
भारत मा जवानन मा मानसिक सेहत (मेंटल हेल्थ) से जुड़ी समस्यायें बहुतै तेजी से बढ़त जात अहैं। डिप्रेशन, एंग्जायटी, लम्बे समय कय तनाव (क्रॉनिक स्ट्रेस) जइसन समस्यायें सिर्फ उदासी या मूड खराब होए तक सीमित नाहीं अहैं, बल्कि एकर जवानन कय सेहत औ जिन्दगी पर भी बहुतै गहिर असर पड़त अहै। अइसे मा ई सवाल पूछब बहुतै जरूरी होय जात अहै कि जवानन मा मानसिक सेहत से जुड़ी समस्यान के पाछे का कारन अहैं। इहै सवाल कय जबाब जानै बरे हम डॉ. कुणाल बहरानी (चेयरमैन अउर ग्रुप डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी, यथार्थ हॉस्पिटल्स) से बात कीन। आवा जानब जाय कि इ बारे मा डॉक्टर का बतावत अहैं।
पढ़ाई कय दबाव अउर न्यूरोलॉजिकल स्ट्रेस
भारतीय समाज मा करियर का लइके उम्मीदें बहुतै जादे अहैं। प्रतियोगी परीच्छायें, नंबर लावै कय दबाव अउर परिवार कय उम्मीदें टीनएजर्स मा लम्बे समय कय तनाव (क्रॉनिक स्ट्रेस) का जनम देत अहैं। जब कउनो जवान लम्बे समय तक तनाव मा रहत अहै, तउ ओकरे शरीर मा कोर्टिसोल नाउँ कय स्ट्रेस हार्मोन कय स्तर बढ़ि जात अहै। न्यूरोलॉजी के मुताबिक, कोर्टिसोल बढ़इ से दिमाग कय याद रक्खै, नई चीज सीखै अउर भावनान का काबू मा करइ कय छमता का नुकसान पहुंचत अहै।
डिजिटल दुनिया कय मायाजाल
आजुक-काल जवानन कय जादे समय रील्स अउर शॉर्ट्स देखत-देखत बीत जात अहै। ई डिजिटल हाइपरकनेक्टिविटी हमार दिमाग कय काम करइ कय तरीका का बदल दिहे अहै। स्क्रीन पर मिलइ वाले हर लाइक अउर नोटिफिकेशन से दिमाग मा डोपामाइन निकसत (रिलीज होत) अहै। इहै कारन से जवानन का स्क्रीन कय लत लगि जात अहै, जेकर नतीजा बाद मा चिड़चिड़ापन, मन ना लगब, नींद कय कमी अउर कपार पीरइ (सिरदर्द) जइसन न्यूरोलॉजिकल समस्यान मा बदल जात अहै।
अकेलेपन का बढ़ावा देइ वाली शहरी लाइफस्टाइल
बड़े सहरन मा पढ़ाई अउर नौकरी बरे जवानन कय पलायन (जाब) तेजी से बढ़ा अहै। नय सहरन मा जाइके जवान अकेलेपन कय सिकार (शिकार) होत अहैं। दफ्तर मा कड़ा मुकाबला, नौकरी जाइ कय डर अउर रुपिया-पैसा कय असुरच्छा (आर्थिक असुरक्षा) ओकरे भीतर एंग्जायटी अउर डिप्रेशन का बढ़ावत जात अहै।
फ्रंटल लोब पर असर
कम उमिर मा निकोटीन, दारू या नसा कय इस्तेमाल दिमाग कय बढ़ती (विकास) का रोक देत अहै। ई हालत खास तौर से फ्रंटल लोब का असरदार (प्रभावित) करत अहै, जउन हमार फैसला लेइ कय छमता का सम्हारत अहै।
सामाजिक संकोच अउर लोक-लाज
आजहू भारत मा मानसिक बीमारी का एक कलंक या कमजोरी माना जात अहै। जवान इहै डर से मदद नाहीं मांगत अहैं कि समाज या परिवार का सोची। एकर नतीजा ई होत अहै कि मानसिक तनाव भीतर ही भीतर बढ़त रहत अहै अउर शरीर मा चक्कर आवइ, हर बखत थकान रहइ, भूलइ कय बेमारी या तेज कपार पीरइ कय रूप मा बहरे आवत अहै, जउन आगे चलिके डिप्रेशन अउर एंग्जायटी कय रूप धइ लेत अहै।




