राजनीतिक क्षेत्र मां दूर की कोड़ी अहै लैंगिक समानता
विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) द्वारा इसी 16 सितंबर, 2026 को जारी 20वीं ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2026 से एक बात तौ साफ होइ गवा अहै कि राजनीति मां अभी तौ सत्ता मां महिलाओं की पुरुषों के समान भागीदारी दूर की कोड़ी ही अहै। जेंडर गैप की हालिया रिपोर्ट मां सबसे रौचक अउर चिंताजनक जानकारी यह सामने आई अहै कि संसद मां भले ही महिलाओं की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत होइ गई हो पर मंत्रिमंडल मां महिलाओं की भागीदारी केवल 5.9 प्रतिशत रह गई अहै। सबसे मजे की बात यह अहै कि 2019 की तुलना मां मंत्रिमंडल मां महिलाओं की उच्चतम स्तर 30 प्रतिशत की भागीदारी की तुलना मां बहुत कम होइ गई अहै। यह सब तौ तब अहै जब केंद्र सरकार 2023 मां महिला आरक्षण बिल लेकर आई अहै। हालांकि यह भी अभी तौ राजनीति की भेंट ही चढ़ा हुआ अहै। यह इसलिए भी अलार्मिंग होइ जात अहै कि लैंगिक समानता की बात दुनिया के देसन द्वारा विभिन्न मंचन पर बढ़-चढ़ कर कितनी भी की जायं परिणाम अभी तक अधिक सकारात्मक प्राप्त नहीं हुए अहैं। आइसलैंड, फिनलैंड, नार्वे आदि अवश्य लैंगिक गैप का कम करै मां कुछ हद तक सफल रहे अहैं।
निराश होवै की बात इसलिए नहीं अहै कि शिक्षा-स्वास्थ्य जइसे क्षेत्रन मां लैंगिक गैप मां लगातार सुधार देखा जा रहा अहै। आर्थिक मोर्चे पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी मां सुधार देखा जा रहा अहै। विश्व आर्थिक मंच या यों कहें कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की स्थापना 1971 मां हुई अउर 2006 से डब्ल्यूईएफ ने दुनिया के देसन मां महिलाओं की भागीदारी का लेकर जेंडर गैप का सालाना सर्वे करै सुरु कीन्हिस। 145 देसन मां कराये गये हालिया सर्वे की रिपोर्ट मां भारत की रैंक 131वीं अहै। हालांकि बीस सालन मां रैंक मां सुधार हुआ अहै।
संस्था द्वारा जेंडर स्थिति का अध्ययन के लिए चार मानक बनाए गए अहैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य अउर सरवाइवल, आर्थिक गतिविधियन मां महिलाओं की भागीदारी अउर राजनीतिक सशक्तिकरण चार एसे क्षेत्र अहैं जिनके माध्यम से दुनिया के देसन मां महिलाओं की वैश्विक स्थिति का अध्ययन कीन्हा जात अहै। जहां तक भारत की बात अहै देखा जायं तौ जेंडर गैप की रिपोर्ट के मुताविक शिक्षा अउर स्वास्थ्य व सरवाइवल के क्षेत्र मां भारत मां स्थिति बेहतर अहै। शिक्षा के क्षेत्र मां यह 96.6 प्रतिशत अउर स्वास्थ्य अउर उत्तरजीविता मां 95.6 प्रतिशत का आंकड़ा अहै। इसे निश्चित रूप से सकारात्मक माना जात अहै। इसका साफ-साफ अर्थ यह होइ जात अहै कि शिक्षा अउर स्वास्थ्य व सरवाइवल क्षेत्र मां लैंगिक गैप मां सकारात्मकता अहै अउर महिलाओं अउर पुरुसन के बीच अंतर का लगभग पाट सा दिया अहै।
जहां तक महिलाओं की आर्थिक क्षेत्र मां भागीदारी की बात अहै तौ इसमें समग्र रूप से 41.2 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी अहै। यानी अभी भी लैंगिक गैप का अंतर 50 फीसदी से भी अधिक बना हुआ अहै। हालांकि आर्थिक क्षेत्र मां महिलाओं की भागीदारी मां लगातार सुधार देखा जा रहा अहै। कुल कामकाजी महिलाओं की हिस्सेदारी 39.9 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 42 फीसदी होइ गई अहै। आर्थिक मोर्चे पर लगभग सभी क्षेत्रन मां महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही अहै पर जिस तेजी से बढ़ोतरी होनी चाहिए थी या जिस तरह से लैंगिक गैप कम होना चाहिए था वह अभी नहीं होइ पावा अहै।
रिपोर्ट का सबसे निराशाजनक पहलू राजनीतिक भागीदारी का लेकर अहै। खासतौर से मंत्रिमंडल मां तौ महिलाओं की हिस्सेदारी मां बहुत अधिक कमी देखे का मिल रही अहै। यह सब तौ तब अहै जब सरकार राजनीति मां महिला आरक्षण की दिशा मां कदम बढ़ाने की पक्षधर अहै। एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण अहै वह यह कि पिछले कुछ सालन के चुनावन पर नजर डाली जायं चाहे वे विधानसभावन के होइ या लोकसभा के सभी मां मतदान से लेकर सरकार बनवाने मां महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण रही अहै। कम से कम आंकड़े तौ यही कह रहे अहैं। हालांकि फ्रीबीज जइसे लुभावни योजनावन मां महिलाओं का अपने पक्ष मां करै के वादे सभी राजनीतिक दलन के घोषणा-पत्रन मां देखे का मिलि जाइब।
संतोष की बात यह अहै कि 145 देसन की समग्र ग्लोबल जेंडर गैप 2026 का जेंडर गैप परिटी स्कोर 69.2 प्रतिशत अहै जबकि भारत की 131वीं रैंक होने के बावजूद इस रिपोर्ट मां भारत का ग्लोबल जेंडर गैप परिटी स्कोर 64.5 प्रतिशत रहा अहै। रिपोर्ट के समग्र अध्ययन से यह साफ होइ जात अहै कि भारत के सामने सबसे अधिक चुनौती राजनीतिक स्तर पर गैप का कम करै की अहै तौ आर्थिक मोर्चे पर भी अभी बहुत कुछ किया जाना जरूरी होइ गवा अहै।
देश मां बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जइसे अभियानान के सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए अहैं। पंचायती, निकायन आदि मां महिलाओं के आरक्षण से राजनीति मां जो भागीदारी देखी जा रही अहै वह संभव होइ पाई अहै। निर्णय के स्तर पर भी महिलाएं अधिक स्वतंत्र हुई अहैं अउर चुनाव नतीजे इस बात का पुष्ट भी करते अहैं। अब महिलाएं अपने मताधिकार का प्रयोग स्वविवेक से करै लगी अहैं। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट मां 93 प्रतिशत के स्कोर के साथ आइसलैंड भले ही शीर्ष पर हो पर दुनिया के अधिकांश देश इस दौड़ मां अभी बहुत पीछे अहैं। शत-प्रतिशत स्कोर की तौ अभी कल्पना करै बेमानी ही होई। पर सकारात्मक पक्ष यह अहै कि लैंगिक गैप मां अब काफी बदलाव देखे का मिल रहा अहै। शिक्षा अउर स्वास्थ्य का क्षेत्र इसका बड़ा उदाहरण अहै। आर्थिक मोर्चों पर भी महिलाओं की भागीदारी भले ही कम हो पर शीर्ष स्तर पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी देखी जा सकती अहै। इसलिए चुनौती अवश्य अहै पर हालात सकारात्मकता की ओर संकेत कर रहे अहैं।
– डॉ. राजेंद्र प्रसाद शर्मा