राजनीति

तपती धरती, झुलसत जिन्दगी: जनता के आघू लू (हीटवेव) कै चुनौती

साल 2026 कै गरमी खाली कौनों मौसम कै बदलाव नाहीं अहै, बल्कि मानुस सभ्यता के आघू ठाढ़ भवा एक गंभीर चेतावनी अहै। अप्रैल-मई के महीना मा भारत समेत दक्खिन एसिया के कइयौ हिस्सा मा जेहि तरन रिकॉर्ड तोड़ लू (हीटवेव) चली, ओसे ई साफ होइ गवा अहै कि जलवायु परिवर्तन अब कौनों भविस्स कै संकट नाहीं, बल्कि आजु कै डरावनी हकीकत अहै। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र अउर मध्य भारत के कइयौ इलाकन मा तापमान 46 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचि गवा। कइयौ सहरन मा बिजली कै मांग सारा रिकॉर्ड तोड़ि दिहिस। सड़कन पर सन्नाटा छाए लाग, मजूरन कै काम-धंधा ठप होइ गवा अउर लरिका-बच्चन, बूढ़-पुरनिया अउर गरीब मनइन के आघू आपन प्रान बचावै कै आफत आइ खड़ी भई।

ई संकट अचानक नाहीं आवा अहै। ई दसन सालन से कुदरत के साथे कीन गय बेढंगे व्यवहार, बिना सोचे-समझे सहर बसावै, जंगलन के कटान, प्राकृतिक चीजन के अंधाधुंध इस्तेमाल अउर सुबिधाभरी जिनगी जियै कै नतीजा अहै। कुदरत हमका बार-बार इसारा दिहिस, पै तरक्की कै अंधी दउड़ मा हम ओका अनसुना कइ दीन्हा। आजु ओही अनदेखी चेतावनियां हम्रे आघू भयंकर लू बनके ठाढ़ अहैं।

लू कै सबसे बड़ कारन खाली बढ़त तापमान नाहीं अहै, बल्कि तरक्की कै उ मॉडल अहै जेने धरती की प्राकृतिक ढाल को कमजोर कइ दिहिस। जंगल सदियन से धरती कै कुदरती एयर कंडीशनर रहे अहैं। उ सबई कार्बन डाइऑक्साइड सोखत रहेन, वाष्पोत्सर्जन से माहौल मा ठंडक रखत रहेन अउर पानी बरसइ कै चक्खर के संतुलित रखत रहेन। पै ई बड़े दुख कै बात अहै कि तरक्की के नाम पर जंगलन का तेजी से उजाड़ा गवा। हर साल लाखन हेक्टेयर जंगल खतम होत जा रहेन अहैं। ओकर नतीजा ई भवा कि स्थानीय स्तर पर तापमान बढ़ि गवा, हवा कै नमी कम होइ गइ, पानी बरसइ कै ढंग बिगड़ गवा अउर गरम हवा कइयौ दिनन तक चलै लागी।

आजु सहर “कंक्रीट के जंगल” बन चुके अहैं। बड़े-बड़े सहरन मा हरियाली सिमिटत जात अहै अउर ओकरी जगह सीमेंट, डामर अउर सीसा कै ऊंची-ऊंची इमारतें लेत जात अहैं। ओसे “अर्बन हीट आइलैंड” कै असर तेजी से बढ़ा अहै। सहर अब आपन आस-पड़ोस के गांवन के तुलना मा कइयौ डिग्री जादा गरम होइ चुके अहैं। कंक्रीट दिनभर सुरुज देव कै ताप सोखत अहै अउर रात मा ओका धीरे-धीरे छोड़त अहै। जेकरे कारन रातियों मा खूब गरमी रहत अहै अउर तन-मन का रत्ती भर चैन नाहीं मिल पावत।

दिल्ली, मुंबई, जयपुर अउर लखनऊ जइसन सहरन मा रात कै तापमान पहिले के मुकाबला मा लगातार बढ़त जात अहै। गरीब बस्तियन मा हालत अउर गंभीर अहै। हुआं न तउ हरियाली अहै, न पूरा पानी मिलत अहै अउर न ठंडा रखै कै कौनों साधन अहै। टीन कइ छत वाले घर दिन मा भट्ठी नियर तपत अहैं। ई गरमी कै मार अमीर-गरीब के भेद का अउर गहरा कइ देति अहै। अमीर मनई तउ एसी अउर बंद कमरन मा आराम पाइ जात अहैं, पै मजूर, रिक्शा चलावै वाले, ठेला वाले अउर मकान बनावै मा लाग मजूर खुले आसमान के नीचे झुलसत रहत अहैं।

दुख कै बात ई भी अहै कि गरमी से बचे कै सबसे बढ़िया साधन एयर कंडीशनर खुदै आफत का बढ़ावै वाला बनत जात अहै। एक एसी कमरा का तउ ठंडा कइ देत अहै, पै बाहर ओतने ही गरम हवा छोड़त अहै। ओकरे साथे बिजली कै खपत बढ़ति अहै, जेकर बहुत बड़ा हिस्सा आजु भी कोयला से बनै वाली बिजली से आवत अहै। एसी से निकरै वाली गैसें वातावरण मा ग्रीनहाउस प्रभाव का अउर बढ़ावा देति अहैं। ई तरह एक अइसा कुचक्र बन गवा अहै – गरमी बढ़त अहै, एसी कइ मांग बढ़त अहै, गैसों कै निकरब बढ़त अहै अउर फिर गरमी अउर जादा बढ़ि जात अहै।

मौसम कै ई बदलाव खाली तापमान बढ़इ तक नाहीं सीमित अहै। ई खेती-किसानी, अनाज कै सुरक्षा, सेहत अउर देस कै माली हालत (अर्थव्यवस्था) पर भी गहरा असर डालत अहै। बिगियानिकन के खोज से पता चला अहै कि बढ़त गरमी अउर बेमौसम कै बदलाव के कारन गेहूँ, धान अउर दूसरी फसलन कै पैदावार पर खराब असर पड़त अहै। गरम हवायें पेड़-पौधन के बढ़त का रोक देति अहैं, पानी कै सोतन का सुखाए देति अहैं अउर माटी कै उपजाऊ ताकत का कमजोर कइ देति अहैं। जउं यही तरन बात रही तउ आवे वाले सालन मा खाय-पीए कै आफत (खाद्य संकट) भी गहराइ सकत अहै।

लोगन के सेहत पर भी ओकर बुरा असर साफ दिखात अहै। लू लगब, डिहाइड्रेशन (पानी कै कमी), हीट stroke (स्ट्रोक), दिल कै बीमारी अउर दिमागी तनाव जइसन मुसीबतें बढ़त जा रही अहैं। अस्पतालन मा गरमी से बीमार भये मरीजन कै भीर लागत अहै। सबसे जादा खतरा बूढ़-पुरनिया, लरिका-बच्चन, गर्भवती मेहरारू अउर बाहर काम करै वाले मजूरन का अहै।

गरमी कै ई संकट समाज अउर इंसानियत के लिए भी एक बड़ी आफत बन सकत अहै। पानी कै सोतन के सूखै, खेती-किसानी मा घाटा अउर जियै के साधन बिगड़ै से बहुत बड़े पैमाने पर लोगन का आपन घर-बार छोड़के दूसरी जगह जाय (पलायन) का मजबूर होय का पड़ी। जीव-जन्तु अउर पेड़-पौधन (जैव विविधता) पर भी ओकर गम्भीर असर पड़त अहै। कइयौ जानवर अउर पेड़-पौधे आपन प्राकृतिक घर खोवत जा रहे अहैं। हजारन प्रजातियन के बचै पर संकट मँडरात अहै।

अइसन समै मा सरकारन कै जिम्मेदारी बहुतै बढ़ि जात अहै। खाली रेड अलर्ट अउर ऑरेंज अलर्ट जारी कइ देब काफी नाहीं अहै। लू (हीटवेव) का देस कै बड़ी आफत (राष्ट्रीय आपदा) मानके लम्बे समै कै नीति बनावै कै जरूरत अहै। सबसे पहिले सहरन मा ‘हीट एक्शन प्लान’ का नीक तरन लागू करै का पड़ी। हर सहर मा हरियाली बढ़ावै, पानी बचावै, छायादार रस्ता, सरकारी पियाऊ अउर ठंडक देइ वाले केंद्रन कइ व्यवस्था करब जरूरी अहै। स्कूल, कॉलेज अउर दफ्तरन के समय मा बदलाव करत समै उ इलाका कै तापमान ध्यान मा रखै का चाही। दुपहरी कै कड़क धूप मा मजूरन से काम करावै कै समय कम कीन जाय अउर उनके आराम करै अउर पानी पीए कै पुख्ता इंतजाम कीन जाय।

सरकार का मकान बनावै के नियमन मा भी बदलाव लावै का पड़ी। हमार पुरान ढंग कै बनावट – हवादार घर, अँगना, माटी कै दीवाल अउर खपरैल, छतन पर हरियाली अउर कुदरती हवा आवे-जाय के रस्ता का बढ़ावा देवे का चाही। सीसा कै चमकत इमारतन अउर गरमी सोखै वाले मकानन पर फिर से विचार करै कै जरूरत अहै। “कूल रूफ” तकनीक (छत का ठंडा रखै कै तरीका), पानी बरसावै कै पानी बटोरब (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) अउर सौर ऊर्जा से चलै वाले एसी-पंखन का बढ़ावा दीन जाय।

जंगल बचाउब अउर पेड़ लगाउब खाली कौनों दिखावटी काम नाहीं, बल्कि पूरे देस कै प्राथमिकता होय का चाही। सहरन मा छोटे जंगल (माइक्रो फॉरेस्ट), पार्क अउर हरी-भरी गलियां बनाई जायं। पानी कै सोतन अउर पुरान ताल-तलइयन का फिर से जिन्दा कीन जाय काहे से कि उ सबई ओस-पास कै तापमान का काबू मा रखै मा बहुत मददगार होत अहैं।

पै खाली सरकारें ई लड़ाई नाहीं जीत सकतीं। आम मनइन का भी आपन फर्ज समझै का पड़ी। हमका आपन सुख-सुबिधा वाली जिनगी जियै के तरीका पर फिर से विचार करै का पड़ी। पानी कै हिसाब से इस्तेमाल, बिजली बचाउब, पेड़ लगाउब, सरकारी बस-ट्रेनन कै इस्तेमाल अउर आपन आस-पड़ोस के पर्यावरण का बचाउब अब कौनों मनमर्जी कै काम नाहीं, बल्कि पूरे समाज कै जिम्मेदारी अहै।

हमरे देस मा पहिले पियाऊ लगौब, छांवदार बिस्राम घर बनौब अउर पानी पिलावै कै बहुत सुघर परंपरा रही। गरमी मा बटोहियन का पानी पिलाउब बहुत धरम कै काम माना जात रहा। आजु ओही परंपरा का फिर से जगावै कै जरूरत अहै। समाज, धरम करम कै संस्थाएं अउर मदद करै वाली संस्थाएं (एनजीओ) मिलके पानी सेवा अउर गरमी से राहत देवे कै अभियान चलाइ सकतीं।

गरमी अउर पानी कै किल्लत का राजनीति कै खेल बनावै के बजाय मिलजुल के हल निकालै कै रास्ता खोजे का पड़ी। पानी के बटवारा पर झगड़ा अउर स्वार्थ कै राजनीति आवे वाले कल का अउर कठिन बनाइ देई। जरूरत अहै कि पानी कै इंतजाम, पर्यावरण कै सुरक्षा अउर मौसम के बदलाव से लड़इ का पूरे देस कै एक राय कै मुद्दा बनाया जाय।

साल 2026 कै ई झुलसावै वाली गरमी हमका होसियार कइ रही अहै कि जउं हम अबहूँ कुदरत के साथे तालमेल नाहीं मिलाएन तउ आवे वाले सालन मा हालत अउर भयावह होइ जाई। धरती कै तापमान अउर बढ़ी, पेड़-पौधे अउर जीव-जन्तु खतम होइ जइहैं, खाय-पीए कै आफत मचि जाई अउर इंसानी जिनगी अउर कठिन होइ जाई। ई समय कुदरत से लड़इ कै नाहीं अहै, बल्कि ओकरे साथे मिलके चलइ कै अहै। हमका तरक्की कै अइसा रास्ता चुने का पड़ी जेहि मा पर्यावरण, मानुस कै जिनगी अउर आवै वाला भविस्स सुरक्षित रहि सकै। नाहीं तउ उ दिन दूर नाहीं जब सुरुज कै तपिस खाली परेशानी नाहीं, बल्कि हम्रे वजूद कै संकट बन जाई।

– ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार अउर स्तंभकार

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