राजनीति

मसूरी के जगह बांग्लादेश का अब लाहौर नीक लागै लाग है, भारत के बजाय पाकिस्तान मा अपने अफ़सरन का ट्रेनिंग दियवावत हंय तारिक रहमान

बांग्लादेश मा नई सरकार आवै के बाद लाग रहा कि मुहम्मद युनूस वाली गलती नाहीं दुहराई जइहें अउर चीन व पाकिस्तान के खेमा मा जाइ के बजाय ढाका का झुकाव भारत के कइती ही रही, बाकि अइसा होत देखात नाहीं है। हम आप का बताइ देइ कि ताज़ा मामला मा बांग्लादेश अपने अफ़सरन के ट्रेनिंग के बरे भारत के मसूरी मा स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के जगह पाकिस्तान के लाहौर मा स्थित सिविल सर्विसेज अकादमी का चुनेस है। इ कदम दक्खिन एशिया की बदलती कूटनीतिक राजनीति अउर बांग्लादेश की नई विदेश नीति का संकेत माना जात है।

हम आप का बताइ देइ कि लगभग एक दशक से बांग्लादेशी अफ़सरन के बरे मसूरी ट्रेनिंग का मुख्य केंद्र रहा। साल 2014 मा शेख हसीना सरकार के दौरान बांग्लादेश के लोक प्रशासन मंत्रालय अउर भारत के राष्ट्रीय सुशासन केंद्र के बीच समझौता भा रहा। ओकरे बाद 2019 अउर 2024 मा भी नया समझौता भवा। 2019 से 2024 के बीच भारत मा 1019 से ज़्यादा बांग्लादेशी सिविल सेवकन का ट्रेनिंग दीन गयी, जबकि कुल मिलाइके लगभग 2500 अफ़सर भारत मा ट्रेनिंग लिहिन। बाकि अब पहिली दइयां 12 बांग्लादेशी अफ़सर 4 से 21 मई तक लाहौर मा ट्रेनिंग लेत हंय अउर एका पूरा खरचा पाकिस्तान सरकार उठावत है।

इ बदलाव अइसन समय मा भवा है जब शेख हसीना के सत्ता से बाहर होइ के बाद ढाका अउर इस्लामाबाद के बीच रिस्ता तेज़ी से मजबूत होत हंय। हाल ही मा बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबायद इस्लाम अउर पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री सैयद मोहसिन रज़ा नकवी के बीच भई बैठक मा दुनो देसन ने व्यापार, खेल, संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक अउर डिजिटल नवाचार जइसन क्षेत्रन मा सहयोग बढ़ावै पर जोर दीन। दुनो कइती से दक्खिन एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) का फिर से चालू करै अउर क्षेत्रीय संपर्क मजबूत करै की ज़रूरत भी दुहराई गयी।

जानकारन का मानब है कि बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति मा ढेर रणनीतिक आज़ादी देखावै चाहत है। नई राजनीतिक व्यवस्था के बाद ढाका भारत पर बहुतै ज़्यादा निर्भरता से बचै की कोसिस करत है अउर पाकिस्तान व चीन जइसन देसन के साथ भी तालमेल बनावै की फिराक मा है। यही कारन है कि नई सरकार भारत के साथ रिस्ता बनइले रहत हुए दूसर विकल्प के कइती भी बढ़त है। हालांकि बांग्लादेश अउर भारत दुनो इ समझत हंय कि आपसी टकराव लंबे समय तक उनके हक मा नाहीं है। इही वजह से दुनो देसन के बीच सैन्य सहयोग, आर्थिक संपर्क अउर राजनयिक बातचीत फिर से सुरू करै की कोसिस भी होइ रही है।

फिर भी दुनो देसन के बीच का अविश्वास पूरी तइयां खतम नाहीं भवा है। शेख हसीना का भारत मा रहब बांग्लादेश की राजनीति मा लगातार विवाद का बिषय बना है। ढाका मा इ बात पक्की होत जा रही है कि भारत बांग्लादेश की अंदरूनी राजनीति मा ज़रूरत से ज़्यादा असर बनइले राखै चाहत है। खास करिके जवान लोगन मा राष्ट्रवाद अउर राजनीतिक आज़ादी की भावना पहिले से ज़्यादा मजबूत भई है। भारत विरोधी भावना अब खाली वैचारिक मुद्दा नाहीं रहि गय, बल्कि घरेलू राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनत जात है।

सीमा मैनेजमेंट, गैरकानूनी तस्करी, प्रवासन अउर पानी के बंटवारा जइसन पुरान विवाद भी अब तक हल नाहीं होइ पाइन। तीस्ता जल समझौता कइयौ सालन से अटका है अउर जलवायु परिवर्तन के कारन आगू इ विवाद अउर गंभीर होइ सकत है। हालांकि पच्छिम बंगाल की राजनीति मा भवा बदलाव के बाद कुछ जानकारन का भरोसा है कि इ दिशा मा नई पहल मुमकिन है। एकरे बावजूद आर्थिक रिस्ता दुनो देसन के बीच मजबूती बनावै मा खास भूमिका निभावत हंय। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक भारतीय बाज़ार अउर सप्लाई चेन पर निर्भर है, जबकि भारत के पूरब के राज्यन के बरे बांग्लादेश का इलाका व्यापार अउर संपर्क के लिहाज़ से बहुत ज़रूरी है। यही आर्थिक निर्भरता हर तनाव के बावजूद रिस्तन का पूरी तइयां टूटे से बचावत रही है।

इही बीच, चीन भी बांग्लादेश की विदेश नीति मा तेज़ी से अपना असर बढ़ावत है। माना जात है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान अपनी पहिली द्विपक्षीय विदेश यात्रा चीन का करि सकत हंय। चीन पहिले ही बांग्लादेश के साथ अपने रिस्तन का नई ऊंचाई पर पहुँचला बताय चुका है। एसे साफ इशारा मिलत है कि ढाका अब बहुध्रुवीय कूटनीति अपनावत हुए भारत, चीन अउर पाकिस्तान के बीच बैलेंस बनावै की कोसिस करत है। देखा जाय तौ दक्खिन एशिया की बदलती राजनीति मा बांग्लादेश का इ नया रुख खाली एक देस की विदेश नीति का बदलाव नाहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र मा ताकत के बैलेंस के नये दौर की सुरुआत माना जात है। आवै वाले समय मा इ देखब बहुत ज़रूरी होई कि भारत अउर बांग्लादेश अपने पुरानी रिस्तन का नई राजनीतिक हकीकत के साथ कइसन तालमेल बैठावत हंय।

भारत अउर बांग्लादेश के रिस्तन मा मोदी कूटनीति

खैर, जानकारन का मानब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति का सबसे मजबूत पच्छ इ रहा है कि भारत ने तमाम राजनीतिक उतार-चढ़ाव अउर तनाव के बावजूद बांग्लादेश के साथ बातचीत अउर सहयोग के रस्ता कबहूँ पूरी तइयां बंद नाहीं कीन। चाहे बिजली सहयोग होय, व्यापार, संपर्क परियोजना, सुरक्षा साझेदारी या मानवीय मदद, भारत ने हर मुस्किल समय मा ढाका का साथ दीन है। दूसर कइती चीन अउर पाकिस्तान की नीति का दक्खिन एशिया मा अक्सर अपने फ़ायदे अउर मौकापरस्ती से जुड़ा माना जात रहा है।

चीन निवेश अउर बुनियादी ढांचा के ज़रिये असर बढ़ावै की कोसिस करत है, जबकि पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के रिस्तन का इतिहास भी कइयौ संवेदनशील पन्ना से जुड़ा रहा है। अइसन मा आवै वाले समय मा बांग्लादेश का इ एहसास होइ सकत है कि भरोसा मंद अउर निस्वार्थ साथी के रूप मा भारत का महत्व सबसे ज़्यादा है। बाकि सवाल इ भी है कि जब तक ढाका इ हकीकत का पूरी तइयां समझी, तब तक कहीं रणनीतिक अउर कूटनीतिक तौर पर बहुत देर न होइ जाय।

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