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यूरोपीय मूल्यन से भारतीय विरासत तक, नई दिल्ली में खुलि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की विचार यात्रा

रवीन्द्रनाथ ठाकुर पूरी बात समग्रता में कहत रहिन। ऊ जीवन का टुकड़न में नाहीं, बल्कि पूरा एक साथ देखै के पक्षधर रहिन। ई बात युवा साहित्यकार डॉ. नवीन नीरज बताइन। ऊ अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के ओर से शनिवार का प्रवासी भवन, नई दिल्ली में रवीन्द्रनाथ के निबन्ध किताब पर आयोजित चर्चा में अपनी बात रखत रहिन।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर: एक प्रखर विचारक
डॉ. नीरज कहिन कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर खाली एक कवि नाहीं, बल्कि एक बहुत बड़े विचारक रहिन। उनकर निबंध पढ़ के हमका भारतीय जीवन दृष्टि समझे में मदद मिलत है। सुरु में त ऊ यूरोपीय जीवन-मूल्यन के बहुत प्रशंसक रहिन, लेकिन बाद में ऊ अपने ई विचार में बदलाव ले आएन। ऊ भारत के पुरान विरासत का देश के असली ताकत मानत रहिन। उनकर मकसद मनई का उनकर सीमा से ऊपर उठा के एक ‘ग्लोबल सिटिजन’ यानी विश्व नागरिक बनावे के रहा।

मानवतावाद और विश्वबंधुत्व का संदेश
लेखिका प्रिया वरुण कुमार कहिन कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निबंध में प्रकृति, शिक्षा और समाज सुधार से जुड़ा विचार मिलत है। ऊ मानवतावाद और भाईचारा का संदेश देवत हैं।

गहरा धर्म-बोध और प्रकृति
किताब-चर्चा का संचालन करत भये शोधार्थी अजीत कुमार कहिन कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचारधारा के मूल आधार उनकर गहरा धर्म-बोध रहा, जवन उनकर व्यक्तित्व और सोच से एकदम जुड़ा रहा। उनकर पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर के आध्यात्मिक साधना के उन पर बहुत गहरा असर पड़ा, लेकिन प्रकृति के प्रति उनकर बहुत संवेदनशीलता भी उनकर धर्म-बोध का अउरी समृद्ध कर दिहिस। भोर, मौसम के बदलाव, बादर, बरखा और नदी के धार उनकर मन का आनंद और रहस्य से भर देवत रही।

इ कार्यक्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय कार्यालय सचिव संजीव सिन्हा, पवन कुमार अरविंद, विकास आनंद और अनुराग द्विवेदी शामिल भये।

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