धर्म/अध्यात्म

बइसाख पूरनिमा पर ई आरती से करा श्री हरि अउर महतारी लछमी क पूजा

बइसाख पूरनिमा का बहुतै बड़ मानल जात है। एका बुद्ध पूरनिमा के नाँव सेव जानल जात है। धरम-करम क मान्यता के अनुसार, बइसाख क महीना भगवान विष्नु का बहुतै पियारा है अउर ई पूरनिमा तिथि पर दान-पुन्न, अस्नान अउर दीपदान करइ से असमेध जग जैसन फल मिलत है।

अक्सर मनई पूजा-पाठ तौ करत हीं, मुला अंत मा आरती के घरी कुछु न कुछु गलती कइ बैठत हैं। बइसाख पूरनिमा की रात जउं आप श्री हरि विष्नु के साथे महतारी लछमी क आरती करत हउ, तौ आपक पूजा क फल न खाली पूर होइ, बल्कि ऊ कइयौ गुना बढ़ि जाई। तौ आवा हियां आरती पढ़ी जाइ।

बइसाख पूरनिमा पर आरती क धरम-करम मा महतव:

पूरनिमा की रात महतारी लछमी धरती पर आवत हैं। बइसाख क महीना विष्नु जी क है अउर बिना विष्नु जी के लछमी जी कहूं टिकत नाहीं। ओरे ताईं, ई दिन सत्यनरायण कथा के बाद जब आरती कीन जात है, तौ ओसे घर क नकारात्मक उर्जा दूर होत है अउर सुख-सांति क संचार होत है। आरती के घरी संखा अउर घंटा के आवाज से घर क वाताबरन एकदम पबित्तर होइ जात है अउर जिनगी मा सुख-समरिद्धि आवत है।

।।भगवान विष्नु की आरती।।

ॐ जय जगदीश हरे आरती
ॐ जय जगदीश हरे…
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे…
जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे…
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी।
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे…
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे…
तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।
स्वामी तुम पालन-कर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे…
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे…
दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे…
विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा।
स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, संतन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे…
श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।
स्वामी जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥
ॐ जय जगदीश हरे…

।।आरती श्री लछमी जी।।

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रुप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
ॐ जय लक्ष्मी माता॥

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