
बंगाल की राजनीति फेर से एक बार डांवाडोल स्थिति में है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), जे पिछला डेढ़ दशक से बंगाल की राजनीति पर राज करत रही, आज वह पार्टी के भीतर मची कलह, अगुआ के फैसला पर उठत सवाल अउर जनता के भरोसा कम होय के संकट से जूझत दिखात है। पार्टी के भीतर नाराज नेता अउर विधायक लोगन के चाल-ढाल से ई संकेत मिलत है कि अब संगठन के एकता में दरार पड़ि गई है। ई स्थिति बस एक राजनीतिक दल के संकट नाहीं है, बल्कि लोकतंत्र में राजनीतिक मूल्य, जनता के भावना अउर नेतृत्व के भूमिका पर फेर से सोचे के एक मौका है।
राजनीति में इतिहास बार-बार ई बात साबित करत रहा है कि जब भी सत्ता के साथ घमंड जुड़त है, तब जनता आखिर में जवाब देबे करत है। लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ा फैसला करे वाली होय है। चाहे वह इंदिरा गांधी के इमरजेंसी होय, पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन, दिल्ली में आम आदमी पार्टी के कमज़ोर होय के स्थिति होय या फिर उत्तर प्रदेश अउर बिहार के बहुत सारा राजनीतिक घटनाएँ—हर जगह जनता ई संदेश दिहिस है कि सत्ता जनता के सेवा खातिर होत है, न कि शासन के घमंड देखावे खातिर।
ममता बनर्जी कभी संघर्ष करे वाली, जुझारू अउर जनता के नेता मानि जात रहीं। उन्होंने वामपंथी शासन के लंबा दौर खत्म कइके बंगाल में बदलाव के एक नया पन्ना लिखा रहा। पर समय के साथ उनके राजनीति पर घमंड, अपने आप के बड़का समझे अउर तुष्टिकरण के आरोप बढ़त गए। राजनीतिक जानकार मानत हैं कि पार्टी के भीतर फैसला लेवे के तरीका में बहुत ज़्यादा एकै आदमी के हाथ में शक्ति होय अउर कुछ खास लोगन के बढ़त प्रभाव से कई वरिष्ठ नेता परेशान रहत हैं। यही कारण है कि समय-समय पर नाराजगी के सुर उठत रहत हैं।
राजनीतिक टिप्पणीकारन के विश्लेषण में भी ई सवाल उठत रहा है कि अगर कउनो दल में संगठन से ज़्यादा कउनो एक व्यक्ति महत्वपूर्ण होइ जाय, तौ वहां नाराजगी अपने आप पैदा होय लागत है। हाल के घटनाक्रम ने ई डर के और बढ़ा दिहिस है। जिस तरह पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता अउर विधायक अगुआ के काम करे के तरीका पर सवाल उठात हैं, उससे ई साफ़ है कि समस्या सिर्फ व्यक्ति के नाहीं, बल्कि संगठन के संस्कृति के भी है।
भारतीय राजनीति में हाल के बरसन में आम आदमी पार्टी अउर उनके नेता अरविंद केजरीवाल के उदाहरण भी ई संदर्भ में ध्यान देवे लायक है। साल 2013 से लेकर 2024 तक दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी ने खूब सफलता पायी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकले केजरीवाल के जनता ने ईमानदार, पारदर्शी अउर विकल्प के रूप में स्वीकार कीन रहा। पर समय के साथ सत्ता के एक जगह जमाव, विरोधियन के प्रति असहिष्णुता, राजनीतिक घमंड अउर खुद के न हराय भोगे वाली सोच उनके नेतृत्व पर हावी होत दिखाई दिहिस। जनता देखिस कि जो दल कभी राजनीति में साफ़-सफाई अउर नैतिकता के बात करत रहा, वह भी सत्ता के वही मोह अउर व्यक्तिवादी राजनीति का शिकार होत जा रहा है, जिसके खिलाफ वह लड़ाई शुरू कीन रहा। नतीजा ई भवा कि दिल्ली की राजनीति में उनका असर कम होय गवा अउर जनता ने साफ़ संदेश दिहिस कि लोकतंत्र में कउनो नेता या दल जनता से बड़ा नाहीं होत। ई घटना ई सच के फिर से साबित करत है कि जनता ज़्यादा दिन तक घमंड, बढ़ा-चढ़ा के बात करे अउर आत्ममुग्धता के बर्दाश्त नाहीं करत।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अउर तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़ी चुनौतियन के भी इसी नज़रिए से देख सकत हैं। जब कउनो दल के अगुआ अपने आप के संगठन अउर जनता से ऊपर समझे लागत है, तब नाराजगी पैदा होय है, कार्यकर्ता दूर होय लागत हैं अउर आखिर में राजनीतिक आधार कमज़ोर होय लागत है। इतिहास बतावत है कि लोकतंत्र में नम्रता, बातचीत, जनभावनाओं के सम्मान अउर राष्ट्रहित के प्रति लगन ही हमेशा बनी रहै वाली राजनीतिक सफलता की चाभी हैं। कउनो भी लोकतांत्रिक दल की ताकत उसके विचार, संगठन अउर कार्यकर्ता में होत है, न कि सिर्फ एक नेता में। जब दल विचारधारा के बजाय व्यक्तिपूजा पर आधारित होय लागत हैं, तब उनका संकट पक्का होय जावत है।
भारतीय राजनीति में कई उदाहरण हैं जहाँ परिवारवाद ने दल के जड़ कमजोर कइ दीहिस है। महाराष्ट्र में शिवसेना अउर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बंटवारे के पीछे भी नेतृत्व अउर उत्तराधिकार से जुड़ा सवाल महत्वपूर्ण रहा। बंगाल में भी इसी तरह के चर्चा समय-समय पर होत रहत हैं। तृणमूल कांग्रेस के सामने दूसरा बड़ा संकट उनके सार्वजनिक छवि के है। शिक्षक भर्ती, नगर निकाय अउर बाकी प्रशासनिक मामला से जुड़ा विवाद जनता के मन में ढेर सारा सवाल खड़ा कइ दिहिस है। कउनो भी सरकार की सबसे बड़ी कमाई जनता के भरोसा होय है। अगर जनता के ई महसूस होय लागै कि शासन में पारदर्शिता अउर जवाबदेही कम होय रही है, तौ राजनीतिक नुकसान होय स्वाभाविक है।
साथ ही पश्चिम बंगाल में बहुत दिन से चलत पहचान, नागरिकता, सीमा सुरक्षा अउर अवैध घुसपैठ के बहस ने भी राजनीतिक माहौल के प्रभावित कीन है। भारतीय जनता पार्टी ने इन मुद्दा के राष्ट्रीय सुरक्षा अउर सांस्कृतिक अस्मिता के सवाल के रूप में सामने राखिस। भाजपा के तर्क ई रहा कि राष्ट्रहित सबसे ऊपर होय चाही अउर कउनो भी तरह के तुष्टिकरण के राजनीति आखिर में समाज के बांटत है। यही कारण है कि बंगाल में भाजपा ने अपने राजनीतिक रणनीति के राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान अउर सुशासन के मुद्दा पर केंद्रित कीन।
भाजपा के बंगाल यात्रा भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्ययन के विषय है। कभी सिर्फ दो सीट तक सीमित रहै वाली पार्टी आज राज्य की सत्ता की शक्ति बनि चुकी है। ई बदलाव अचानक नाहीं भवा। इसके पीछे बरसन के संगठन के विस्तार, बूथ लेवल तक कार्यकर्ता बनावे, राष्ट्रीय नेतृत्व के सक्रियता अउर स्थानीय मुद्दा के राष्ट्रीय विमर्श से जोड़े के रणनीति रही है। भाजपा ने बंगाल में ई संदेश देवे के कोशिश कीन कि वह सिर्फ एक राजनीतिक विकल्प नाहीं, बल्कि वैचारिक विकल्प भी है। हालांकि ई भी उतना ही सच है कि सिर्फ राष्ट्रवाद या धार्मिक पहचान के आधार पर कउनो दल की स्थायी सफलता पक्का नाहीं होत। लोकतंत्र में जनता विकास, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य अउर सुरक्षा भी चाहत है। इसलिए कउनो भी राजनीतिक दल खातिर ज़रूरी है कि वह राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ जनकल्याणकारी नीति के भी प्राथमिकता दै।
राष्ट्र अउर राजनीति के संबंध बहुत गहरा है। कउनो भी राजनीतिक दल तभी लंबा समय तक सफलता पा सकत है जब वह राष्ट्रहित, संविधान, लोकतांत्रिक मूल्य अउर जनभावनाओं के प्रति समर्पित रहै। अगर कउनो दल ऐसे तत्वन का समर्थन करत दिखै जो राष्ट्रीय एकता के खिलाफ होय, तौ जनता धीरे-धीरे उससे दूरी बनावे लागत है। भारत की लोकतांत्रिक चेतना इतनी समझदार होय चुकी है कि वह आखिर में राष्ट्रहित अउर जनहित के बीच तालमेल बैठावे वाले नेतृत्व के ही स्वीकार करत है।
पश्चिम बंगाल की आज की राजनीतिक स्थिति इसी सच के पुष्टि करत है। तृणमूल कांग्रेस के सामने चुनौति सिर्फ बगावत या संगठन के भीतर की नाराजगी नाहीं है, बल्कि जनता के भरोसा के फिर से जीते के भी है। अगर पार्टी आत्ममंथन करै, संगठन के लोकतांत्रिक बनावै, पारदर्शिता बढ़ावै अउर जनता के भावना के समझे के कोशिश करै, तौ वह अपने स्थिति के फेर से मज़बूत कर सकत है। पर अगर घमंड, व्यक्तिवाद अउर तुष्टिकरण की राजनीति चलती रही, तौ संकट और गहराय सकत है। यही लोकतंत्र का शाश्वत सच है अउर यही पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीति का सबसे बड़ा सबक भी है।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सत्ता हमेशा नाहीं रहत, पर मूल्य हमेशा रहत हैं। राजनीतिक दल आवत-जात रहत हैं, लेकिन जनता की उम्मीद अउर राष्ट्र की ज़रूरत हमेशा बनी रहत है। जो दल इन उम्मीद के समझत हैं, वे इतिहास बनावत हैं अउर जो इन्हें अनदेखा करत हैं, वे इतिहास बनि जावत हैं। आज बंगाल की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। आने वाले बरसन में ई साफ़ होय जाई कि तृणमूल कांग्रेस सुधरे के रास्ता चुनत है या राजनीतिक पतन के ओर बढ़त है।