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वरुण बडोला एक्टिंग बरे छोड़ दिहे रहेन सब सुख-चैन, माई से सीखिन जिंदगी क कइयौ सबक

एक्टिंग मा नाम कमावै बरे वरुण बडोला कइसन संघर्ष किहिन अउर उनकी माई क उनकर जिंदगी मा का असर रहा, जानब इहाँ।

कउनो भी डगर क शुरुआत सपनन से होत है, पै ओका मंजिल तक पहुँचावै बरे अनुशासन, लगन अउर अपने लच्छ (लक्ष्य) के प्रति ईमानदारी सबसे जरूरी होति है। खास करि के ओय बखत जब चकाचौंध अउर भटकाव बार-बार सोझुआत हैं। अपने करियर क शुरुआत से ‘अनदेखी’ सिरीज के कलाकार वरुण बडोला ई बात क पूरा धियान रक्खिन। ऊ हालय में रिलीज भई सिरीज ‘अनदेखी: द फाइनल बैटल’ (Andekhi: The Final Chapter) मा देखाय पड़े हैं।

अपने मा कमी ढूँढ़त रहेन एक्टर
वरुण से जब पूछा गवा कि अपने करियर मा कउन चीज क ऊ ‘अनदेखी’ नाहीं किहिन? तौ जवाब मा वरुण कहत हैं, “सबसे पहिले अपने कमिटमेंट अउर जुनून क जिकर करब जरूरी है। हमका हमेशा ई ‘अहसास-ए-कमतरी’ (हीन भावना) लागत रहा कि हमका जतनी जानकारी होय के चाही, जतनी तैयारी होय के चाही, उतनी नाहीं है। हमका याद है कि हमार कुछ दोस्त रहेन, जब कबहूँ उनका मन करत रहा कि चलो कतहुँ घूमि आइ या पार्टी करि ली, तौ हमका लागत रहा कि नाहीं, अभी हमार पार्टी करै क हक्क नाहीं है।”

पार्टी करै से बचत रहेन एक्टर
एक तौ पइसा नाहीं रहा अउर दूसर ई डर रहा कि कतहुँ हम खाली पार्टी करत न रह जाई अउर कउनो बहुत जरूरी चीज हमर नजर के सोझुआ से निकल जाय अउर हमार धियान न जाय। जब हम नवा-नवा आये रहेन, तब हमहूँ मा बहुतै इच्छा अउर आकर्षण रहा, पै हम ओकर तरीका निकारि रक्खे रहेन कि चाहे जो होय जाय, हम अपने कमिटमेंट अउर जुनून (पैशन) के साथ कउनो ढिलाई नाहीं करब।

बाबूजी रहेन पत्रकार अउर कलाकार
‘मदर्स डे’ मनावै के बारे मा ऊ कहत हैं कि, “हमार बाबूजी पत्रकार के साथे-साथे कलाकार भी रहेन। हमार जतने भी दोस्त रहेन, उनके पिता अक्सर नौ से पाँच क नौकरी करत रहेन या कउनो तय समय पर काम करत रहेन अउर संझा सात-आठ बजे तक घर अइ जात रहेन। पै हम अपने बाबूजी का कबहूँ साढ़े दस-ग्यारह बजे से पहिले घर आवत नाहीं देखिन। जब तक अखबार छपै बरे नाहीं चला जात रहा, तब तक ऊ घर नाहीं लौटत रहेन।”

माई रक्खिन अनुशासन मा
पै घर मा हम सब मनइन का सम्हारि के रक्खब, अनुशासन मा रक्खब, ई काम माई क ही रहा। अक्सर अइसन होत है कि आपक जतनी भी सफलता होति है, आप सबसे पहिले ओका माई के साथे ही बतावत हउ क्योंकि बाबूजी काम मा मगन रहत रहेन। आपक व्यक्तित्व क संवारब कि सबके साथे नीक से रहा, पै इतना भी नाहीं कि कउनो गलत करै अउर आप चुप रहि जाव—ई भी हम अपनी माई से ही सीखिन।

धीरज धरब हम माई से सीखिन, अउर जरूरत पड़ै पर जवाब देब भी हम उन्हीं से सीखिन कि हर चीज क एक सीमा होति है अउर जउ कउनो ओही सीमा का नाहीं समझत है, तौ ओका समझाउब भी जरूरी है अउर एमा कउनो बुराई नाहीं है। तौ हमर भीतर जउन ई कलाकारी वाला गुन है, ऊ बाबूजी से आवा है, पै जउन जिद्द अउर मजबूती है—लोग अक्सर कहत हैं कि हम दिमागी तौर पर बहुत मजबूत मनई हन—तौ ऊ सब चीज हमरी माई क देन है।

खाली एकै दिन क नाहीं होत ‘मदर्स डे’
बाकी ‘मदर्स डे’ का एकै दिन तक रोक के रक्खब, ओकर मतलब हमका समझ नाहीं आवत। हमरी माई आज के बखत मा बहुत नीक रिटायर जिंदगी बितावत अहैं। अभी तौ ऊ मुंबई मा अहैं। दिल्ली मा भी हमार घर है, जब उहाँ बहुतै जाड़ा नाहीं पड़त तौ उहाँ रहति हैं। उनकी बहिनी उत्तराखंड मा अहैं, उहाँ भी आवब-जाब बना रहत है।

हम उनसे कहि दिहे हन कि अगर पड़ोसिन के साथे कतहुँ घूमै जाय क मन होय तौ ई जिन पूछिहौ कि “अरे यार, इतना खरचा होय जाई।” हमार साल मा एक छुट्टी होति है, तब हमार पूरा परिवार साथे होत है। मतलब हम, हमरी मेहरारू राजेश्वरी सचदेव, माई, हमार बिटवा अउर उनके साथे राजेश्वरी की माई अउर उनके परिवार के सदस्य।”

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