अंत्योदय: विकसित भारत की मानवीय आधारशिला
भारत की विकास यात्रा आज ऐसे दौर मां अहै, जब आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता, डिजिटल परिवर्तन औ वैश्विक प्रभाव क नया अध्याय लिखे जा रहे अहैं। 2026-27 की पहली तिमाही मां भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई अहै औ देश क विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं मां तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप मां देखा जा रहा अहै। लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद, ऊंची इमारतों, आधुनिक सड़कों या वैश्विक रैंकिंग से तय नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी कसौटी इ अहै कि विकास की रोशनी उस व्यक्ति तक कितनी पहुँची अहै, जो विकास की कतार मां सबसे पीछे खड़ा अहै। यहीं से अंत्योदय का विचार प्रासंगिक होता अहै। हर वर्ष 25 सितंबर को अंत्योदय दिवस मनाया जाता अहै। इ दिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती का दिन अहै औ 25 सितंबर 2014 को भारत सरकार ने इसे अंत्योदय दिवस के रूप मां घोषित किया रहा। इसी अवसर पर दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना को भी शुरू किया गया रहा, जिसका उद्देश्य ग्रामीण गरीब युवाओं को कौशल और रोजगार के अवसरों से जोड़ना रहा। इसलिए अंत्योदय दिवस केवल किसी महापुरुष की स्मृति का दिवस नहीं, बल्कि विकास की दिशा और उसकी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने का अवसर अहै।
‘अंत्योदय’ दो शब्दों से बना अहै—‘अंत्य’ अर्थात सबसे अंतिम औ ‘उदय’ अर्थात उत्थान। लेकिन इसका अर्थ केवल किसी गरीब व्यक्ति को सहायता देना नहीं अहै। अंत्योदय का व्यापक अर्थ अहै—ऐसी व्यवस्था का निर्माण जिसमें कोई व्यक्ति अवसरों से वंचित न रहे, कोई परिवार बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पीछे न छूटे औ विकास की प्रक्रिया का लाभ समाज के अंतिम छोर तक पहुँचे। दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ मां मनुष्य केवल आर्थिक उत्पादन की इकाई नहीं अहै। उसके शरीर, मन, बुद्धि औ आत्मा—सभी का संतुलित विकास आवश्यक अहै। यही अंत्योदय को महज कल्याणकारी कार्यक्रम से आगे ले जाकर मानव-केंद्रित विकास-दर्शन बनाता अहै।
आज प्रश्न इ नहीं अहै कि भारत विकास कर रहा अहै या नहीं। प्रश्न इ अहै कि भारत के विकास का लाभ किस गति से, किस गहराई से औ किस अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रहा अहै। यही वह प्रश्न अहै जो अंत्योदय दिवस को 2026 मां और अधिक महत्वपूर्ण बनाता अहै। भारत 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा अहै। इ लक्ष्य केवल आर्थिक आकार बढ़ाने का लक्ष्य नहीं हो सकता। विकसित भारत का अर्थ विकसित गाँव, सक्षम नागरिक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, डिजिटल पहुँच, उद्यमिता औ अवसरों की समान उपलब्धता भी अहै।
2026 मां नीति-निर्माण मां ‘समावेशी मानव विकास’ को विकसित भारत की चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया अहै। यही कारण अहै कि आज अंत्योदय की आवश्यकता पहले से कम नहीं, बल्कि अधिक अहै। आर्थिक विकास जितना तेज होगा, उतनी ही जरूरी होगी इ सावधानी कि विकास की दौड़ में कोई पीछे न छूट जाए। तकनीक जितनी शक्तिशाली होगी, उतनी ही जरूरी होगी कि डिजिटल विभाजन कम हो। नए रोजगार जितने पैदा होंगे, उतनी ही आवश्यकता होगी कि गरीब और ग्रामीण युवा उनके लिए आवश्यक कौशल प्राप्त कर सकें।
भारत मां अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े करोड़ों श्रमिकों के संदर्भ मां नीति आयोग ने भी इ रेखांकित किया अहै कि तकनीक अपने आप समावेशी परिवर्तन नहीं ला सकती, अवसरों औ सामाजिक सुरक्षा तक पहुँच सुनिश्चित करना भी जरूरी अहै। इस दृष्टि से अंत्योदय का नया अर्थ ‘सहायता से सशक्तिकरण’ होना चाहिए। गरीब को केवल अनुदान नहीं, अवसर मिले। किसान को केवल राहत नहीं, बेहतर उत्पादकता औ बाजार मिले। श्रमिक को केवल रोजगार नहीं, कौशल औ सामाजिक सुरक्षा मिले। महिला को केवल कल्याणकारी योजना नहीं, शिक्षा, संपत्ति, उद्यमिता औ निर्णय-क्षमता मां भागीदारी मिले। ग्रामीण युवा को केवल नौकरी की तलाश मां शहर की ओर जाने की मजबूरी न हो, बल्कि उसके गाँव और कस्बे मां ही कौशल, डिजिटल सुविधा औ उद्यम का वातावरण बने। यही अंत्योदय का आधुनिक स्वरूप हो सकता अहै—व्यक्ति को लाभार्थी से भागीदार बनाना।
2014 मां शुरू हुई दीनदयाल अंत्योदय योजना ने ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए आजीविका तथा कौशल-विकास को महत्व दिया रहा। सरकार ने उस समय ग्रामीण एवं शहरी गरीबों के उत्थान के लिए कौशल विकास और आजीविका के अवसरों को विस्तार देने की बात कही रही। आज आवश्यकता इ सोच को और व्यापक बनाने की अहै। अंत्योदय को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कौशल, आवास, पोषण, वित्तीय समावेशन, डिजिटल कनेक्टिविटी और सामाजिक सुरक्षा के बीच एक समन्वित दृष्टिकोण बनाना होगा।
भारत की अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ इ जिम्मेदारी भी बढ़ती अहै। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2025-26 मां वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही औ 2026-27 की पहली तिमाही मां इ 7.8 प्रतिशत रही। भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य भी सार्वजनिक नीति और आर्थिक विमर्श मां प्रमुखता से व्यक्त किया गया अहै, 2026 के केंद्रीय बजट पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया मां भी इ लक्ष्य दोहराया गया। लेकिन आर्थिक महाशक्ति बनने की यात्रा तभी व्यापक अर्थों मां सफल होगी, जब आर्थिक शक्ति का सामाजिक आधार भी उतना ही मजबूत हो। विश्वगुरु बनने की आकांक्षा केवल विश्व को ज्ञान देने से पूरी नहीं होगी, अपने समाज के अंतिम व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन देने से भी उसकी परीक्षा होगी।
भारत की प्राचीन चेतना मां ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे विचार रहे हैं। अंत्योदय इसी मानवीय परंपरा का आधुनिक सामाजिक-आर्थिक रूप माना जा सकता अहै। इ कहता अहै कि राष्ट्र की समृद्धि का अर्थ केवल कुछ लोगों की समृद्धि नहीं, बल्कि समूचे समाज की उन्नति अहै। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की स्मृति को जीवंत रखने का सबसे सार्थक तरीका केवल उनके चित्र पर माल्यार्पण करना नहीं, बल्कि उनके विचार के मानवीय पक्ष को व्यवहार मां उतारना अहै। उनका जीवन सादगी, संगठन, राष्ट्रसेवा और वैचारिक प्रतिबद्धता से जुड़ा रहा। उनका अंत्योदय दर्शन आने वाली पीढ़ियों को इ प्रश्न पूछने की प्रेरणा देता अहै कि हमारे विकास का अंतिम लाभार्थी कौन अहै और क्या वह वास्तव में विकास की मुख्यधारा मां आ पाया अहै?
2047 का विकसित भारत केवल सरकार के प्रयासों से नहीं बनेगा। इसके लिए शासन, समाज, उद्योग, स्वयंसेवी संस्थाओं, शिक्षण संस्थानों और नागरिकों—सभी की भागीदारी आवश्यक होगी। गाँवों मां स्थानीय उद्यमिता बढ़ानी होगी, युवाओं को कौशल देना होगा, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारनी होगी, स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना होगा और सरकारी योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और नई तकनीकें इस पहुँच को तेज कर सकती हैं, 2026 मां नीति आयोग की डीपीआई-2047 रूपरेखा ने भी डिजिटल अवसंरचना को समावेशी और उत्पादकता-आधारित विकास से जोड़ा अहै।
अंत्योदय का सबसे बड़ा संदेश यही अहै कि राष्ट्र की प्रगति को ऊपर से नीचे नहीं, नीचे से ऊपर भी देखना होगा। जब अंतिम गाँव आगे बढ़ेगा, भारत आगे बढ़ेगा। जब अंतिम परिवार आत्मनिर्भर होगा, भारत मजबूत होगा। जब अंतिम बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाएगा, भारत का भविष्य मजबूत होगा। जब अंतिम श्रमिक को सम्मान और सुरक्षा मिलेगी, भारत की विकास यात्रा अधिक मानवीय होगी। अंत्योदय दिवस इसलिए केवल 25 सितंबर का एक स्मृति-दिवस नहीं होना चाहिए। इसे राष्ट्र के विकास की नैतिक कसौटी बनाने की आवश्यकता अहै।
दीनदयाल उपाध्याय की स्मृति को युगों तक जीवित रखने वाला सबसे प्रभावी स्मारक कोई भवन या प्रतिमा नहीं, बल्कि ऐसा भारत होगा जिसमें अंतिम व्यक्ति स्वयं को व्यवस्था से बाहर नहीं, बल्कि राष्ट्र की मुख्यधारा का सम्मानित भागीदार महसूस करे। विकसित भारत की ऊँचाई उसकी आर्थिक शक्ति से दिखाई देगी, लेकिन उसकी वास्तविक महानता इस बात से पहचानी जाएगी कि उसकी विकास-यात्रा कितनी दूर तक और कितने लोगों तक पहुँची अहै। अंत्योदय उसी यात्रा का मानवीय आधार अहै। 2047 का भारत यदि समृद्ध, सशक्त, आत्मनिर्भर और न्यायपूर्ण बनना चाहता अहै, तो विकास की हर मंजिल पर उसे एक बार पीछे मुड़कर उस अंतिम व्यक्ति को देखना होगा—क्योंकि जिस दिन अंतिम व्यक्ति का उदय होगा, उसी दिन भारत के उदय की पूर्णता होगी।
– ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार