ब्रिक्स (BRICS) क विदेश मन्त्रिन् क दुई दिनी दिल्ली बैठक पूरी दुनिया का कत्यू जरूरी राजनीतिक, आर्थिक अउर सामरिक संदेसा दिहे हय, जउन क कूटनीतिक गहराई का समझब बहुत जरूरी अहै। नाहीं तौ बाकी दुनिया का अमेरिका अउर यूरोप क दादागिरी (नाटो सैन्य गठबंधन) क दुनियावी चालबाजिन से छुटकारा मिलब मुस्किल अहै। एहि नाते, ई बैठक मा मुख्य रूप से दुनिया क शक्ति-संतुलन, अमेरिकी पाबंदी क नीति, पश्चिम एशिया क संकट, दुनियावी व्यापार व्यवस्था अउर “ग्लोबल साउथ” क भूमिका पर जोर देखाई परा।
देखल जाय तौ नई दिल्ली मा ब्रिक्स क विदेश मन्त्रिन् क जमावड़ा लाग अहै। दुई दिन क ई 18वां शिखर सम्मेलन अइसन समइ मा होत अहै, जब दुनिया कत्यू मोरचा पर अस्थिरता से गुजर रही हय। ब्रिक्स क सदस्य देस – ईरान अउर यूएई सीधा तौर पर ई हलचल मा सामिल अहैं। अइसन मा ई जुटान पूरी दुनिया क तईं अहम होइ जात अहै। ई जरूरी बैठक मा भारत क विदेश मन्त्री एस जयशंकर, रूस क विदेश मन्त्री सर्जेइ लावरोव अउर ईरान क विदेश मन्त्री अब्बास अराघची जइसन नेतन् क दूरदर्शिता भरा बयान खास चर्चा मा रहे। जउन क दुनियावी मायने बहुतै जरूरी अहैं।
जउन तरे से कूटनीतिक सम्मेलन क पहिले ही दिन जयशंकर अन्तरराष्ट्रीय कानून अउर संयुक्त राष्ट्र चार्टर क खिलाफ लगावा जाय वाला एकतरफा पाबन्दिन क जिक्र कीहिन, जउन सबसे जादा विकाससील देसन का नुकसान पहुँचावत हैं। स्वाभाविक तौर पर उनका इसारा अमेरिका कै ओर अहै, काहे से कि डोनाल्ड ट्रम्प क टैरिफ नीतियन् क वजह से दुनिया का बहुतै जादा नुकसान उठावै का परा हय। वहीं, ईरान मामले मा भी गतिरोध क वजह बहुत कुछ वॉशिंगटन क अव्यवहारिक मांगैं अहैं। ब्रिक्स क बड़े मंच से उठी अवाज क असर जादा होइ।
विदेश मन्त्री एस जयशंकर क उद्घाटन भाषण आजु क चुनौतियन क सही नक्सा खींचत हय। पश्चिम एशिया पर मँडरावत जुद्ध क खतरा, ऊर्जा संकट, सप्लाई चेन मा रुकावट अउर जलवायु परिवर्तन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का एक नय मोड़ पर लाय के खड़ा कइ दिहे हय। तमाम देसन क अर्थव्यवस्था का मंदी मा फंसै क डर सतावत अहै। अइसन मा जइसन कि विदेश मन्त्री कहेन, विकाससील देसन ब्रिक्स से ई उम्मैद लगाय अहैं कि ई मंच स्थिरता बनाय रखै मा नीक भूमिका निभाई। एकर कुछ खास मतलब इहाँ दीन गा अहै-
पहिला, एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का चुनौती: बैठक क सबसे बड़ संदेसा ई रहा कि दुनिया अब खाली अमेरिका-केन्द्रित व्यवस्था पर निर्भर नाहीं रहब चाहत। ब्रिक्स देसन “मल्टीपोलर वर्ल्ड” यानी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था क जरूरत पर जोर दीहिन। एकर मतलब ई अहै कि दुनिया क फैसलन मा पश्चिमी देसन क साथे एशिया, अफ्रीका अउर लैटिन अमेरिका क ताकतवर देसन क भी बराबर क भूमिका होय।
दूसर, अमेरिकी पाबन्दिन अउर आर्थिक दबाव क बिरोध: भारत, रूस, चीन अउर ईरान समेत कत्यू देसन एकतरफा पाबन्दिन का अंतरराष्ट्रीय व्यापार अउर संप्रभुता क खिलाफ बताइन। खास कइके एस जयशंकर कहेन कि पाबन्दी अउर दबाव कूटनीति क विकल्प नाहीं होइ सकत। ई संदेसा सीधा-सीधा अमेरिका क पाबंदी नीति क अलोचना माना गवा।
तीसर, डॉलर क दबदबा कम करै क इसारा: बैठक मा अपनी-अपनी करंसी (स्थानीय मुद्रा) मा व्यापार बढ़ावै अउर वैकल्पिक भुगतान प्रणालिन पर भी बात भई। ई संदेसा रहा कि ब्रिक्स देस डॉलर पर निर्भरता कम करब चाहत हैं ताकि अमेरिकी आर्थिक दबाव क असर घटावा जाय सकै।
चौथा, पश्चिम एशिया संकट पर चिंता: ईरान-इज़राइल तनाव अउर समुन्दरी रास्तन क सुरक्षा बड़ मुद्दा रहा। ब्रिक्स देसन रेड सी अउर होर्मुज़ जलडमरूमध्य जइसन रास्तन क सुरक्षा पर जोर दीहिन। दुनिया का ई संदेसा दीन्हा गवा कि क्षेत्रीय जुद्ध अब दुनिया क अर्थव्यवस्था अउर ऊर्जा सुरक्षा का सीधा असर डाल सकत हैं।
हालाँकि ई मंच क समन्वा भी चुनौती अहै। ईरान अउर यूएई क आपसी रिस्ता नीक नाहीं चलत बाटै। जबकि चीन आपन विदेश मन्त्री का नाहीं भेजिस हय। एक बात अउर, जब सम्मेलन सुरु भवा, तब चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ट्रम्प क मेजबानी मा मगन रहे। ब्रिक्स क सबसे बड़ बिरोधी ट्रम्प अहैं। उनका लागत अहै कि ई मंच अमेरिकी हितन क खिलाफ खड़ा कीन गवा अहै। मेजबान होय क नाते ई भारत क जिम्मेदारी अहै कि यहाँ से निकला संदेसा कउनो क बिरोध मा नाहीं, बल्कि सबके हित मा होय। भारत क लगे सब सदस्यन का नियरे लावै अउर आजु क संकट क समाधान पेस करै क मौका अहै।
पाँचवाँ, ग्लोबल साउथ क राजनीतिक अवाज: बैठक मा ई साफ होइ गवा कि ब्रिक्स अपने आप का खाली एक आर्थिक समूह नाहीं, बल्कि विकाससील देसन क सामूहिक राजनीतिक अवाज क रूप मा स्थापित करब चाहत अहै। अफ्रीका, एशिया अउर लैटिन अमेरिका क देसन क समस्या—जइसन कि अनाज क सुरक्षा, ऊर्जा संकट अउर करजा—का दुनिया क एजेंडा मा ऊपर रखै क बात कही गई।
छठवाँ, संयुक्त राष्ट्र मा सुधार क माँग: भारत अउर ब्राजील संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद मा सुधार अउर विकाससील देसन का जादा प्रतिनिधित्व दै क जरूरत दोहराइन। ई संदेसा रहा कि दूसर विश्व युद्ध क बाद बनी संस्थावन मा अब नई दुनिया क हकीकत क हिसाब से बदलाव होय के चाही।
सातवाँ, ब्रिक्स क भीतर मतभेद भी सोझा आए: हालाँकि बैठक मा एकजुटता देखाई गई, मुला ई भी साफ होइ गवा कि सब सदस्य अमेरिका-विरोधी नीति पर पूरी तरे एकमत नाहीं अहैं। भारत अउर ब्राजील जइसन देस पश्चिम क साथे सन्तुलित रिस्ता बनाय रखब चाहत हैं, जबकि रूस अउर ईरान जादा कड़ा रुख चाहत हैं। एहिसे ई इसारा मिला कि ब्रिक्स अभी पूरा राजनीतिक गठबंधन नाहीं, बल्कि साझा हितन वाला मंच अहै।
समग्र रूप से कहा जाय तौ, ई बैठक क दुनियावी संदेसा ई रहा कि उभरती ताकतें अब दुनिया क राजनीति अउर अर्थव्यवस्था मा जादा स्वतंत्र, सन्तुलित अउर पश्चिम से अलग भूमिका चाहत हैं। ब्रिक्स ई देखाय क कोसिस कीहिस कि “ग्लोबल साउथ” अब खाली तमासबीन नाहीं, बल्कि दुनिया क शक्ति-संतुलन क एक सक्रिय खिलाड़ी बनब चाहत अहै।
काहे से कि ब्रिक्स अब खाली उभरती अर्थव्यवस्थावन क समूह नाहीं रहा, एकर भूमिका आजु कत्यू जादा बड़ी होइ चुकी अहै। हकीकत मा ई दुनिया क सन्तुलन बनावै मा बहुत जरूरी होइ सकत अहै। भारत क रोल एमा सबसे अहम होइ जात अहै। उ पश्चिमी देसन क साथे रिस्ता बनाय रखे हय, जबकि रूस, ईरान अउर चीन क साथे भी सन्तुलन बनाय रखे हय। उ हमेशा बातचीत से समाधान क बात कहिस हय। ई रवैया ओका एक भरोसेमन्द साथी बनावत हय।
– कमलेश पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार अउर राजनीतिक विश्लेषक
