राष्ट्रीय

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कौन एक्शन की तैयारी मां अहैं राहुल गांधी? जानव धारा 16 कय कानूनी कवच

देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव लावे जा रहा अहै। कांग्रेस से जुड़े सूत्रों यह जानकारी दीन्ही अहै। फिलहाल कानूनी जानकारों से बात करके इस प्रस्ताव का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा अहै। इससे पहले बजट सत्र मां भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटावै की कोशिश कीन्ही रही। लेकिन उनके नोटिस को राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के स्पीकर ने अस्वीकार कर दीन्हा रहा।

आपको बता दें कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखवीर संधू पिछले 10 महीने मां 14 बार लिखित रूप से चुनाव आयोग की गतिविधियों और फैसलों पर गंभीर असहमतियां जता चुके अहैं। इसमें बंगाल चुनाव के दौरान ट्रिब्यूनल के सामने आयोग के द्वारा की गई अपील, गोवा के जायज वोटरों को ना जोड़ पाना क्योंकि रोल बैक का ऑप्शन नहीं अहै सॉफ्टवेयर मां। नए वोटर के लिए अनिवार्य फॉर्म सिक्स मां जोड़ी गई नई शर्तें और सॉफ्टवेयर का दिल्ली से नियंत्रण और डाटा के सेंट्रलाइजेशन जैसे कई मसले शामिल अहैं।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पहली कोशिश बंगाल चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व मां विपक्षी दलों ने कीन्ही रही। 12 मार्च को संसद के दोनों सदनों मां मुख्य चुनाव आयुक्त को हटावै के लिए नोटिस जमा किए गए थे। लोकसभा वाले नोटिस पर 130 जबकि राज्यसभा वाले नोटिस पर 63 सांसदों ने दस्तखत किए थे। नियम के मुताबिक महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा मां कम से कम 100 और राज्यसभा मां कम से कम 50 सांसदों के दस्तखत जरूरी अहैं। यानी विपक्ष के पास संख्या बल पूरा रहा।

विपक्ष का आरोप अहै कि ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के बाद से चुनाव आयोग अपनी स्वतंत्रता और संवैधानिक निष्ठा बनाए रखे मां विफल रहा अहै। मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूचियों के रखरखाव और देश भर मां स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के विस्तार को लेकर भी आयोग के रवैया पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए। इन दोनों के बाद सदन मां चर्चा हो सकती थी पर हो नहीं पाई और इसकी वजह यह रही कि 6 अप्रैल को राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने नोटिस खारिज कर दीन्हा। उन्होंने अपने आदेश मां लिखा कि विपक्ष की तरफ से लगाए गए आरोप पहली नजर मां संविधान के अनुच्छेद 324(5) और 124 के तहत कदाचार नहीं अहैं।

लोकसभा मां स्पीकर ओम बिरला ने भी ऐसे ही तर्क देते हुए नोटिस अस्वीकार किया। यह तो पिछली बार की बात रही, इस दफा क्या होगा? यह जानने के लिए पहले आप यह समझें कि चुनाव आयोग की नियुक्ति और हटावै के नियम क्या अहैं?

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती अहै? ECI (भारत निर्वाचन आयोग) पर देश मां निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी होती अहै। संविधान का अनुच्छेद 324 और ‘CEC और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ CEC की नियुक्ति, कार्यकाल और उन्हें हटावै से जुड़े प्रावधान तय करते अहैं। राष्ट्रपति, CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यों वाली एक सिलेक्शन कमिटी की सिफारिश पर करते अहैं। इस कमिटी मां प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (LoP) और केंद्रीय कैबिनेट का एक सदस्य शामिल होता अहै।

2023 के कानून के अनुसार, जिन लोगों की नियुक्ति की जाती अहै, उन्होंने पहले सरकार मां सेक्रेटरी-लेवल के पदों पर काम किया हो और वे “ईमानदार व्यक्ति हों, जिन्हें चुनाव के मैनेजमेंट और संचालन का ज्ञान और अनुभव हो।” ये नियुक्तियाँ छह साल के कार्यकाल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, के लिए की जाती अहैं। CEC को वही सेवाएँ और आर्थिक लाभ मिलते अहैं जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को मिलते अहैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता अहै? संविधान के अनुच्छेद 324(5) मां कहा गया अहै कि CEC को पद से केवल “उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता अहै, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता अहै।” यह बात 2023 के एक्ट की धारा 11(2) मां भी कही गई अहै। आर्टिकल मां आगे कहा गया अहै कि मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया जाएगा।

ECI को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए, CEC को हटावै की प्रक्रिया को जानबूझकर बहुत मुश्किल रखा गया अहै। संविधान के आर्टिकल 124(4) के अनुसार, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज को हटावै की प्रक्रिया बताई गई अहै, उन्हें केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता अहै। गलत व्यवहार मां कोई भी भ्रष्ट तरीका या पद का दुरुपयोग शामिल हो सकता अहै।

CEC को हटावै की प्रक्रिया शुरू करने के लिए, दोनों सदनों के सदस्यों को गलत व्यवहार या अक्षमता का साफ आरोप लगाते हुए एक प्रस्ताव का नोटिस लाना होगा। महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए, लोकसभा मां कम से कम 100 और राज्यसभा मां 50 सांसदों के हस्ताक्षर ज़रूरी अहैं। अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता अहै, तो आरोपों की सच्चाई की जाँच के लिए एक समिति बनाई जाती अहै।

हटावै के प्रस्ताव को दोनों सदनों के कुल सदस्यों मां से बहुमत का समर्थन मिलना चाहिए और संसद के दोनों सदनों मां “मौजूद और वोट देने वाले” सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से यह पास होना चाहिए। एक बार सफलतापूर्वक पास हो जाने पर, राष्ट्रपति CEC को हटावै का आदेश देते अहैं।

क्या पद पर रहते हुए CEC को गिरफ्तार किया जा सकता अहै? मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग उठ रही अहै, लेकिन भारत के 2023 के चुनाव कानून की धारा 16 एक अलग कानूनी सवाल खड़ा करती अहै: आधिकारिक कार्यों को लेकर दीवानी और आपराधिक कार्यवाही से मुख्य चुनाव आयुक्त को क्या सुरक्षा प्राप्त अहै?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग के भीतर एक नए विवाद के बीच इस प्रावधान की फिर से जाँच शुरू हो गई अहै। रिपोर्ट मां बताया गया अहै कि चुनाव आयुक्त सुखवीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) से संबंधित निर्णयों और आदेशों पर 10 महीनों मां कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति जताई थी।

धारा 16 क्या कहती अहै? मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 का शीर्षक ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का संरक्षण’ अहै। कोई भी अदालत किसी भी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कोई दीवानी (सिविल) या आपराधिक (क्रिमिनल) कार्यवाही न तो स्वीकार करेगी और न ही उसे आगे जारी रखेगी, जो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) या चुनाव आयुक्त (EC) अहै या पहले कभी इस पद पर रहा हो।

यह छूट या संरक्षण उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य, कदम या कहे गए किसी भी शब्द के लिए मिलता अहै, बशर्ते वह अपने आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन के दौरान किया गया हो। इसलिए, यह सुरक्षा सिर्फ़ उस समय तक सीमित नहीं अहै जब वह व्यक्ति पद पर हो। लेकिन धारा 16 यह नहीं कहती कि मौजूदा या पूर्व चुनाव आयुक्त के हर काम को सुरक्षा मिलती अहै।

क्या धारा 16 का मतलब यह अहै कि ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता? धारा 16 मां गिरफ्तारी, पुलिस जाँच या पूछताछ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया अहै। इसे अदालतों द्वारा दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू करने या जारी रखे जाने के संदर्भ मां तैयार किया गया अहै। इसलिए, इस प्रावधान को गिरफ्तारी पर अपने-आप लगी रोक बताना सही नहीं होगा।

कानून मां धारा 16 कैसे शामिल हुई? जब यह बिल पहली बार पेश किया गया था, तब इसमें यह सुरक्षा शामिल नहीं थी। ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त बिल, 2023’ को 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा मां पेश किया गया था। 12 दिसंबर को बिल पर विचार-विमर्श के दौरान, सरकार ने एक नया क्लॉज़ जोड़ने के लिए संशोधन पेश किया, जिसे बाद मां कानून बनने पर धारा 16 बनाया गया।

Related Articles

Back to top button