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सोनभद्र मा बायो-फ्लॉक तकनीक से मेहरारुन के तरक्की अउर खुशहाली के नवा अध्याय

सोनभद्र के चपईल गाँव मा स्वयं सहायता समूह के मेहरारू 'उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन' के मदद से बायो-फ्लॉक तकनीक से मछली पालन कइके अपनी तकदीर बदलि रही अहैं।

राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन


उत्तर प्रदेश के जिला सोनभद्र के सुदूर पथरीले अउर पहाड़ी इलाकन मा, जहाँ हमेशा पानी के तंगी अउर ऊबड़-खाबड़ जमीन खेती व कमाई के राह मा अड़चन बनी रहत रही, हुवां अब तरक्की के एक नई कहानी लिखी जाइ रही अअइ। “उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (UPSRLM)” के देख-रेख मा चलि रही योजनन गाँव के मेहरारुन का खाली रुपिया-पइसा के मजबूती नाहीं दिहिन, बल्कि उनका एक ‘व्यापारी’ के रूप मा एक नई पहिचान भी दिहिन अअइ। जिला के विकास खण्ड चतरा के ग्राम चपईल मा “शिव गुरु आजीविका स्वयं सहायता समूह” के कामयाबी ए बात के जीती-जागती मिसाल अअइ कि अगर सरकारी योजनन के सही इस्तेमाल अउर वैज्ञानिक सोच एक साथ मिलि जाय, त कठिन से कठिन हालात मा भी खुशहाली के दुआर खुलि सकत अहैं। यहाँ के मेहरारुन पुरान अउर जोखिम भरे मछली पालन के जगह पर आधुनिक ‘बायो-फ्लॉक’ तकनीक का अपनाय के अपनी जिंदगी के आधार बदलि दिहिन अअइ। ई बदलाव के असली रीढ़ सरकार के उ माली मदद अअइ, जउन गाँव के गरीब लोगन का सीधे साधन से जोड़त अअइ। योजना के तहत एक बायो-फ्लॉक यूनिट लगावै बरे कुल ₹3.5 लाख के खरचा तय कीन गवा रहा, जेहमा से ₹2 लाख के बहुत बड़ी रकम आजीविका निधि के रूप मा मिशन द्वारा सीधे ग्राम संगठन का दीन गई। बाकी के रुपिया सी.आई.एफ. (कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड) से कर्ज के रूप मा लइके इन मेहरारुन अपने गोड़ पर खड़ा होय के हिम्मत जुटाइन, जउन सरकारी तंत्र के दया अउर दूर की सोच का देखावत अअइ।

सोनभद्र जइसन इलाका मा, जहाँ मनई के जिंदगी पूरी तना बरखा के पानी पर टिकी रहत है अउर जेठ-बइसाख के महिना मा ताल-तलइया सूख जाय से मछली पालन जइसन धंधा मा बहुत घाटा सहे का पड़त रहा, हुवां बायो-फ्लॉक तरीका एक भगवान के वरदान जइसन सामने आवा अअइ। एही तकनीक के सबसे बड़ी खूबी ई अअइ कि एमा पानी बहुत कम लागत है अउर थोड़े से जगह मा बहुत ज्यादा पैदावार होत अअइ। खाली 1300 वर्ग फीट के पानी के टंकी मा, जहाँ पानी के अदला-बदली बहुत कम करे का पड़त है, हुवां 2000 मछलियन का पालल जाइ सकत है। सरकारी मदद से समूह के मेहरारून आज के बखत मा 4 टैंक लगाए अहैं, जेहमा लगभग 6000 मछलियन का वैज्ञानिक तरीका से पाला जाइ रहा अअइ। ई मछलियाँ खाली 7 महीना के भीतर ही बेचे बरे तैयार होय जात अहैं। अगर रुपियन के हिसाब से देखा जाय त 7 महिना के एक चक्र मा ₹6 से ₹7 लाख तक के बिक्री होय जात अअइ, जेहसे समूह के मेहरारुन का ₹1 से ₹2 लाख के शुद्ध मुनाफा होय रहा अअइ।

ई फायदा खाली कागजी आँकड़न तक नाहीं अअइ, बल्कि इसने गाँव-समाज के उ कड़वी हकीकत का बदलि दिहिस अअइ जहाँ मेहरारू मजूरी करइ बरे दूसरे गाँव जाइ का मजबूर रही। पहिले धान-गेहूँ के कटाई के बखत खाली ₹100 अउर 3 किलो चउर के मजूरी पर दिन भर खटइ वाली मेहरारू अब अपने घर के आँगन मा काम करत भए आदर के साथे रोज ₹300 तक कमाय रही अहैं। एसे न खाली गाँव से होय वाला पलायन रुका अअइ, बल्कि मेहरारू अब अपने बच्चन के पढ़ाई-लिखाई अउर दवाई-इलाज पर भी बढ़िया ध्यान दइ पावत अहैं।

सरकार के तरफ से मिली 03 दिन के ट्रेनिंग इन मेहरारुन का तकनीकी रूप से इतना हुनरमंद कइ दिहिस अअइ कि ऊ अब टार्पुलिन टैंक, प्रोटेक्टिव लाइनर, एयर पम्प अउर टीडीएस मीटर जइसन औजारन का बड़ी आसानी से चलाय रही अहैं। गाँव-घर मा ही इन सब सामानन के मिलइ से लागत कम भई अअइ अउर गाँव के लोगन का काम भी मिला अअइ। बायो-फ्लॉक तरीका मा बैक्टीरिया बरे बढ़िया माहौल बनइ के नाते मछलियाँ बहुत तेजी से बढ़त अहैं अउर उनके मरे के डर भी नाहीं रहत, जेहसे जोखिम कम अउर फायदा पक्का होत अअइ। राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के ई मॉडल अब जिला के दूसर विकास खण्डन मा भी चलावै के तैयारी अअइ, ताकि ज्यादा से ज्यादा गाँव के परिवारन का गरीबी के दलदल से बाहर निकाला जाय सकइ। सोनभद्र के ई कामयाबी के कहानी सरकारी मदद, वित्तीय अनुदान अउर नई तकनीक के मेल से कौनों भी इलाका के सूरत बदलि सकत अअइ, जेहसे न खाली गाँव-घर के मांग पूरी होय रही अअइ बल्कि आगे चलिके बाहर माल भेजइ के उम्मीद भी बढ़ि रही अअइ।


जनपद-सोनभद्र

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