
स्वामी विवेकानंद कहिन अहै कि राष्ट्र कय निर्माण अकेले मरद लोगन से नाय होत अहै। मेहरारू कय योगदान ही ओका मजबूती अव संस्कार देत अहै। सुप्रीम कोर्ट भी स्वामी विवेकानंद कय इ बात का अपने शब्दिन मां परिभाषित करिस। कोर्ट अपने ऐतिहासिक फैसला मां कहिस कि मेहरारू ‘हाउसवाइफ’ (घरेलू काम करे वाली) नाय, बल्कि राष्ट्र निर्माता अहैं। मतलब इ कि देश कय बनवै मां जेतना योगदान आपके अव हमारे जइसन नौकरी करे वाला लोगन कय अहै, ओतना ही योगदान घर मां काम करे वाली एक सामान्य मेहरारू कय भी अहै।
सुप्रीम कोर्ट सड़क दुर्घटना मां घरेलू काम करे वाली मेहरारू कय मौत अव मुआवजा कय मामला मां बड़ा फैसला सुनाइस। कोर्ट कहिस कि सड़क दुर्घटना मां घरेलू मेहरारू कय मौत या काम न कर पाय कय हालत मां मुआवजा तय करै कय तरीका अलग होई। मुआवजा तय करत बखत मेहरारू कय ओर से परिवार का दीन जाय वाली घरेलू देखरेख कय नुकसान का भी आधार माना जाई। कोर्ट साफ करिस कि घरेलू देखरेख कय नुकसान मोटर दुर्घटना मामला मां अब मिलै वाला अन्य मुआवजा से अलग होई। सीधा शब्दिन मां कहैं तौ देश कय सबसे बड़ कोर्ट अब मेहरारू लोगन कय मेहनत का भी मुआवजा कय आधार मान लीन अहै।
इ केस 25 नवंबर 2001 का सिरसा कय फतेहाबाद मां भवा एक हादसा से जुड़ा रहा। हादसा मां मेहरारू कय मौत होइ गवा। उनके तीन बच्चन रहे। परिवार का मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल से 2 लाख रुपया कय मुआवजा मिला। बीमा कंपनी मुआवजा जोड़त बखत उनके घरेलू काम कय मूल्य शून्य मान लीन। परिवार इ फैसला से खुश नाहीं रहा तौ हाई कोर्ट गवा। सितंबर 2024 मां पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट मुआवजा बढ़ाके ₹8,43,000 कर दिहिन। परिवार मुआवजा और बढ़ावै कय मांग लइके सुप्रीम कोर्ट गवा। सुप्रीम कोर्ट मेहरारू कय घरेलू योगदान का ध्यान मां राखत कुल मुआवजा 62,77,900 रुपया तय करिस।
फैसला कय बड़ी बात
30 हजार रुपया प्रतिमाह मूल्य कय मतलब… गृहिणी कय मौत पै मुआवजा लेइ खतिन ₹30,000 प्रतिमाह न्यूनतम आय मानल जाई। फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स, मल्टीप्लायर अव अन्य मद जोड़िके मुआवजा तय होई।
कामकाजी मेहरारू पै भी लागू होई… अगर कवनो मेहरारू नौकरी कय साथ घर संभालत अहै, तौ हादसा मां मौत भवै पै मुआवजा तय करत बखत ‘लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर’ (घरेलू देखरेख कय नुकसान) कय हिस्सा उनके आय मां अलग से जुड़ि जाई।
जीडीपी मां 17% तक योगदान… कोर्ट कहिस, मेहरारू लोगन कय घरेलू काम कय जीडीपी मां 17% तक योगदान मानल जात अहै। 15 से 59 साल कय मेहरारू रोज 7 घंटा से ज्यादा बिना पइसा कय घरेलू काम करत अहैं।
न्याय खतिन 15 से 18 साल कय इंतजार… मुआवजा केस बरसन तक लटकै पै कोर्ट ध्यान दीन। 120 से ज्यादा मामला कय विश्लेषण मां पता चला कि हाई कोर्ट मां अइसन मामला औसतन 8 साल अव ट्रिब्यूनल मां 6 साल तक लटकत अहैं। कई मामला मां पीड़ितन का न्याय खतिन 15 से 18 साल तक इंतजार करै का पड़ा। कोर्ट कहिस कि इ देरी न्याय कय अवधारणा का कमजोर करत अहै।
अर्थव्यवस्था मां भागीदारी: श्रम बल कय गणना करत बखत अक्सर इ पक्ष छूट जात अहै। विकसित देशन कय तुलना मां भारत मां मेहरारू कय श्रम भागीदारी दर (LFPR) कम होव कय एक वजह इ भी अहै। 2025 कय जुलाई-सितंबर तिमाही मां 15 साल अव ओसे ज्यादा उमिर कय मेहरारू कय श्रम भागीदारी दर 33.7% रही। पिछली तिमाही कय तुलना मां इ मां थोडा बढ़त रही, पर विकसित देशन से तुलना करैं तौ भारत अबहूँ पीछे दिखत अहै। अब सुप्रीम कोर्ट जब घरेलू काम कय कीमत मापय कय पैमाना दिय अहै, तौ उम्मीद अहै कि देश कय अर्थव्यवस्था मां होममेकर्स कय योगदान भी आधिकारिक रूप से दर्ज होई।
नीतियन मां जगह: अदालत पहले भी कहि चुकि अहै कि मेहरारू लोगन कय घरेलू सेवा कय अनदेखी नाय कीन जा सकत। उनके काम कय एक निश्चित आर्थिक मूल्य होत अहै। इ ताजा फैसला से आधी आबादी कय योगदान का लइके और साफ स्थिति पैदा भई अहै। जरूरत इ अहै कि समाज भी इ बात का समझे। नीति बनावत बखत होममेकर्स कय भी ध्यान राखि जाय।