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जस्टिस विक्रम नाथ कहिन, घरेलू हिंसा पर महतारी-बेटी कय आवाज कय सामान्य मानिकै अनदेखा ना कीन्हा जाव

नयी दिल्ली, सात अक्टूबर – उच्चतम न्यायालय कय न्यायाधीश विक्रम नाथ बुधवार कै कहिन कि डर, हिंसा या परेशानी कय बारे मा बात करे वाली महतारी-बेटी कय आवाज कय ना तौ नजरअंदाज कीन्हा जावौ चाही अउर ना ही इसे सामान्य माना जावौ चाही। न्यायमूर्ति नाथ “घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम” कै तहत नियुक्त सुरक्षा अधिकारियों कयउतने कोशिशों कय तारीफ कीहिन, जेकरसे मुसीबत मा फंसी महतारी-बेटी कय न्याय दियावै मा मदद मिलत अहै। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) कय ओर से आयोजित सुरक्षा अधिकारियों कय राष्ट्रीय सम्मेलन कै समापन सत्र कय संबोधित करत भये न्यायमूर्ति नाथ कहिन कि महतारी-बेटी कय इ पता होना चाही कि उनकर बात सुनी जाई, कानून उनकर रक्षा कै खातिर कार्रवाई करी अउर उनका गरिमा, सुरक्षा तथा अपने जीवन से जुड़े फैसला लेवै कय आजादी कय साथ जिए कै खातिर आवश्यक सहयोग मिली।

उन्हों कहिन, “बेटी कय इ सोचिकै बड़ा ना होना चाही कि परिवार कय बनाए रखै कय कीमत “चुप रहना” अहै अउर बेटा कय इ सोचिकै बड़ा ना होना चाही कि परिवार कय इज्जत इ बात पर निर्भर करत अहै कि कोनो मेहरारू कितनों कुछ सहने कय तैयार अहै। एक समय अइसन आवत अहै, जब समझौता रिश्ता कय बनाए रखै कय हिस्सा ना रहि जात, बल्कि इ उम्मीद बन जात अहै कि महतारी-बेटी कय वौ सब सहना पड़े, जौन उनका ना सहना चाही।”

न्यायमूर्ति नाथ भारत कय अगिला प्रधान न्यायाधीश बनवै कय कतार मा सबसे आगे अहैं। उन्हों कहिन कि घरेलू हिंसा से निपटै कै खातिर उस सीमा कय पहचानना अउर इ सुनिश्चित करना जरूरी अहै कि जब उस सीमा कय पार कीन्हा जाव, तौ कानून उस पर कार्रवाई करे। न्यायमूर्ति नाथ कहिन कि उस समझ कय बदलै मा समय लागि सकत अहै, लेकिन इकर शुरुआत इ बात से होत अहै कि आज लोग अपने परिवारन अउर संस्थावन मा का चुनत अहैं।

उन्हों कहिन, “जब कोनो महतारी-बेटी पहिला बार डर, हिंसा या परेशानी कय बारे मा बात करे, तौ उनकर आवाज कय नजरअंदाज ना कीन्हा जावौ चाही अउर ना ही इसे सामान्य माना जावौ चाही। उनका पता होना चाही कि उनकर बात सुनी जाई, कानून कार्रवाई करी अउर उनका सम्मान, सुरक्षा एवं अपनी जिंदगी से जुड़े फैसला लेवै कय आजादी कय साथ जिए कै खातिर जरूरी मदद मिली।”

न्यायमूर्ति नाथ कहिन, “हमर देश कय महतारी-बेटी कय समानता कय दर्जा हासिल अहै अउर उनका हमर संविधान से पूरी सुरक्षा अउर अधिकार मिला अहै। इ सुनिश्चित करना हम सबकर जिम्मेदारी अहै कि उनकर रोजमर्रा की जिंदगी मा इ वादा लागू होव।”

उन्हों कहिन कि अदालत मा न्यायाधीश हर दिन अलग-अलग सामाजिक अउर आर्थिक पृष्ठभूमि वाली महतारी-बेटी कय घरेलू हिंसा कय सामना करत हुए देखत अहैं; इ मेहरारू बहुत पढ़ी-लिखी, आर्थिक रूप से स्वतंत्र अउर सामाजिक रूप से अच्छी स्थिति वाली होइ सकत अहैं, या फिर उनकर शिक्षा बहुत कम होइ सकत अहै अउर उनकर पास जीवन-यापन कय कोनो स्वतंत्र जरिया ना होइ सकत अहै।

न्यायमूर्ति नाथ कहिन, “इन अंतरों कै बावजूद समझौता करै, चुप रहै अउर शादी कय बचावै कय दबाव बना रहि सकत अहै। अउर अक्सर इ दबाव मेहरारू कय अपने परिवार कय ओर से ही आवत अहै।” उन्हों कहिन, “होइ सकत अहै कि महतारी-बेटी से जौन होत अहै, उनका बर्दाश्त करै कै खातिर कहा जाव, काहेकि शादी बचानी अहै, बच्चन कय तकलीफ होई या परिवार कय इज्जत दांव पर लागि अहै।”

न्यायमूर्ति नाथ कहिन कि इ सोच पर सवाल उठाना जरूरी अहै कि शादी कय बाहर से ठीक-ठाक बनाए रखना, उसकय अंदर होत रही असल चीजिन कय विरोध करै से ज्यादा जरूरी अहै। उन्हों कहिन कि जब कोनो महतारी-बेटी हिंसा कय बारे मा बात करे, तौ उसकय सबसे करीबी लोगन कय पहिला प्रतिक्रिया इ होना चाही कि वे उनकर स्थिति कय समझें अउर उनका सहयोग एवं सुरक्षा दें, ना कि उसकय पूछें कि वह इकर साथ कैसे समझौता कर सकत अहै।

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