पटियाला हाउस कोर्ट स्वतंत्र भारद्वाज का रेगुलर ज़मानत दे दिहिन अहै। उनकै ऊपर २३ जून का जंतर-मंतर पर ‘कॉन्फेडरेशन ऑफ़ जम्मू एंड कश्मीर पीपल्स’ (CJP) कै विरोध प्रदर्शन कै बेरा एक अनुसूचित जाति (SC) कै आदमी के साथ कथित मारपीट के मामला मां आरोप बा। स्पेशल जज (SC/ST एक्ट) SPS लालर इ ज़मानत तब दीहिन जब उ इ देखिन कि भारद्वाज अपनी अंतरिम ज़मानत (जेका १५ सितंबर का मिला रहा) कै शर्तन् का पूरा कीन रहा। उम्मीद अहै कि कोर्ट ज़मानत कै शर्तन् कै बारे मां विस्तार से आदेश जारी करिहै।
शुरुआत मां भारद्वाज का कड़ा शर्तन् के साथ तीन हफ्ता कै अंतरिम ज़मानत दीहिन गवा रहा। इ शर्तन् मां सोशल मीडिया पर पोस्ट करै या मामला से जुड़ान इंटरव्यू दै पर रोक शामिल रहा। रेगुलर ज़मानत कै उनका अर्ज़ी पर विचार करै से पहिले इ बेरा उनके व्यवहार पर नज़र राखा गवा। दिल्ली पुलिस कोर्ट मां एक स्टेटस रिपोर्ट सौंपिन, जवने मां विरोध-प्रदर्शन करै वाली जगह कै CCTV फुटेज भी शामिल रहा। भारद्वाज का संजय आज़ाद पर कथित हमला कै मामला मां गिरफ्तार कीन गवा रहा; आज़ाद इ घटना मां शामिल SC समुदाय कै सदस्य रहें।
१५ सितंबर का अंतरिम ज़मानत देत बेरा, स्पेशल जज SPS लालर भारद्वाज का ५०,००० रुपिया कै ज़मानत बॉन्ड अउर एत्ती ही रासु कै श्योरिटी बॉन्ड भरै कै आदेश दीहिन। कोर्ट हरियाणा कै एक मिलते-जुलते मामला मां सुप्रीम कोर्ट कै फैसला कै जिक्र कीन, जवने मां हत्या कै एक आरोपी ज़मानत मिलै के बाद सार्वजनिक रूप से जीत कै जुलूस निकाल रहा। कोर्ट कहिस कि इ तरहा कै सार्वजनिक प्रदर्शन, चाहे सड़क पर होय या सोशल मीडिया पर, समाज या कानून-व्यवस्था खातिर नीक नाहीं अहै अउर इ से न्याय-व्यवस्था मां जनता कै भरोसा कम होत बा। ज़मानत कोर्ट कै भरोसा कै प्रतीक अहै, ना कि कवनो अइसन ट्रॉफी जेकर प्रदर्शन कीन जाय।
कोर्ट इ बात पर ध्यान दीहिन कि भारद्वाज दस दिन से ज्यादे समय से कस्टडी मां रहें, जवने से उनका सोचै-समझै कै समय मिला, अउर कस्टडी मां पूछताछ पूरा होइ चुका रहा। इ अपराधन् खातिर अधिकतम सात साल कै सजा होइ सकत बा। मुख्य चिंता शिकायतकर्ता अउर उनके नाबालिग बिटिया कै सुरक्षा रहा, जेका कोर्ट ज़मानत कै शर्तन् के जरिया सुनिश्चय करै कै कोसिस कीन। स्पेशल जज लालर आदेश दीहिन कि आरोपी का कड़ा शर्तन् के साथ तीन हफ्ता कै अंतरिम ज़मानत पर रिहा कीन जाय। कोर्ट कहिस कि कथित घटना से जुड़ान कवनो फैसला पर सोशल मीडिया या पब्लिक फोरम कै बजाय कोर्ट मां सबूतन् के आधार पर विचार कीन जाना चाही।
