
आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एपीसीसी) की अध्यक्षा वाईएस शर्मिला के राज्यसभा जाए के अरमानन प पानी फिर गवा है, काहे से कि कांग्रेस हाई कमान कर्नाटक से अपने उम्मीदवारन के लिस्ट में से उनका नाम काट दिहे हैं। खबरन के मुताबिक, चुनाव के नोटिफिकेशन जारी भये के बाद भी शर्मिला राहुल गांधी से राज्यसभा में टिकट मिलय के संभावना प बात-चीत कीन्ह रहीन, लेकिन पार्टी जवन फाइनल लिस्ट जारी कीहिस, ओमें उनका नाम नदारद रहा। कांग्रेस आखिर में कर्नाटक के तीन राज्यसभा सीट खातिर पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, एआईसीसी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा और पूर्व केंद्रीय मंत्री सी.एम. इब्राहिम के बेटवा मंसूर अली खान के नाम प मुहर लगा दिहिस। ई मामला के बाद अब ई बहस छिड़ गई है कि शर्मिला, जवन कभी आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के एगो बहुत जरूरी नेता मानि जात रहिन, आखिर राज्यसभा सीट काहे न पा पाईं।
जब कांग्रेस शर्मिला के एपीसीसी चीफ बनाई रही, त नेतृत्व के पूरा भरोसा रहा कि इनके आवे से आंध्र प्रदेश में पार्टी के दिन फिर जइहें। कारण एकदम साफ रहा: ऊ आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की बिटिया और पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी की बहिन आहीं। कांग्रेस के रणनीतिकारन के उम्मीद रही कि वाईएसआर के वफादार वोटर और समर्थक शर्मिला की ओर खिंचे अइहें, जेसे राज्य में पार्टी के जवन हालत खराब है, ऊ सुधर जाई। उनकर ई भी मानब रहा कि जगन के साथ उनकर जवन तनातनी चलत है, ऊ पार्टी खातिर फायदेमंद साबित होई, काहे से कि जवन नेता और कार्यकर्ता जगन के विरोध में आहीं और कउनो दूसरा रास्ता खोजत हैं, ऊ शर्मिला के साथ जुड़ जइहें।
हालांकि, ई सब उम्मीद चुनाव में कउनो काम न आई। शर्मिला के अगुवाई में न त ऊ खुद और न ही कांग्रेस 2024 के आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में एगो सीट भी जीत पाई।
राजनीतिक जानकारों के का कहना है?
राजनीतिक विश्लेषक पोल विक्रम न्यूज18 से बताइन कि स्थापित नेता के प्रचार करे और खुद से कउनो राजनीतिक दल के नेतृत्व करे में बहुत अंतर होत है। वाईएस राजशेखर रेड्डी या जगन मोहन रेड्डी जैसे नेता के आगे बढ़ावे या पार्टी के चुनाव प्रचार में मदद करे के बात अलग है। लेकिन अकेले दम पे कउनो संगठन बनावे और ओकर नेतृत्व क के अपनी काबिलियत साबित करे के काम एकदम अलग है।