अमेरिका में भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी से जुड़े कथित रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी मामले में अब एक बड़ा मोड़ आता दिख रहा है। अमेरिकी न्याय विभाग गौतम अडानी के खिलाफ चल रहे आपराधिक धोखाधड़ी के आरोप वापस लेने की तैयारी में है। इसी बीच, अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (SEC) के साथ भी समझौते की दिशा में प्रगति हुई है। इन घटनाक्रमों ने भारत और अमेरिका, दोनों देशों की राजनीति और कारोबारी जगत में नई बहस छेड़ दी है।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी न्याय विभाग ने संकेत दिए हैं कि गौतम अडानी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला कमजोर आधार पर टिका हुआ है। अडानी पक्ष के वकीलों ने अमेरिकी अधिकारियों के सामने लगभग सौ पन्नों का प्रस्तुतीकरण देते हुए कहा कि मामले में पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं और अमेरिकी एजेंसियों का अधिकार क्षेत्र भी स्पष्ट नहीं है। बताया जा रहा है कि अडानी पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि जब तक मामला जारी रहेगा, तब तक अमेरिका में प्रस्तावित निवेश प्रभावित होगा।
हम आपको याद दिला दें कि गौतम अडानी ने वर्ष 2024 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बाद अमेरिका में एक हजार करोड़ डॉलर के निवेश और पंद्रह हजार नौकरियां सृजित करने की घोषणा की थी। माना जा रहा है कि इसी निवेश योजना को भी बातचीत में प्रमुखता से रखा गया। हालांकि, कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि निवेश का प्रस्ताव कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करेगा।
दरअसल, नवंबर 2024 में अमेरिकी अभियोजकों ने गौतम अडानी और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने भारत में विशाल सौर ऊर्जा परियोजना के ठेके हासिल करने के लिए सरकारी अधिकारियों को लगभग छब्बीस करोड़ पैंसठ लाख डॉलर की रिश्वत देने या देने का वादा किया। अभियोजन पक्ष का कहना था कि इस कथित भ्रष्टाचार को छिपाकर अडानी समूह ने ऋण और बॉन्ड के जरिये तीन अरब डॉलर से अधिक की राशि जुटाई। वहीं, अडानी समूह ने शुरू से ही इन आरोपों को निराधार बताया है।
इसी मामले से जुड़े दीवानी मुकदमे में अब एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। SEC ने गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी के साथ समझौते पर सहमति जताई है। समझौते के तहत गौतम अडानी छह करोड़ डॉलर और सागर अडानी बारह करोड़ डॉलर का जुर्माना भरेंगे। हालांकि, दोनों ने किसी भी तरह की गलती स्वीकार नहीं की है। इस समझौते को अभी अदालत की मंजूरी मिलना बाकी है। SEC का आरोप था कि अडानी ग्रीन एनर्जी ने भ्रष्टाचार निरोधक नियमों के पालन को लेकर निवेशकों के सामने भ्रामक जानकारी पेश की। अमेरिकी निवेशकों से कम से कम सत्रह करोड़ पचास लाख डॉलर जुटाए गए थे। इस मामले में अडानी पक्ष का कहना है कि बॉन्ड का कारोबार अमेरिकी शेयर बाजार में नहीं हुआ था और अमेरिकी एजेंसियों का अधिकार क्षेत्र लागू नहीं होता।
इन घटनाओं का असर शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। अडानी एंटरप्राइजेज के शेयरों में शुरुआती तेजी के बाद हल्की बढ़त दर्ज की गई, जबकि अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस के शेयरों में गिरावट देखी गई। दूसरी ओर, अडानी पोर्ट्स के शेयरों में मजबूती बनी रही। निवेशकों को उम्मीद है कि यदि अमेरिकी मामले समाप्त हो जाते हैं, तो अडानी समूह को अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार में फिर से मजबूती मिलेगी और विस्तार योजनाओं को नई गति मिल सकती है।
हालांकि, भारत में अडानी समूह की मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास अब भी अडानी समूह और उससे जुड़े विदेशी कोषों के खिलाफ कई आरोप लंबित हैं। इनमें प्रतिभूति नियमों के उल्लंघन, लेनदेन छिपाने और अन्य वित्तीय अनियमितताओं के आरोप शामिल हैं। हालांकि, पिछले वर्ष SEBI ने शेयर हेरफेर, अंदरूनी कारोबार और संबंधित पक्ष लेनदेन छिपाने जैसे तीन आरोपों को खारिज कर दिया था, जिन्हें अमेरिकी शोध संस्था हिंडनबर्ग रिसर्च ने उठाया था।
इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति में भी तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौता दरअसल गौतम अडानी को राहत दिलाने के लिए किया गया सौदा है। राहुल गांधी ने कहा कि यह व्यापार समझौता नहीं, बल्कि अडानी की रिहाई के लिए किया गया समझौता है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत और अमेरिका के बीच हुआ व्यापार समझौता एकतरफा है और इसका लाभ अमेरिका को ज्यादा मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने राष्ट्रीय हितों से समझौता किया है। कांग्रेस नेताओं ने यह सवाल भी उठाया कि क्या अमेरिकी प्रशासन द्वारा अडानी पर लगे आरोप हटाने की तैयारी और भारत-अमेरिका संबंधों के बीच कोई राजनीतिक संबंध है।
वहीं, अडानी समूह ने इन सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा है कि उसने हमेशा कानून और पारदर्शिता के मानकों का पालन किया है। अब सबकी नजर अमेरिकी अदालत के अंतिम फैसले और भारतीय नियामक संस्थाओं की आगे की कार्रवाई पर टिकी हुई है।