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भारत के खिलौना परितंत्र को मजबूत करना, स्थानीय शिल्प कौशल से लेकर वैश्विक बाज़ारों तक

भारत का खिलौना उद्योग सांस्कृतिक विरासत, नवाचार और विनिर्माण क्षमता के संगम के रूप में उभर रहा है।

भारत में खिलौनों की परंपरा केवल बच्चों के मनोरंजन तक सीमित नहीं रही है। यह देश की सांस्कृतिक स्मृति, लोककथाओं, पारंपरिक शिल्प और सामाजिक मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का माध्यम भी रही है। सिंधु घाटी सभ्यता की मिट्टी की गाड़ियों से लेकर आधुनिक शैक्षिक, इलेक्ट्रॉनिक और एसटीईएम आधारित खिलौनों तक, भारत की खिलौना परंपरा लगभग 5,000 वर्षों पुरानी है। आज यही विरासत आधुनिक डिजाइन, तकनीक और उद्यमिता के साथ मिलकर भारत को वैश्विक खिलौना विनिर्माण के एक उभरते केंद्र के रूप में स्थापित कर रही है।

प्राचीन परंपरा से आधुनिक अवसर तक

भारत के प्राचीन नगरों हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की खुदाई से प्राप्त खिलौने यह प्रमाणित करते हैं कि प्राचीन भारत में खिलौना निर्माण की समृद्ध परंपरा थी। मिट्टी की गाड़ियां, पशु-पक्षियों की आकृतियां और लोककथाओं से प्रेरित गुड़िया भारतीय समाज की रचनात्मकता और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं।

समय के साथ भारतीय कारीगरों ने लकड़ी, मिट्टी, कपड़े, धातु और चमड़े जैसे स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके आकर्षक खिलौने बनाए। चन्नापटना के लकड़ी के खिलौने, तंजावुर की गुड़िया और इंदौर के चमड़े के खिलौने इस परंपरा के जीवंत उदाहरण हैं। आज इन पारंपरिक शिल्पों को आधुनिक डिजाइन, गुणवत्ता मानकों और वैश्विक विपणन से जोड़कर नई पहचान दी जा रही है।

घरेलू मांग से बढ़ती संभावनाएं

भारत की बड़ी युवा आबादी खिलौना उद्योग के लिए एक मजबूत घरेलू बाजार प्रदान करती है। 1.4 अरब से अधिक आबादी वाले देश में 25 वर्ष से कम आयु के लोगों की संख्या बहुत अधिक है। बढ़ती आय, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण खिलौनों पर खर्च करने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है।

आज माता-पिता केवल मनोरंजन के लिए खिलौने नहीं खरीदते, बल्कि ऐसे खिलौनों को प्राथमिकता देते हैं जो बच्चों के सीखने, रचनात्मकता और संज्ञानात्मक विकास में सहायक हों। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) आधारित खिलौनों की मांग में वृद्धि इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।

साथ ही, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के विस्तार ने खिलौना निर्माताओं को देश के दूरस्थ बाजारों तक पहुंचने का अवसर दिया है। इससे छोटे कारीगरों और स्थानीय निर्माताओं के लिए भी नए बाजार खुल रहे हैं।

निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि

भारत के खिलौना उद्योग ने पिछले दशक में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की है। वर्ष 2017-18 में खिलौनों का कुल निर्यात 152.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो 2025-26 में बढ़कर 384.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। यह 151.9 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है।

विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक और गैर-इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों (एचएसएन 9503) के निर्यात में लगभग 160 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह 77.35 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 200.89 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। अमेरिका भारत का प्रमुख निर्यात गंतव्य बनकर उभरा है, जहां खिलौनों का निर्यात 26.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर लगभग 111.9 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया।

इसके अतिरिक्त, वीडियो गेम कंसोल और मनोरंजन उत्पादों के निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारतीय खिलौने अब वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता हासिल कर रहे हैं।

व्यापार अधिशेष की उपलब्धि

खिलौना उद्योग की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक यह है कि भारत 2025-26 में प्रमुख खिलौना श्रेणियों में 152 मिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार अधिशेष प्राप्त करने में सफल रहा। वर्ष 2017-18 में जहां इस क्षेत्र में 213.01 मिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार घाटा था, वहीं अब भारत खिलौनों का शुद्ध निर्यातक बनकर उभरा है।

यह परिवर्तन घरेलू विनिर्माण क्षमता में वृद्धि, गुणवत्ता मानकों के सख्त अनुपालन और आयातित खिलौनों पर निर्भरता में कमी का परिणाम है।

सरकारी पहलें: उद्योग को नई दिशा

राष्ट्रीय खिलौना कार्य योजना (एनएपीटी), 2020

राष्ट्रीय खिलौना कार्य योजना का उद्देश्य भारतीय मूल्यों, संस्कृति और इतिहास पर आधारित खिलौनों के डिजाइन को बढ़ावा देना है। यह योजना स्वदेशी खिलौना निर्माण, गुणवत्ता सुधार और असुरक्षित आयातित खिलौनों पर नियंत्रण के माध्यम से घरेलू उद्योग को मजबूत कर रही है।

गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (क्यूसीओ)

वर्ष 2020 में लागू किए गए गुणवत्ता नियंत्रण आदेश के तहत भारत में बेचे जाने वाले सभी खिलौनों के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) प्रमाणन अनिवार्य किया गया। मई 2026 तक बीआईएस ने घरेलू निर्माताओं को 1,786 लाइसेंस और विदेशी निर्माताओं को 56 लाइसेंस प्रदान किए हैं।

इस कदम से बाजार में सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाले खिलौनों की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है तथा घरेलू निर्माताओं को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिला है।

टैरिफ और घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन

सरकार ने 2020 में खिलौनों पर मोस्ट-फेवर्ड नेशन (एमएफएन) टैरिफ 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत किया, जिसे 2023 में 70 प्रतिशत कर दिया गया। इस नीति का उद्देश्य सस्ते आयातित खिलौनों पर निर्भरता कम करना और घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करना था।

टॉयकैथॉन और ई-टॉयकैथॉन

टॉयकैथॉन पहल छात्रों, शिक्षकों, डिजाइनरों और स्टार्ट-अप्स को भारतीय संस्कृति, लोककथाओं और मूल्यों से प्रेरित अभिनव खिलौने विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करती है। 2025 में आयोजित ई-टॉयकैथॉन ने इलेक्ट्रॉनिक और शैक्षिक खिलौनों के विकास को नई दिशा प्रदान की।

ई-खिलौना लैब

नोएडा स्थित सी-डैक में स्थापित ई-खिलौना लैब स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के डिजाइन, प्रोटोटाइप विकास और परीक्षण में प्रशिक्षण प्रदान करती है। यह पहल तकनीक आधारित खिलौना उद्योग को मजबूत करने और युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने में सहायक है।

ओडीओपी और जीआई टैग: स्थानीय शिल्प को वैश्विक पहचान

एक जिला, एक उत्पाद (ओडीओपी) पहल के अंतर्गत कई पारंपरिक खिलौना उत्पादों की पहचान कर उन्हें ब्रांडिंग, पैकेजिंग, कौशल विकास और विपणन सहायता प्रदान की जा रही है। इससे स्थानीय कारीगरों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिल रहा है।

इसी प्रकार भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग प्राप्त खिलौनों ने भारतीय शिल्प कौशल को वैश्विक पहचान दिलाई है। चन्नापटना खिलौने, तंजावुर गुड़िया और इंदौर के चमड़े के खिलौने जैसे उत्पाद न केवल सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि ग्रामीण कारीगरों की आजीविका को भी मजबूत करते हैं।

आर्थिक प्रभाव और रोजगार सृजन

खिलौना उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में उभर रहा है। यह क्षेत्र ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में कारीगरों, निर्माताओं, व्यापारियों और छोटे उद्यमियों के लिए रोजगार और आय के अवसर पैदा कर रहा है।

खेल और खिलौना क्षेत्र में रोजगार 2018-19 में 8,685 से बढ़कर 2023-24 में 17,693 हो गया। यह वृद्धि दर्शाती है कि खिलौना उद्योग स्थानीय उद्यमिता और रोजगार सृजन का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।

वैश्विक बाजार में भारत की बढ़ती भूमिका

भारत के खिलौना उद्योग को वैश्विक स्तर पर कई कारणों से प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त है:

  • समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जो भारतीय खिलौनों को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
  • बड़ा घरेलू बाजार, जो उद्योग को स्थिर मांग प्रदान करता है।
  • कुशल कारीगर और पारंपरिक शिल्प कौशल, जो हस्तनिर्मित और कलात्मक खिलौनों को वैश्विक बाजार में आकर्षक बनाते हैं।
  • सरकारी नीति समर्थन, जो गुणवत्ता, सुरक्षा और घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करता है।
  • मुक्त व्यापार समझौते, जो भारतीय खिलौनों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेहतर पहुंच प्रदान करते हैं।

आगे की राह

भारत का खिलौना उद्योग अब केवल पारंपरिक शिल्प तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नवाचार, डिजाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स और शिक्षा आधारित उत्पादों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आने वाले समय में निम्नलिखित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है:

  • शैक्षिक और एसटीईएम खिलौनों का विकास।
  • सुरक्षित, टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खिलौनों का उत्पादन।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऑगमेंटेड रियलिटी और वर्चुअल रियलिटी आधारित स्मार्ट खिलौनों का विस्तार।
  • स्थानीय कारीगरों को डिजाइन, पैकेजिंग और डिजिटल विपणन का प्रशिक्षण।
  • वैश्विक गुणवत्ता मानकों और प्रमाणन प्रक्रियाओं को और मजबूत करना।

भारत का खिलौना उद्योग अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक तकनीक और वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं के साथ सफलतापूर्वक जोड़ रहा है। राष्ट्रीय खिलौना कार्य योजना, गुणवत्ता नियंत्रण आदेश, ओडीओपी, जीआई टैग, टॉयकैथॉन और ई-खिलौना लैब जैसी पहलें इस उद्योग को नई दिशा प्रदान कर रही हैं।

निर्यात में वृद्धि, व्यापार अधिशेष की उपलब्धि, रोजगार सृजन और स्थानीय कारीगरों को वैश्विक पहचान मिलने से यह स्पष्ट है कि भारत का खिलौना परितंत्र तेजी से मजबूत हो रहा है। यदि यह गति बनी रहती है, तो भारत न केवल अपने बच्चों के लिए सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और सांस्कृतिक रूप से जुड़े खिलौने उपलब्ध कराएगा, बल्कि वैश्विक खिलौना बाजार में भी एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित होगा।

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