संपादकीय

पीएम मोदी के राष्ट्रहित के आह्वान में भी राजनीति काहे?

आज पूरी दुनिया अइसन दौर से गुजरति है, जहवां लड़ाई-झगड़ा, आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा के संकट अउर वैश्विक बाजार के अनिश्चितता मनई सभ्यता के नई-नई चुनौती के सामने खड़ा कइ दिहे हैं। खाड़ी देसन में लमहर समय से चलत संघर्ष अउर जंग के विभीषिका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाले है। कच्चा तेल के दाम में लगातार बढ़त, सप्लाई चेन के टूटल, डॉलर के मुकाबले अलग-अलग देसन के रुपया के कमजोर होब अउर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में पैदा भइल असंतुलन लगभग हर देस के आर्थिक व्यवस्था के प्रभावित करे है। भारत भी इहालत से अछूता नाहीं रहि सकत। भारत आपन ऊर्जा के जरूरत के बड़का हिस्सा मंगावत है अउर सोना के भी दुनिया के सबसे बड़का खरीदे वालन में से एक है। अइसन स्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देसवासीन से ईंधन के संभल के इस्तेमाल करे अउर सोना खरीदै के सीमित करै के जवन आह्वान कीन्ह गा है, उ खाली एकठु आर्थिक सलाह नाहीं, बल्कि राष्ट्रहित में कीन्ह गा दूरदर्शी चिंतन है।

दुर्भाग्य इ है कि मोदी जी के मितव्ययिता के अपील पर पूरा देस के एकजुट होके गंभीरता से विचार करे के चाही रहा, उ विषय के भी राजनीतिक विवाद के हथियार बनाइ दीन्ह गा। कुछ विपक्षी दल प्रधानमंत्री के ई अपील के जनता में डर फैलावै वाला कदम बताइन, त कुछ लोग एकरे सरकार के विफलता छिपावै के कोशिश कहिन। जबकि असल में ई अपील राष्ट्र के भविष्य के संभावित चुनौती के प्रति सचेत करे अउर समय रहते आत्मानुशासन अपनावै के संदेश है। ई राजनीति के विषय नाहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी के सवाल है। जब दुनिया के बड़-बड़ देस आर्थिक संकट से जूझत होइहैं, तब भारत के प्रधानमंत्री अगर नागरिकन के संयम अउर मितव्ययिता के मंत्र देत हैं त ओका राजनीतिक चश्मा से नाहीं, बल्कि राष्ट्रीय नजरिया से देखै के चाही।

ई पहिल मौका नाहीं है, जब प्रधानमंत्री देस के तरक्की के बनाए रखै के सामूहिक चिंता करत भइ मितव्ययिता अउर संयम के अपील कीन्ह हों। भारत के संस्कृति मूल रूप से संयम प्रधान रही है। भारतीय जीवन-दर्शन में संयम के खाली व्यक्तिगत गुण नाहीं, बल्कि जीवन के सबसे बड़की शक्ति मानल गा है। हमारे ऋषियन, मुनियन अउर महापुरुषन हमका हमेशा जरूरत अउर विलासिता के बीच अंतर करै के सीख दिहे हैं। महावीर, बुद्ध, गांधी अउर विनोबा भावे जइसन महापुरुषन त्याग अउर संयम के ही मानवता के सबसे बड़की ताकत बताए हैं। भारतीय संस्कृति कहति है कि जतनी जरूरत होयतना ही इस्तेमाल करो, काहे से कि असीमित उपभोग अंत में संकट के जन्म देत है। यही कारण है कि भारतीय सभ्यता हजारन बरिस तक टिकाऊ अउर संतुलित बनी रही। आज जब पूरी दुनिया उपभोक्तावाद के बुरा परिणाम भुगतति है, तब भारत के ई संयम पर आधारित संस्कृति समाधान के रास्ता दिखा सकति है।

सोना के प्रति भारतीय समाज के आकर्षण ऐतिहासिक अउर सांस्कृतिक दूनो स्तर पर गहरा रहा है। बियाह, पारिवारिक उत्सव, धार्मिक परंपरा अउर सामाजिक प्रतिष्ठा में सोना के खास जगह है। लेकिन ई भी एक कठोर सच्चाई है कि भारत के ज्यादातर सोना बाहर से मंगावल जात है। हर बरिस अरबों डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार सोना के आयात पर खर्च होइ जात है। ई सोना उत्पादन या औद्योगिक विकास में लागै के बजाय घरन अउर लॉकरन में बंद होके बेकार पड़ल रहत है। अइसन समय में जब विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़त होइ अउर रुपया के कीमत लगातार गिरत होइ, तब सोना के खरीदारी में संयम बरतै के अपील आर्थिक नजरिया से बहुत जरूरी है। ई कवनो के परंपरा के विरोध में नाहीं, बल्कि देस के आर्थिक मजबूती के पक्ष में उठावल कदम है।

ईंधन में संयम अउर भावी राह

अइसने ईंधन के इस्तेमाल में संयम भी समय के मांग है। भारत के ऊर्जा के जरूरत के बड़का हिस्सा मंगावल तेल पर निर्भर है। खाड़ी देसन में जंग अउर अस्थिरता के कारण तेल के दाम लगातार बढ़त जात है। एकर सीधा असर पेट्रोल, डीजल, परिवहन, उद्योग अउर महंगाई पर पड़त है। अगर नागरिक ईंधन के बेकार इस्तेमाल के कम करैं, सार्वजनिक परिवहन के जादा इस्तेमाल करैं, ऊर्जा बचत के आपन जीवन के हिस्सा बनावैं, त एकर से नाहीं खाली देस के अर्थव्यवस्था के राहत मिलि, बल्कि पर्यावरण के बचावे में भी मदद मिलि।

संयम के मतलब खाली त्याग नाहीं होत, बल्कि दूरदर्शिता अउर जिम्मेदारी भी होत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपील इही जिम्मेदारी के भावना से प्रेरित लागत है। ऊ कवनो जोर-जबरदस्ती या पाबंदी के बात नाहीं कीन्हन, बल्कि नागरिकन से स्वैच्छिक सहयोग के उम्मीद कीन्हन। ई लोकतांत्रिक नेतृत्व के पहचान है। एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री के काम खाली संकट आवै पर कदम उठाब नाहीं होत, बल्कि संकट के इशारा के पहचान के समय रहते जनता के तैयार करब भी होत है।

आज जब दुनिया के कई देसन में आर्थिक अस्थिरता के कारण भारी महंगाई, बेरोजगारी अउर सामाजिक तनाव देखै के मिलत है, तब भारत तुलनात्मक रूप से स्थिर स्थिति में है। ई खाली संयोग नाहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पिछला बरिसन में अपनावल गइल आर्थिक नीति, बुनियादी ढांचा के विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भर भारत अभियान अउर वैश्विक स्तर पर भारत के मजबूत स्थिति के नतीजा है। ई भी ध्यान देवे वाला है कि वैश्विक संकट के बावजूद भारत आपन नागरिकन पर जादा आर्थिक बोझ नाहीं पड़ै दिहस। महामारी से लेके जंग जइसन हालत तक भारत सरकार लगातार राहत योजना चलइलीस, गरीबिन के मुफ्त राशन दिहस, किसानन अउर मध्यम वर्ग के हर तरह के मदद दीन्हस अउर अर्थव्यवस्था के स्थिर राखै खातिर कई गो कदम उठावलस। वैश्विक मंदी अउर जंग के माहौल में भी भारत दुनिया के सबसे तेज बढ़ै वाली अर्थव्यवस्था में शामिल है। ई प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व अउर दूरदर्शिता के प्रमाण है।

दुर्भाग्यपूर्ण ई है कि देसहित के अइसन विषय पर भी कुछ राजनीतिक दल संकीर्ण राजनीति से ऊपर नाहीं उठ पावत हैं। लोकतंत्र में आलोचना के हक सबके पास है, लेकिन हर विषय के राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू में तौलल राष्ट्रहित के खिलाफ है। अगर प्रधानमंत्री जनता से संयम के अपील करत हैं त विपक्ष के चाही कि ऊ भी जनता के जागरूक करै, ना कि डर अउर भ्रम के माहौल बनावै। राजनीति तब तक स्वस्थ मानल जात है जब तक ऊ राष्ट्रहित से जुड़ल रहै। लेकिन जब राजनीति खाली विरोध खातिर विरोध करै लागै अउर राष्ट्रीय संकट के भी अवसर जइसन देखै लागै, तब ऊ लोकतंत्र के कमजोर करति है।

आज जरूरत ई बात के है कि पूरा देस एक परिवार जइसन सोचत भइ राष्ट्रीय हित के सबसे ऊपर मानै। संकट के समय संयम, अनुशासन अउर सहयोग ही कवनो भी राष्ट्र के सबसे बड़की ताकत होति हैं। भारत इतिहास में कई बार ई साबित कइ दिहे है कि जब भी राष्ट्र पर संकट आइल, भारतीय समाज अद्भुत त्याग अउर एकता के मिसाल पेश कइलीस। आजादी के आंदोलन से लेके जंग के समय तक, भारतीय जनता आपन निजी हित से ऊपर उठके राष्ट्रहित के महत्व दिहस। आज फिर वही समय है जब हमका समझै के चाही कि बेकार के उपभोग, दिखावा अउर बेहिसाब विलासिता अंत में देस के आर्थिक मजबूती के कमजोर करति है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपील के इही व्यापक संदर्भ में देखे के जरूरत है। ई खाली सोना न खरीदै या ईंधन बचाय के संदेश नाहीं है, बल्कि आत्मसंयम, आत्मअनुशासन अउर राष्ट्रीय जिम्मेदारी के संदेश है। भारतीय संस्कृति के मूल सुर भी इहे रहा है कि मनई आपन आचरण से समाज अउर राष्ट्र के मजबूत बनावै। अगर हम संयम के जीवन के हिस्सा बना लीं त बहुत गो आर्थिक, सामाजिक अउर पर्यावरणीय समस्या के समाधान अपने से मिलि जाइ। आज दुनिया जइसन अनिश्चितता अउर संकट के दौर से गुजरति है, ओहमें भारत तुलनात्मक रूप से मजबूत स्थिति में खड़ा है। एकर श्रेय देस के जनता के ताकत के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के भी जात है। अइसन समय में जरूरत राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के नाहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता अउर सकारात्मक सोच के है। संयम खाली आर्थिक नीति नाहीं है, बल्कि राष्ट्रनिर्माण के आधार है। अगर हम ई भावना के समझ सकें, त हम न खाली वर्तमान संकट के सामना कर पइब, बल्कि आवै वाली पीढ़ी खातिर भी एकठु मजबूत अउर आत्मनिर्भर भारत के निर्माण कर पइब। – ललित गर्ग, लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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