देस कइ सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) आवारा कुकुरन कइ नसबंदी अउर दूसर जगह भेजइ कइ अपने पहिले कइ हुकुम (आदेश) क वापस लेइ बरे दायर कीन गइ सबइ याचिका क खारिज कइ दिहे अहइ। सुप्रीम कोर्ट कुकुरन सइ मया करइ वालन (डॉग लवर्स) कइ याचिकन क खारिज करत भवा कहेस कि इ अदालत देस भर मा कुकुरन कइ काटइ कइ घटनान क अनदेखा नाही कइ सकत अहइ। एका सबसे ढेर सिकार लरिका, मेहरारू अउर बुढ़वा भये हइँ। सुप्रीम कोर्ट कड़े सबदन मा अपने पहिले कइ हुकुम क फिर सइ याद दियावत भवा कहेस कि सड़क कइ कुकुरन पर 7 नवंबर, 2025 कइ दीन्हा गवा हुकुम ही लागू होई। इ हुकुमन क लागू करइ वाले अधिकारिन क कानूनी सुरक्षा दीन जाय अउर जे इ बात क ना मानिहैं, उन पर विभागीय अउर कोर्ट कइ अवमानना कइ कारवाही कीन जाइ सकत अहइ।
लेकिन का इबात सइ देस कइ आम मनइन क खुश होइ क चाही? का इससे देस मा आवारा कुकुरन सइ हैरान-परेशान मनइन क – खास कइके लरिकन, मेहरारू अउर बुढ़वन क राहत मिलि पाई? इ एतनो आसान नाही अहइ। जब तक कउनो खास अधिकारी कइ जिम्मेदारी ना तय कीन जाई, तब तक इ समस्या क कउनो हल (निदान) नाही निकलि सकत हइ। सच तो इ हइ कि सुप्रीम कोर्ट कइ हिदायत क बादौ जमीनी हकीकत इहे हइ कि जादेतर राज्य सरकारें अउर जिला प्रशासन एका गंभीरता सइ लेत नाहीं देखात हइँ। इहइ बरे इ हुकुम क लागू करइ बरे हर जिला मा जिलाधिकारी यानी सीधे DM का ही जिम्मेदार माना जाय क चाही।
सुप्रीम कोर्ट कइ नवंबर मा दीन्हे गइ हुकुम क छः महीना बीतइ क बादौ हाल इ अहइ कि देस कइ राजधानी दिल्ली क नगर निगम (MCD) कुकुरन क रखइ बरे एकौ डॉग सेंटर तक नाही बनाइ पाइस हइ। देस कइ सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश कइ सरकार इ हुकुम जारी कइ दिहे अहइ कि जउन कुकुर एक सइ जादे बार मनइन क काट चुका होइ, ओका सरेआम (सार्वजनिक) जगहन पर नाही छोड़ा जाई, लेकिन दिल्ली सइ सटल गाजियाबाद समेत राज्य कइ कई जिला मा अबहूँ जरूरी डॉग सेंटर कइ बनावट फाइलन मा ही अटकल परा अहइ। का अइसन लापरवाही अउर ढीला-ढाली बरे जिलन क DM का जिम्मेदार नाही माना जाय क चाही?
अब समइ आइ गवा हइ कि हर जिला, हर राज्य अउर सबसे ऊपर सीधे सुप्रीम कोर्ट का अपनी देखरेख मा एक टोल फ्री नंबर जारी करइ क चाही, जेह पर फोन करइ वाले हर मनई क तुरंत ओकरी सिकायत क एक नंबरौ देइ क चाही। जेकर सुप्रीम कोर्ट चाहइ तउ टोल फ्री नंबर पर बैठइ वाले अदालत कइ स्टाफ कइ खरचा मनइन सइ लइ सकत हइ अउर एह बरे हर फोन पर 3 सइ 5 रुपया कइ फीसौ तय कीन जाइ सकत हइ, लेकिन हर फोन कइ नीक तरीके सइ सुनवाई (फॉलोअप) होना बहुतै जरूरी अहइ। इ काम क जुद्धस्तर पर करइ क जरूरत हइ काहें सइ भारत मा आवारा कुकुरन कइ काटइ कइ समस्या दिन-पर-दिन डरावनी होत जात अहइ।
वइसे तउ देस मा कुकुरन कइ काटइ क सबइ आंकड़े दरज नाही कीन जात हइँ, लेकिन जउनौ आंकड़े सामने आवत हइँ, ओकरे मुताबिक साल 2024 मा हर मिनट पर कुकुर काटइ कइ 7, हर घंटा मा 430, रोज कइ 10,321, हर महीना मा 3,09,643 अउर साल भर मा 37,15,713 मामले दरज भये हइँ। यानी सरकारौ इ बात मानत हइ कि एक साल मा 37 लाख सइ जादे मनई कुकुरन कइ काटइ क सिकार बनत हइँ। वहीं साल 2025 मा कुकुरन कइ काटइ कइ गिनती 47 लाख सइ भी जादे बताई जात अहइ। सरकारी रिपोर्ट कइ मानी तउ भारत मा हर साल रेबीज सइ खाली 300 मनइन कइ मौत होत हइ। लेकिन WHO कइ अनुसार भारत मा हर साल रेबीज सइ 18 सइ 20 हजार मनइन कइ मौत होइ जात हइ। हियाँ इ बात क धियान रखबौ जरूरी अहइ कि अइसन जादेतर मामले आँकड़न मा दर्जै नाही होत हइँ। साल 2019 मा भइ पसु जनगणना मा देस मा आवारा कुकुरन कइ गिनती 1.53 करोड़ बताई गइ रही। लेकिन एक अंदाजा क तौर पर इ माना जात हइ कि देस मा इ समइ आवारा कुकुरन कइ गिनती 6 सइ 7 करोड़ कइ नगइच (लगभग) होइ गइ अहइ। इ समस्या हर बीतत दिन कइ साथै भयानक होत जात अहइ।
मोहल्लन, कॉलोनियन, सोसायटियन अउर हियाँ तक कि पार्कन मा भी इ आवारा कुकुरन कब्जा जमाइ रक्खा अहइ। लगभग हर मोहल्ला, कॉलोनी अउर सोसायटी मा आप का अइसन मनई मिलि जइहइँ जउन इन कुकुरन क अपने घरे लइ जाइके खाना नाही खियइहैं, बल्कि उनकी इहे जिद रहिहै कि ओका बाहरे खियइहैं। अउर जउन कसर बची रही, ओका देस कइ टीवी चैनलन पर आवइ वाले तथाकथित ज्योतिषिन पूरा कइ दिहे अहइँ, जउन कउनो खास रंग क कुकुर क रोटी खियइला सइ किस्मत बदलइ यानी नीक दिन आवइ क सपना दिखाइके इ समस्या का अउर जादे भयावह बनावइ मा अपनो बड़ा योगदान देइ रहे हइँ।
सुप्रीम कोर्ट स्कूलन, अस्पतालन, रेलवे स्टेशनन अउर बस अड्डन जइसन सरेआम (सार्वजनिक) जगहन क आवारा कुकुरन सइ मुक्त करइ क बात क दोहरावत भवा पहिली बार रेबीज क बीमारी सइ ग्रसित, लाइलाज बेमारी सइ परेशान या खतरनाक आवारा कुकुरन क इच्छामृत्यु (मारि देइ) कइ भी मंजूरी दइ दिहे अहइ। मानुस कइ जिनगी पर बढ़त खतरा पर चिंता जतावत भवा अदालत कहेस कि जेह इलाका मा आवारा कुकुरन कइ गिनती खतरनाक स्तर पर पहुँचि गइ अहइ अउर जहाँ बार-बार काटइ अउर हमला करइ कइ घटना होत हइ, वहाँ स्थानीय प्रशासन इच्छामृत्यु क सहारा लइ सकत हइ।
जब देस कइ करोड़न मनइन – खास कइके लरिकन, बुढ़वन अउर मेहरारून कइ दिन कुकुरन कइ डेरावा सइ सुरु होत हइ, तब देस कइ सबसे बड़ी अदालत क सामने आइके कड़ा फैसला सुनावब तनिक सुकून तउ देत हइ। लेकिन जमीनी हकीकत (ग्राउंड जीरो) पर इ फैसला क लागू करइ बरे जब तक कउनो क जिम्मेदार नाही ठहरावा जाई, तब तक इ भयावह समस्या क खतम होइ क कउनो उम्मीद दूर-दूर तक नाही देखात हइ। लेकिन का अइसन माहौल मा डॉग लवर्स / पसु प्रेमिन क भी अपनी जिम्मेदारी नाही समझइ क चाही काहें सइ लरिका, मेहरारू अउर बुढ़वा तउ उनके घरे मा भी होइहइँ।
– संतोष कुमार पाठक (लेखक वरिष्ठ पत्रकार अउर राजनीतिक विश्लेषक हइँ)