जन मन: शिक्षा मंत्री इस्तीफा दिहिन, का शिक्षा व्यवस्था सुधर गवा? इहै तरे का ज्ञानेश कुमार कय इस्तीफा देय भर से चुनाव व्यवस्था सुधरि जाइ?
का मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार कय इस्तीफा से देश कय चुनावी व्यवस्था बदल जाइ? का उनके पद से हटते ही मतदाता सूची कय तमाम शिकायतें खतम होइ जाइ, का चुनाव मां धनबल अउर बाहुबल कय इस्तेमाल रुक जाइ, का राजनीति कय अपराधीकरण पर लगाम लाग जाइ अउर का लोकतंत्र पहिले से ज्यादा पारदर्शी होइ जाइ?
इ सब सवाल इहै बरे उठ रहा है काहेकि कांग्रेस अउर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ कय ओर से ज्ञानेश कुमार कय इस्तीफा कय मांग तेज होत बा, उनके खिलाफ महाभियोग कय तैयारी कय बात सामने आवत बा, पै असली सवाल इहै अउर बा कि का समस्या सिर्फ एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त मां अहै? सवाल उठत बा कि अगर व्यवस्था कय बुनियाद मां इहै खामियां बा, तौ फिर सिर्फ चेहरा बदले से का बदलि जाइ?
सवाल इहै भी उठत बा कि आखिर काहे न बहस उस कानून पर होइ, जो भारत कय चुनावी व्यवस्था कय रीढ़ अहै यानी जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951? अउर काहे न पूछा जाइ कि इ कानून मां अउसन कौन-कौन सी खामियां बा, जिन्हें दूर किए बिना भ्रष्टाचार, अपराध अउर धनबल से मुक्त राजनीति कय कल्पना अधूरी ही रही?
देखा जाय तौ सवाल ज्ञानेश कुमार कय इस्तीफा कय नाहीं, चुनावी व्यवस्था कय बुनियाद कय अहै। इहै बरे सवाल उठ रहा है कि का मुख्य निर्वाचन आयुक्त बदलि जाइ तौ पूरी चुनाव व्यवस्था सुधरि जाइ? का एक व्यक्ति कय पद से हट जाब भर से मतदाता सूची कय सारी विसंगतियां खतम होइ जाइ?
का राजनीतिक दलों कय टिकट बांटे कय तरीका पारदर्शी होइ जाइ? का चुनाव मां धनबल अउर बाहुबल कय इस्तेमाल रुक जाइ? का आपराधिक मामलों कय सामना करत उम्मीदवार चुनावी मैदान से बाहेर होइ जाइ? अगर इन सवालों कय जवाब नाहीं अहै तौ फिर बहस केवल एक व्यक्ति कय इस्तीफा तक क्यों सीमित अहै?
अभी हाल ही मां सबने देखा कि दिल्ली कय जंतर मंतर पर शिक्षा क्षेत्र कय कुव्यवस्थाओं कय खिलाफ भए छात्रों कय प्रदर्शन कय चलते धर्मेंद्र प्रधान कय शिक्षा मंत्री कय कुर्सी छोड़े पड़ी। पै का इससे शिक्षा व्यवस्था सुधर गवा?
कोनो मंत्री कय इस्तीफा से यदि व्यवस्था अपने आप सुधर जात, तौ भारत कय शिक्षा व्यवस्था मां सुधार बरे कोनो दूसरी नीति, कानून, जवाबदेही अउर संस्थागत परिवर्तन कय आवश्यकता ही नाहीं पड़ति। इहै बरे चुनाव आयोग कय मुखिया कय बदले कय राजनीतिक मांग अउर चुनावी व्यवस्था मां स्थायी सुधार, दोनों कय एक ही चीज मानब गंभीर भूल होइ। असल बीमारी उस कानून मां भी खोजनी होइ जो चुनाव लड़े कय पात्रता अउर अयोग्यता तय करत अहै।
हम आपको बता दीं कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 चुनाव कय योग्यता, अयोग्यता, नामांकन, मतदान, मतगणना, चुनाव अपराध, भ्रष्ट आचरण अउर चुनाव याचिकाओं जैसी पूरी व्यवस्था कय महत्वपूर्ण आधार अहै। पै जरा विडंबना देखिए। एक चपरासी कय नौकरी बरे शैक्षणिक योग्यता चाहि। सरकारी नौकरी बरे आयु सीमा चाहि। भर्ती परीक्षा होत बा। चरित्र अउर दस्तावेजों कय जांच होत बा। नियुक्ति कय बाद सेवा नियम लागू होत बा। गलती होय पर कार्रवाई होत बा।
पै जो व्यक्ति देश कय संसद मां कानून बनाइ, करोड़ों लोगों कय जीवन कय प्रभावित करै वाले फैसलों मां भाग ली, उसके बरे मूल संवैधानिक शर्तें का बा? भारतीय नागरिक होना, निर्धारित न्यूनतम आयु पूरी करना अउर मतदाता होना जैसी आवश्यकताएं बा।
हियाँ सवाल उठत बा कि का जनप्रतिनिधि बनै बरे सार्वजनिक जीवन कय कोनो न्यूनतम मानक नाहीं होना चाहि? इसके अलावा एक अउर प्रश्न आपराधिक राजनीति कय अहै। सर्वोच्च न्यायालय भी राजनीति कय अपराधीकरण कय गंभीर समस्या मानते हुए राजनीतिक दलों कय आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों कय जानकारी सार्वजनिक करै अउर ऐसे उम्मीदवारों कय टिकट देय कय कारण बतावे कय निर्देश दे चुका अहै।
पै का केवल जानकारी सार्वजनिक कर देब पर्याप्त अहै? साथ ही यदि कोनो दल बार-बार गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार कय टिकट देत बा तौ केवल उम्मीदवार से सवाल क्यों होना चाहि? टिकट देय वाले दल से भी जवाब क्यों नहीं मांगा जाइ?
सर्वोच्च न्यायालय भी राजनीतिक दलों से ऐसे उम्मीदवारों कय चयन कय कारण बतावे कय कह चुका अहै पै फिर भी हालात मां कोनो बड़ा बदलाव नाहीं आया। देखा जाय तौ चुनावी सुधार कय मतलब केवल निर्वाचन आयुक्त बदलना नाहीं होइ सकत। इसका मतलब होना चाहि, उम्मीदवार चयन मां पारदर्शिता, आपराधिक मामलों कय त्वरित सुनवाई, चुनावी चंदे कय पारदर्शिता, झूठे हलफनामे पर कठोर कार्रवाई, चुनावी भ्रष्टाचार पर प्रभावी दंड अउर राजनीतिक दलों कय जवाबदेही।
यदि लोकतंत्र मां जनता सर्वोच्च अहै तौ चुनाव मां खड़े उम्मीदवारों बरे कानून मां भी सर्वोच्च सार्वजनिक जवाबदेही क्यों नाहीं होनी चाहि?
ज्ञानेश कुमार कय इस्तीफा कय मांग बुलंद करत विपक्षी दलों कय बताना चाहि कि वह सिर्फ व्यक्ति बदलना चाहत बां या व्यवस्था? जब तक कानून कय खामियों कय नाहीं सुधारा जाइ तब तक कोनो एक पदाधिकारी कय इस्तीफा केवल चेहरे कय बदलि, चुनावी व्यवस्था कय तस्वीर कय नाहीं।
-नीरज कुमार दुबे
