
ई दुनिया बस दुइ मौका पय एक साथ ठाड़ होति है। पहिले जंग के बखत अउर दुसरे खेल के बखत। तनिक सोचीं का रउआ लागत है कि हम खेल खेले अही? हम जंग लड़े अही? फिल्म के नायक पेद्दी (राम चरण) के ई संवाद फिल्म के असली मकसद के बतावत है। असल मा, ऊ खेल के मैदान मा आपन पहिचान बनावे से ज्यादा आपन गाँव के पहिचान दिलावे के लड़ाई लड़त है। एहमा सामाजिक संदेश भी छुपल है कि देश के असली पहिचान तौ ओकर गाँव हवैं, इहिकै नाते गाँव छोड़ के भागे के जगह ओन्हैं विकसित करे के जरूरत है। बुच्ची बाबू सना के लिखल कहानी, स्क्रीनप्ले अउर संवाद के मकसद तौ नीक है। इहंवा तक पहुँचे खतिन ऊ तीन अलग-अलग खेल यानी क्रिकेट, कुश्ती अउर रेस के सहारा लीने अहैं, बाकिर गरीबी पय जुल्म, गाँव वालेन के संघर्ष, सरकारी अफसरन के तानाशाही जइसन मुद्दवन के समेटत ई फिल्म टुकड़ा-टुकड़ा मा मनोरंजन तौ करत है, बाकिर ई पूरी तरह से असरदार नाय बन पाई है।
का है राम चरण के पेद्दी के कहानी?
कहानी दिहाड़ी मजदूर पेद्दी के आस-पास घूमति है, जवने के मजबूरी खिलाड़ी बनाय दिहिस। ओकर गाँव सरकारी रिकॉर्ड मा नइखे। पेद्दी बढ़िया गुड़ बनावे के साथे-साथे तगड़ा क्रिकेटर भी है। ऊ बस चौका-छक्का मारत है। पेद्दी के गाँव तक जाए खतिन सड़क जइसन बुनियादी सुविधाओ के भारी कमी है। ओकर गाँव के एक आदमी तीस साल से कोशिश करत है कि रेलगाड़ी ओकर गाँव के लगे एक मिनट खतिन रुक जाई। एह कोशिश मा ओकर जान भी चली जात है। कहानी मोड़ लेति है अउर खेल के प्रति ओकर लगाव देख के नायडू (शिव राजकुमार) ओकरा कुश्ती सिखावत हैं। ऊ नेशनल खेले तक पहुँच जात है, बाकिर गोड़ मा चोट लागे के नाते ऊ खेल नाय पावत। बाकिर ओकर सफर इहंवा थम नाय जात। ऊ आपन मकसद कइसे हासिल करत है, कहानी एह पय टिकल है।
कहीँ भी दिल नाय छुवत हैं मुद्दे
असली रूप से तेलुगु मा बनल ई फिल्म दक्खिन भारत के संस्कृति अउर सिनेमाई स्टाइल के छाप लिहें है। ई फिल्म देखत बखत ‘द कराटे किड’, ‘दंगल’ अउर ‘चंदू चैंपियन’ के याद ताजा हो जात है। फिल्म खेल व्यवस्था पय तंज भी करत है। सुरुआत मा संवाद है कि न तौ हमार में से कउनो खेलत है, अउर न आपन बचवन के खेले देत अही, फिर भी हम सारे खेलन अउर खिलाड़ियन के भविष्य इहंवा चाय पीवत-पीवत तय करत अही। इहंवा से लागत है कि कहानी दमदारी होइ, बाकिर जइसे-जइसे कहानी आगे बढ़त है, कई जगह लागत है कि आपन दिमाग कतई न लगावा। कहानी मा जब-जब खेल के मैदान आवत है तौ रोमांच आवत है, बाकिर खेल खतम होत ही ऊ फिसल लागेला। आपसी रंजिश या टकराव के दृश्य मजेदार नाय बन पात हैं। फिल्म जातिगत भेदभाव के मुद्दा के भी छुवत है। पेद्दी के बार-बार ओकर जाति के नाते अपमानित कइया जात है, बाकिर ई मुद्दवा कहीं से भी दिल नाय छुवत हैं। दिव्येंदु शर्मा के पात्र भी भटका भइल लागत है। असली मुद्दा के सही ढंग से फिल्म उठा नाय पावत है। राजनीतिक परिवार से आवे वाली जाह्नवी कपूर के पात्र अचियम्मा बहुत कमजोर है। ओकर चित्रण भी सम्मानजनक नाय लागत। एआर रहमान के संगीत सिनेमाघर मा असर नाय छोड़ पावत है। श्रुति हसन के आइटम सॉन्ग के बोल स्तरहीन है, ई गाना जबरदस्ती ठूँसल लागल है।
पेद्दी मा शोपीस बन के रहि गइलीं जाह्नवी कपूर
पेद्दी के पूरा भार असल मा राम चरण के कंधवन पय है। इहंवा ओन्हैं एक्शन, रोमांस, डांस के साथे क्रिकेटर, पहलवान अउर धावक बने के मौका मिलल है। तीनों खेलन खतिन कइय गइ मेहनत अउर शारीरिक बदलाव स्क्रीन पय साफ झलकत है। खास कर के कुश्ती के दृश्य बहुत रोमांचक बनल हैं। ऊ आपन भूमिका के पूरी ईमानदारी से निभइत हैं। उनकर डांस विशेष रूप से बढ़िया है। जाह्नवी कपूर तौ शायद ई फिल्म रामचरण जइसन स्टार के साथ काम करे खतिन कइहें होइ हैं, बाकिर ऊ शोपीस बन के रहि गइ हैं। अइसन फिल्मन उनकर करियर के कहीं से भी ऊंचाई नाय दे पाई हैं, इहिन ओन्हैं समझे के पड़ी। अभिनेता शिव राजकुमार के अभिनय तारीफ करे लायक है। छोट भूमिका मा रवि किशन कुछ खास रंग नाय जमा पावत हैं। बोमन ईरानी आपन भूमिका के हिसाब से सही हैं। रत्नवेलु के सिनेमैटोग्राफी फिल्म के बड़का ताकत है। ऊ कुश्ती के अखाड़ा, गुड़ के कारखाना, गाँव के धूल भरी गलियन अउर रात के दृश्यन के बहुत खूबसूरती से कैमरा मा कैद कइहैं। चुस्त संपादन से एडिटर नवीन नूली फिल्म के समय कम कर सकत रहे। कुल मिला के अगर पटकथा पय गहराई से काम भवा होत तौ ई बेहतरीन मसाला फिल्म बन सकत रही।




