गुजरना निर्यातक की तैयारी पर निर्भर करता है।

एफटीए के तहत किसी उत्पाद को कम या शून्य सीमा शुल्क का लाभ तभी मिल सकता है, जब वह समझौते में निर्धारित मूल नियमों को पूरा करता हो। इसके लिए निर्यातक को यह प्रमाणित करना पड़ता है कि उत्पाद निर्धारित शर्तों के अनुरूप है।

यहीं पर ‘प्रेफरेंशियल सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन’ यानी तरजीही मूल प्रमाण-पत्र की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

यह प्रमाण-पत्र आयातक देश को यह भरोसा देता है कि संबंधित वस्तु एफटीए के नियमों के तहत पात्र है। इसके आधार पर उसे समझौते में निर्धारित कम या शून्य शुल्क का लाभ मिल सकता है।

इस व्यवस्था का बढ़ता इस्तेमाल यह संकेत देता है कि भारतीय निर्यातक अब एफटीए के प्रावधानों को केवल सरकारी दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि कारोबारी अवसर के रूप में देखने लगे हैं।

डिजिटल व्यवस्था से आसान होती प्रक्रिया

निर्यातकों के लिए एफटीए के लाभों का इस्तेमाल आसान बनाने में डिजिटल व्यवस्था की भूमिका भी बढ़ी है।

ई-सीओओ 2.0 के माध्यम से तरजीही और गैर-तरजीही मूल प्रमाण-पत्रों को डिजिटल तरीके से जारी करने की व्यवस्था की गई है। निर्यातक, अधिकृत एजेंसियां और वाणिज्य मंडल एक ही डिजिटल मंच से प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।

आधार आधारित इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर और क्यूआर कोड आधारित सत्यापन जैसी सुविधाएं दस्तावेजों की प्रमाणिकता और प्रक्रिया की गति बढ़ाने में मदद करती हैं।

नए व्यापार समझौतों में दस्तावेजीकरण को सरल बनाने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। भारत-ईएफटीए टीईपीए और भारत-यूके सीईटीए जैसे समझौतों में कुछ परिस्थितियों में निर्यातकों को स्व-घोषणा के माध्यम से मूल स्थान स्थापित करने की सुविधा दी गई है।

ब्रिटेन के साथ समझौते में 1,000 पाउंड से कम मूल्य के कुछ माल के लिए मूल प्रमाण से संबंधित दस्तावेजी आवश्यकताओं को भी सरल बनाया गया है। इसका फायदा खासतौर पर छोटे निर्यातकों और ई-कॉमर्स कारोबार को मिल सकता है।

‘ट्रेड कनेक्ट’ से छोटे निर्यातकों को सहारा

एफटीए की भाषा आम कारोबारी के लिए अक्सर जटिल होती है। किस उत्पाद पर कितना शुल्क है, किस बाजार में कौन-सी रियायत उपलब्ध है और उसके लिए कौन-से दस्तावेज चाहिए—इन सवालों के जवाब तलाशना छोटे उद्यमों के लिए आसान नहीं होता।

ट्रेड कनेक्ट जैसी डिजिटल पहल इसी अंतर को कम करने का प्रयास करती है। इसके माध्यम से निर्यातक विभिन्न बाजारों की टैरिफ व्यवस्था की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और एफटीए के संभावित लाभों को समझ सकते हैं।

इस तरह की व्यवस्था का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत के निर्यात आधार में एमएसएमई और छोटे कारोबारी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

बढ़ रही है उत्पादों की विविधता

एफटीए का प्रभाव केवल कुल निर्यात मूल्य से नहीं मापा जाना चाहिए। यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि कितने अलग-अलग उत्पाद विदेशी बाजारों तक पहुंच रहे हैं।

हालिया आंकड़ों में कई एफटीए बाजारों में निर्यात की जाने वाली टैरिफ लाइनों की संख्या में वृद्धि दिखाई देती है।

यूएई में यह संख्या 2021-22 के 7,546 से बढ़कर 2025-26 में 8,053 हो गई। ऑस्ट्रेलिया में 5,396 से बढ़कर 5,668 और मॉरीशस में 3,593 से बढ़कर 4,345 टैरिफ लाइन तक पहुंच गईं।

ओमान के मामले में भी मई 2026 के 2,879 से जून 2026 में 3,371 टैरिफ लाइन तक वृद्धि दर्ज की गई।

यह बदलाव बताता है कि व्यापार समझौते कुछ चुनिंदा उत्पादों तक सीमित नहीं रह रहे हैं। भारतीय निर्यातकों की कोशिश नए उत्पादों को भी विदेशी बाजारों में स्थापित करने की है।

श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए बड़ा अवसर

एफटीए का सबसे महत्वपूर्ण संभावित असर उन क्षेत्रों पर पड़ सकता है जहां बड़ी संख्या में रोजगार पैदा होता है।

वस्त्र, चमड़ा और जूते, कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य, समुद्री उत्पाद, रत्न एवं आभूषण, कालीन और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों के लिए विदेशी बाजारों में कम शुल्क का अर्थ प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त हो सकता है।

भारत में इन क्षेत्रों से बड़ी संख्या में छोटे उत्पादक, कारीगर और एमएसएमई जुड़े हैं। यदि इन्हें विदेशी खरीदारों तक सीधी पहुंच मिलती है तो एफटीए का लाभ केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित न रहकर स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।

यही वह बिंदु है जहां व्यापार नीति का संबंध रोजगार और क्षेत्रीय विकास से जुड़ता है।

सेवाओं का मोर्चा भी उतना ही महत्वपूर्ण

भारत की व्यापारिक ताकत केवल वस्तुओं में नहीं है। आईटी, वित्तीय सेवाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, व्यवसायिक सेवाएं और पेशेवर सेवाएं भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख ताकत बन चुकी हैं।

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का सेवा निर्यात 421.3 अरब डॉलर रहा। इसलिए नए एफटीए में सेवाओं और पेशेवरों की आवाजाही से जुड़े प्रावधान भारत के लिए विशेष महत्व रखते हैं।

न्यूजीलैंड के साथ हुए एफटीए में 5,000 तक कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए तीन वर्ष तक रहने का एक निर्धारित मार्ग उपलब्ध कराया गया है। आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा, निर्माण, आयुष, योग, पाक कला और संगीत जैसे क्षेत्र इसमें शामिल हैं।

यूरोपीय संघ के साथ समझौते में आईटी/आईटीईएस, पेशेवर, शिक्षा, वित्तीय, पर्यटन और निर्माण सेवाओं समेत 144 सेवा उप-क्षेत्रों को शामिल किया गया है।

ब्रिटेन के साथ समझौते में आईटी, स्वास्थ्य, वित्त और शिक्षा जैसे क्षेत्रों के पेशेवरों की आवाजाही से संबंधित प्रावधान हैं।

ईएफटीए देशों के साथ समझौता भी भारतीय सेवा प्रदाताओं के लिए महत्वपूर्ण अवसर खोलता है। स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन के विभिन्न सेवा उप-क्षेत्रों में भारतीय सेवा प्रदाताओं को बेहतर बाजार पहुंच मिली है।

एफटीए की अगली चुनौती—बाजार पहुंच को कारोबार में बदलना

भारत के लिए अब चुनौती केवल नए व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करना नहीं है। असली चुनौती यह है कि इन समझौतों से मिली रियायतों का इस्तेमाल कितने भारतीय कारोबारी कर पाते हैं।

कई छोटे निर्यातकों के लिए टैरिफ, मूल नियम, प्रमाण-पत्र, गुणवत्ता मानक और विदेशी बाजार की नियामकीय आवश्यकताएं अब भी जटिल विषय हैं। इसलिए एफटीए के साथ निर्यातकों को जानकारी, प्रमाणन, वित्त, लॉजिस्टिक्स और बाजार संपर्क उपलब्ध कराना उतना ही जरूरी है।

यदि ये बाधाएं कम होती हैं तो एफटीए का असर आंकड़ों से आगे जाकर जमीनी अर्थव्यवस्था में दिखाई दे सकता है।

2047 की ओर व्यापार नीति

भारत अब अपने व्यापार नेटवर्क को और विस्तृत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यूरोप, पश्चिम एशिया, एशिया-प्रशांत और अन्य क्षेत्रों के साथ व्यापार संबंधों को मजबूत करने के साथ नए समझौतों पर भी बातचीत जारी है।

यूरेशियन आर्थिक संघ, पेरू, चिली, इजरायल, कनाडा और मालदीव जैसे देशों एवं समूहों के साथ प्रस्तावित या जारी वार्ताएं भारत की व्यापार नीति के व्यापक होते दायरे को दिखाती हैं। साथ ही भारत-कोरिया सीईपीए और भारत-श्रीलंका ईटीसीए जैसे मौजूदा समझौतों को भी अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में काम हो रहा है।

आने वाले वर्षों में भारत की व्यापार नीति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होगा कि कितने समझौते हुए। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल होगा—इन समझौतों से कितने भारतीय उत्पाद विदेश पहुंचे, कितने नए निर्यातक जुड़े, कितने रोजगार बने और भारतीय सेवाओं को कितनी वैश्विक जगह मिली।

समझौते से अवसर तक

एफटीए की मेज पर हस्ताक्षर सरकारों के बीच होते हैं, लेकिन उनकी सफलता बाजार में तय होती है।

एक तरफ भारतीय कंपनियों को बड़े बाजारों में कम शुल्क का लाभ मिल सकता है, वहीं दूसरी ओर उन्हें गुणवत्ता, कीमत, समय पर आपूर्ति और वैश्विक मानकों की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा।

भारत के लिए यही अगला चरण है—व्यापार समझौतों को कागज से निकालकर कारोबार, निवेश, रोजगार और उद्यमिता में बदलना।

यदि ऐसा होता है तो एफटीए केवल आयात-निर्यात के आंकड़ों की कहानी नहीं रहेंगे। वे भारत के छोटे शहरों के उद्यमियों, किसानों, कारीगरों, स्टार्टअप और पेशेवरों को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं।

2047 के विकसित भारत की आर्थिक यात्रा में वैश्विक बाजारों तक भारतीय पहुंच का विस्तार इसी व्यापक तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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