
भारत में नारियल को सिर्फ एक फल मानना शायद उसके वास्तविक महत्व को सीमित कर देना होगा। इसे सदियों से ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता रहा है—ऐसा वृक्ष जिसके लगभग हर हिस्से का उपयोग किया जा सकता है। भोजन से लेकर पेय, तेल से लेकर रेशा, ईंधन से लेकर हस्तशिल्प और औद्योगिक कच्चे माल तक, नारियल भारतीय जीवन के अनेक हिस्सों में मौजूद है।
दक्षिण भारत के तटीय इलाकों में नारियल के पेड़ों से घिरे खेत हों या देश के दूसरे हिस्सों में तेजी से विकसित हो रहे नए बागान, यह फसल अब पारंपरिक कृषि से निकलकर एक बड़े आर्थिक क्षेत्र का रूप ले रही है।
करीब एक करोड़ किसानों सहित लगभग तीन करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नारियल क्षेत्र पर निर्भर हैं। इसलिए नारियल की कहानी केवल कृषि उत्पादन की कहानी नहीं है। यह ग्रामीण रोजगार, छोटे किसानों की आय, खाद्य प्रसंस्करण, निर्यात और स्थानीय उद्यमिता से भी जुड़ी हुई है।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि भारत अब केवल कच्चे नारियल या पारंपरिक उत्पादों का निर्यात करने वाला देश नहीं रहना चाहता। वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल का दूध, नारियल पानी और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों ने इस उद्योग को नई दिशा दी है।
तीन हजार साल पुरानी खेती, बदलता बाजार
भारत में नारियल की खेती का इतिहास लगभग तीन हजार वर्षों पुराना माना जाता है। पीढ़ियों से किसानों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसकी खेती और उपयोग की अपनी तकनीक विकसित की है।
आज भी नारियल उत्पादन का बड़ा हिस्सा छोटे और सीमांत किसानों से आता है। इसका अर्थ यह है कि नारियल क्षेत्र में होने वाला परिवर्तन सीधे ग्रामीण परिवारों की आय और रोजगार को प्रभावित करता है।
इस क्षेत्र का विस्तार अब उन राज्यों में भी दिखाई देने लगा है जहां नारियल पारंपरिक फसल नहीं रहा है।
छत्तीसगढ़ का बस्तर इसका एक उदाहरण है।
बस्तर में धान से नारियल तक का नया प्रयोग
बस्तर पठार के किसान लंबे समय से धान, मक्का, मोटे अनाज और लघु वनोपज पर निर्भर रहे हैं। लेकिन कोंडागांव स्थित नारियल विकास बोर्ड के प्रदर्शन-सह-बीज उत्पादन फार्म के प्रयासों ने कुछ किसानों को नारियल आधारित खेती की ओर आकर्षित किया।
बकावंड के 36 वर्षीय एमबीए स्नातक ईशांश सिंह राठौर की कहानी इस बदलाव को समझने का एक उदाहरण है।
किसान परिवार से आने के बावजूद उन्होंने कुछ समय कॉर्पोरेट क्षेत्र में काम किया। बाद में खेती की ओर लौटे और नारियल विकास बोर्ड से तकनीकी मार्गदर्शन लेकर अपने खेत में नारियल का व्यवस्थित मॉडल विकसित किया।
उन्होंने करीब 2,500 नारियल के पेड़ लगाए। इनमें बड़ी संख्या बौनी किस्मों की थी। लगभग 500 पेड़ों से उत्पादन शुरू हो चुका था।
लेकिन उनके मॉडल की खासियत केवल नारियल नहीं थी।
उन्होंने नारियल के नीचे और आसपास बहुस्तरीय खेती विकसित की। करीब 4,000 अनानास, 800 ड्रैगन फ्रूट, 1,000 आम और 600 सिट्रस के पेड़ों के साथ केला, अमरूद, पपीता, लीची, कॉफी, स्ट्रॉबेरी और मौसमी सब्जियां भी उगाईं।
इस मॉडल से नारियल से लगभग 5–6 लाख रुपये वार्षिक आय और अंतर-फसलों से लगभग 10 लाख रुपये की अतिरिक्त आय होने की जानकारी दी गई है।
इस तरह की खेती का सबसे बड़ा सबक यह है कि एक ही खेत से अलग-अलग मौसम और फसलों के जरिए आय के कई स्रोत बनाए जा सकते हैं।
यानी नारियल अकेला उत्पाद नहीं, बल्कि एकीकृत कृषि मॉडल का आधार भी बन सकता है।
वैश्विक उत्पादन में भारत सबसे आगे
भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक देश है।
2024-25 के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 21.9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में नारियल की खेती हुई और लगभग 20.30 अरब नारियल का उत्पादन हुआ। औसत उत्पादकता लगभग 9,249 नारियल प्रति हेक्टेयर रही।
वैश्विक स्तर पर भारत की हिस्सेदारी उत्पादन में करीब 31.24 प्रतिशत बताई गई है।
हालांकि खेती के क्षेत्रफल के लिहाज से भारत तीसरे स्थान पर है। यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि भारत केवल बड़े क्षेत्र के कारण ही नहीं, बल्कि उत्पादकता के कारण भी वैश्विक उत्पादन में आगे है।
देश के भीतर केरल नारियल खेती के क्षेत्रफल के मामले में सबसे आगे है। करीब 7.54 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में नारियल की खेती होती है। तमिलनाडु उत्पादन में अग्रणी है, जबकि आंध्र प्रदेश उत्पादकता के मामले में सबसे आगे है।
इस भौगोलिक विविधता ने भारत को नारियल के लिए एक मजबूत उत्पादन आधार दिया है।
नारियल अब निर्यात की नई कहानी लिख रहा है
कभी भारत से नारियल उत्पादों का निर्यात मुख्य रूप से तेल, सूखे नारियल, कच्चे नारियल और नारियल के खोल से बने पारंपरिक उत्पादों तक सीमित था।
अब तस्वीर बदल रही है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के नारियल उत्पादों का निर्यात बढ़कर 7,038.35 करोड़ रुपये, यानी लगभग 794.70 मिलियन डॉलर हो गया।
यह 4,349.03 करोड़ रुपये के पिछले स्तर की तुलना में करीब 62 प्रतिशत की वृद्धि है।
यदि लंबी अवधि पर नजर डालें तो बदलाव और बड़ा दिखाई देता है। 2001-02 में नारियल उत्पादों का निर्यात केवल करीब 25.3 करोड़ रुपये था।
दो दशक से अधिक समय में निर्यात का यह विस्तार बताता है कि भारत की नारियल अर्थव्यवस्था अब केवल घरेलू खपत पर निर्भर नहीं रही।
पारंपरिक नारियल से मूल्यवर्धित उत्पाद तक
वैश्विक खाद्य बाजार में उपभोक्ता अब केवल कच्चे कृषि उत्पाद नहीं खरीद रहे। वे ऐसे उत्पाद चाहते हैं जिन्हें सीधे इस्तेमाल किया जा सके और जिनमें सुविधा, गुणवत्ता और स्वास्थ्य जैसे पहलू शामिल हों।
नारियल उद्योग ने इसी बदलाव को अवसर में बदलना शुरू किया है।
वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल का दूध, नारियल पानी, कद्दूकस किया हुआ नारियल और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे उत्पादों ने निर्यात टोकरी का विस्तार किया है।
विशेष रूप से एक्टिवेटेड कार्बन एक महत्वपूर्ण निर्यात उत्पाद बनकर उभरा है। नारियल के खोल से तैयार किया जाने वाला यह उत्पाद कई औद्योगिक और फिल्ट्रेशन संबंधी उपयोगों में काम आता है।
इस तरह नारियल का वह हिस्सा, जिसे पहले कम मूल्य का उप-उत्पाद समझा जा सकता था, अब औद्योगिक मूल्य श्रृंखला का हिस्सा बन रहा है।
खाड़ी से यूरोप और अमेरिका तक
भारतीय नारियल उत्पादों के बाजार भी बदल रहे हैं।
मध्य पूर्व लंबे समय से प्रमुख बाजार रहा है, लेकिन अब अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ी है।
पिछले वर्षों में अमेरिका, यूएई, श्रीलंका, जर्मनी, रूस, तुर्किये, बेल्जियम, ब्रिटेन और नीदरलैंड जैसे देश महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार बने हैं।
यह बाजार विविधीकरण भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता वैश्विक कीमतों और मांग में उतार-चढ़ाव के दौरान जोखिम बढ़ा सकती है।
किसान की आय के लिए जरूरी है मजबूत मूल्य श्रृंखला
किसान के लिए नारियल का आर्थिक महत्व तभी बढ़ेगा जब उत्पादन से लेकर बाजार तक की पूरी श्रृंखला मजबूत हो।
यानी गुणवत्तापूर्ण पौधा, वैज्ञानिक खेती, रोग नियंत्रण, सिंचाई, कटाई, प्राथमिक प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग और बाजार—हर चरण में सुधार जरूरी है।
यहीं नारियल विकास बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
12 जनवरी 1981 को स्थापित नारियल विकास बोर्ड कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत काम करता है। इसका मुख्यालय कोच्चि में है और यह 22 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में नारियल क्षेत्र के विकास से जुड़ी गतिविधियों में भूमिका निभाता है।
गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, नए क्षेत्रों में खेती, उत्पादकता बढ़ाना, कीट एवं रोग प्रबंधन और मूल्यवर्धित उत्पादों को बढ़ावा देना इसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में हैं।
2025-26 के दौरान बोर्ड के कार्यक्रमों के लिए 147.21 करोड़ रुपये जारी किए गए।
अच्छी खेती की शुरुआत अच्छे पौधे से
नारियल के मामले में गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री का महत्व बहुत अधिक है। खराब पौधे या अनुपयुक्त किस्म का प्रभाव वर्षों तक किसान की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
इसीलिए बीज उत्पादन फार्म, सीड गार्डन और नर्सरियों की स्थापना तथा उनके प्रमाणीकरण पर जोर दिया जा रहा है।
2025-26 में बोर्ड के 11 प्रदर्शन-सह-बीज उत्पादन फार्मों से करीब 2.41 लाख गुणवत्तापूर्ण नारियल पौधे तैयार किए गए।
सार्वजनिक क्षेत्र की नर्सरियों को दी गई सहायता के माध्यम से भी लाखों पौधे तैयार किए गए, जिनसे नए क्षेत्रों में नारियल बागान विकसित करने की क्षमता बढ़ी है।
नए क्षेत्रों में खेती का विस्तार
नारियल की खेती को पारंपरिक क्षेत्रों से आगे ले जाने की कोशिश भी हो रही है।
नई खेती के लिए किसानों को प्रति हेक्टेयर 56,000 रुपये तक की वित्तीय सहायता दो समान वार्षिक किस्तों में उपलब्ध कराई जाती है। योजना में न्यूनतम और अधिकतम पात्र क्षेत्र भी निर्धारित है।
2024-25 में करीब 2,979 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को नारियल खेती के तहत लाया गया और 13,068 किसान इससे लाभान्वित हुए।
2025-26 में भी केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, असम और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में करीब 2,175 हेक्टेयर नया क्षेत्र नारियल खेती में जोड़ा गया।
यह विस्तार बताता है कि नारियल अब केवल समुद्र तटीय राज्यों की फसल नहीं रहना चाहता।
पुराने पेड़ों की समस्या और बागानों का कायाकल्प
नारियल के सामने एक दूसरी बड़ी चुनौती पुराने और अनुत्पादक पेड़ों की है।
कई पारंपरिक नारियल बागानों में पेड़ों की उम्र बढ़ने, रोगों और उत्पादकता में कमी का असर दिखाई देता है। ऐसे बागानों को नए पौधों से बदलना और स्वस्थ पेड़ों की उत्पादकता बढ़ाना आवश्यक है।
इसी उद्देश्य से पुनररोपण और जीर्णोद्धार कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
पिछले पांच वर्षों में करीब 25,517 हेक्टेयर क्षेत्र इस कार्यक्रम के तहत कवर किया गया। 2025-26 में करीब 1,672 हेक्टेयर क्षेत्र का जीर्णोद्धार किया गया।
कोपरा का एमएसपी: किसान के लिए सुरक्षा कवच
नारियल किसान की आय में बाजार कीमतों का बड़ा प्रभाव पड़ता है। कीमतों में गिरावट के दौरान किसानों को सुरक्षा देने के लिए कोपरा को न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था में शामिल किया गया है।
मिलिंग कोपरा और बॉल कोपरा दोनों के लिए एमएसपी निर्धारित किया जाता है।
2026 सीजन के लिए मिलिंग कोपरा का एमएसपी 12,027 रुपये प्रति क्विंटल और बॉल कोपरा का 12,500 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है।
नेफेड और एनसीसीएफ को कोपरा खरीद के लिए केंद्रीय नोडल एजेंसियों के रूप में भूमिका दी गई है।
एमएसपी की व्यवस्था किसानों को बाजार में न्यूनतम मूल्य सुरक्षा देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, हालांकि इसका वास्तविक लाभ इस बात पर भी निर्भर करता है कि खरीद व्यवस्था कितनी प्रभावी और किसानों के लिए कितनी सुलभ है।
नारियल से जुड़ा रोजगार: पेड़ पर चढ़ने से उद्यमिता तक
नारियल की खेती की एक अनदेखी समस्या श्रमिकों की उपलब्धता है।
पेड़ पर चढ़कर नारियल तोड़ना और बागान की देखभाल करना कौशल आधारित काम है। युवा पीढ़ी के दूसरे रोजगारों की ओर जाने से कई क्षेत्रों में प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी महसूस होती है।
नारियल विकास बोर्ड का ‘फ्रेंड्स ऑफ कोकोनट ट्री’ यानी FoCT कार्यक्रम इसी चुनौती से जुड़ा है।
इसके तहत युवाओं को पेड़ पर चढ़ने, पौध संरक्षण और संबंधित कार्यों के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। 2024-25 में देशभर में 378 पेड़ चढ़ने वालों को प्रशिक्षित किया गया।
इसके बाद प्रशिक्षण को केवल व्यक्तिगत कौशल तक सीमित न रखकर ‘कोकोमित्र’ जैसे समूह आधारित मॉडल की ओर ले जाने का प्रयास किया गया है। प्रशिक्षित श्रमिकों को 6–10 सदस्यों की इकाइयों में संगठित करके किसानों को नियमित सेवाएं उपलब्ध कराने का उद्देश्य है।
यह मॉडल रोजगार और कृषि सेवा—दोनों जरूरतों को एक साथ संबोधित कर सकता है।
नारियल के खोल और रेशे में भी कारोबार
नारियल उद्योग की खासियत यह है कि इसमें ‘कचरा’ भी अक्सर कच्चा माल बन सकता है।
खोल, रेशा और लकड़ी से हस्तशिल्प, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और औद्योगिक उत्पाद बनाए जा सकते हैं।
इसी दिशा में नारियल हस्तशिल्प प्रशिक्षण और ‘केरा कौशल केंद्र’ जैसी पहलें युवाओं को नए रोजगार और उद्यमिता से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं।
यदि स्थानीय स्तर पर इन उत्पादों की डिजाइन, गुणवत्ता, पैकेजिंग और ई-कॉमर्स से जोड़ने की व्यवस्था मजबूत होती है तो नारियल के उप-उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकते हैं।
नीरा से जुड़ी नई संभावना
नारियल के पुष्पक्रम से निकलने वाला गैर-किण्वित रस नीरा भी मूल्यवर्धन की संभावनाओं वाला उत्पाद है।
इसकी सुरक्षित निकासी और प्रसंस्करण के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। यदि इसे गुणवत्ता मानकों, आधुनिक पैकेजिंग और प्रभावी बाजार रणनीति से जोड़ा जाए तो नीरा ग्रामीण स्तर पर एक अलग खाद्य एवं पेय उद्योग को जन्म दे सकता है।
2026-27: नारियल संवर्धन पर नया जोर
केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित ‘नारियल संवर्धन योजना’ ने इस क्षेत्र को एक नई नीति दिशा दी है।
इसका फोकस गुणवत्तापूर्ण पौधों के बड़े पैमाने पर उत्पादन, नए क्षेत्रों में खेती के विस्तार, पुराने बागानों के पुनररोपण, समग्र फसल स्वास्थ्य प्रबंधन और एकीकृत प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना पर है।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि नारियल क्षेत्र की अगली चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है। जलवायु परिवर्तन, रोग, बढ़ती श्रम लागत और वैश्विक बाजार में गुणवत्ता मानकों जैसी चुनौतियां भी सामने हैं।
इसलिए आने वाले समय में उत्पादकता के साथ टिकाऊ खेती पर जोर देना जरूरी होगा।
असली अवसर मूल्य संवर्धन में
भारत के पास नारियल उत्पादन की ताकत है। लेकिन वैश्विक बाजार में केवल उत्पादन क्षमता से प्रतिस्पर्धा नहीं जीती जा सकती।
असली मूल्य उस समय बनता है जब किसान के नारियल से तेल, दूध, पानी, एक्टिवेटेड कार्बन, कॉयर, हस्तशिल्प या कोई अन्य मूल्यवर्धित उत्पाद बनता है।
यही कारण है कि किसान उत्पादक संगठन, सहकारी समितियां और स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयां इस क्षेत्र के भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
यदि किसान समूह अपनी उपज को सामूहिक रूप से बाजार में उतारें और स्थानीय स्तर पर प्राथमिक प्रसंस्करण करें तो बिचौलियों पर निर्भरता कम हो सकती है और सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है।
नारियल की अगली कहानी
भारत के नारियल क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है—विविध कृषि क्षेत्र, विविध उत्पाद और विविध उपयोग।
एक ओर केरल और तमिलनाडु जैसे पारंपरिक उत्पादक राज्य हैं, तो दूसरी ओर बस्तर जैसे नए क्षेत्र हैं। एक ओर पूजा और घरेलू भोजन में इस्तेमाल होने वाला पारंपरिक नारियल है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकने वाला वर्जिन कोकोनट ऑयल और एक्टिवेटेड कार्बन।
यही परिवर्तन इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण बनाता है।
भारत के लिए अगला लक्ष्य केवल दुनिया का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक बने रहना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य यह भी होना चाहिए कि नारियल से बनने वाले उच्च मूल्य वाले उत्पादों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़े और उसका लाभ किसानों तक पहुंचे।
‘कल्पवृक्ष’ से ग्लोबल ब्रांड तक
नारियल को सदियों से भारत में कल्पवृक्ष कहा गया है। इसकी उपयोगिता ने उसे संस्कृति में सम्मान दिया और कृषि ने उसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़े रखा।
अब वैश्विक बाजार उसे एक नई पहचान दे रहा है।
भारत के सामने चुनौती यह है कि इस बदलाव का लाभ केवल निर्यातक कंपनियों या बड़े ब्रांडों तक सीमित न रहे। यदि किसान को बेहतर पौधा, बेहतर तकनीक, उचित मूल्य, प्रसंस्करण की सुविधा और बाजार की सीधी पहुंच मिलती है, तभी नारियल की वैश्विक सफलता ग्रामीण समृद्धि में बदलेगी।
आज नारियल के पेड़ पर लटकता हर फल सिर्फ एक कृषि उपज नहीं है। उसमें खाद्य उद्योग, ग्रामीण रोजगार, महिला और युवा उद्यमिता, निर्यात और स्थानीय अर्थव्यवस्था की संभावनाएं छिपी हैं।
यानी भारत का ‘जीवन वृक्ष’ अब अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नई शाखा विकसित कर रहा है।



