
कुरुक्षेत्र क रणभूमि मा जब अर्जुन हताश अउर निरास होइ गए रहेन, तब भगवान श्रीकृष्ण ओन्हैं जे गियान दिहे रहेन, उ खाली महाभारत काल बरे नाहीं बल्कि आजु क ई ‘कलियुग’ मा भी ओतने प्रासंगिक बना अहै। श्रीमद्भगवद्गीता क ई ६ श्लोक हमका सिखावत हैं कि विपरीत परिस्थिति मा भी कइसन मजबूत रहा जाइ अउर जिन्दगी मा कबहूँ हार नाहीं माना जाइ।
करम पर काबू, फल पर नाहीं
श्लोक: – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
अरथ: तोहार अधिकार खाली आपन करम करै पर अहै, ओकर फल पर कबहूँ नाहीं। इ बरे नतीजा क चिन्ता कीन्हे बिना आपन सबसे नीक योगदान दउ। जे लोग खाली आपन काम पूरी ईमानदारी से करत हैं अउर ओसे मिलै वाले नतीजा क चिन्ता नाहीं करत हैं, उ कबहूँ असफलता के डेरे से हार नाहीं मानत हैं।
संयम से मिलत है परम शान्ति
श्लोक: – श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।
अरथ: जेहिके मन मा अटूट सरधा यानी विस्वास अहै अउर जे आपन इन्द्रियन पर काबू रखब जानत है, उहे सच्चा गियान पावत है। अइसन गियान मिलतहीं मनई का परम सांति क अनुभव होत है। ई श्लोक हमका सिखावत है कि आपन काम पर ध्यान (फोकस) अउर संयम (सेल्फ-कंट्रोल) ही तुहका भीर से अलग अउर विजयी बनावत है।
जइसन सोच, वइसने व्यक्तित्व
श्लोक: – सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।
अरथ: ई श्लोक कहत है कि हर मनई क बिस्वास ओकरे सुभाव क हिसाब से होत है। मनई आपन बिचार अउर आस्था से ही बनत है। सीधे आखर मा कही, त जइसन भरोसा आपन ऊपर करबो, वइसने तुहूँ बन जाइहौ। कउनो भी काम से पहिले हार अउर जीत पहिले ही हमरे दिमाग मा तय होइ जात है। जेकर तोहार सोच नीक (सकारात्मक) अहै अउर आपन ऊपर भरोसा अहै, त कउनो भी परिस्थिति तुहका तोर नाहीं सकत है।
चिन्ता क त्याग ही सुख क कुंजी
श्लोक: – चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी। तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः।।
अरथ: ई संसार मा चिन्तै सब दुक्खन क अकेल्ला मूल कारन अहै। जे ई सच का मान लेत है, उ मानसिक तनाव से बचि के एक सुखी, सान्त अउर सन्तोखी जिन्दगी जीयत है। सीधे सब्दन मा ‘ओवरथिंकिंग’ या अगू की फालतू चिन्ता मा आपन ताकत (एनर्जी) नास न करा। आजु मा जिया अउर आपन ताकत का सही डहर मा लगावा।
सुख-दुख क पल भर क सुभाव का समझा
श्लोक: – मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।
अरथ: ई श्लोक मा भगवान श्रीकृष्ण कहत हैं कि हे कुन्तीपुत्र! (अर्जुन) जइसन मौसम मा जाड़ अउर गरमी आवत-जात रहत है, ठीक वइसने ही जिन्दगी मा सुख अउर दुख क आवब-जाब तय अहै। ई सदा बरे नाहीं रहत हैं, इ बरे बिना घबराई ओन्हैं धीरज धइके सहब सीखा। मतलब ई कि बुरा टेम कबहूँ सदा बरे नाहीं रहत। जे लोग कठीन समइ मा आपन धीरज नाहीं खोवत हैं, उहे आख़िर मा जीतत हैं।




