संपादकीय

संपादकीय: आर्थिक कूटनीति मा मिली निक सफलता

पूरी दुनिया क अर्थव्यवस्था आजकाल संरक्षणवाद, सामान पहुँचावै मा अड़चन (आपूर्ति-श्रृंखला अस्थिरता) अउर देसन के बीच क तनातनी से गुजर रही अहै। अइसन बखत मा भारत अउर न्यूज़ीलैंड के बीच जउन मुक्त व्यापार समझौता भवा अहै, उ व्यापार के साथै-साथ रणनीतिक नजरिया से भी बहुतै खास अहै। ई बात क साफ ईसारा अहै कि भारत अब आपन आर्थिक कूटनीति का नया मोड़ दियत अहै। महज नौ महीना मा लम्बी बातचीत के बाद समझौता क नतीजा निकलना इ बात क सबूत अहै कि नई दिल्ली अब ‘धीरे चले’ वाली पुरानी छवि से बाहर निकर के एक मजबूत अउर तेज व्यापारिक जोड़ीदार बनय चाहत अहै।

ई समझौता इहि नाते ऐतिहासिक अहै, काहे से ई भारत क हिंद-प्रशांत रणनीति का एक मजबूत आर्थिक अधार देत अहै। जहवां पच्छिमी बजारन मा भारी टैक्स अउर अउर रुकावटें भारतीय निर्यात का रोकत रही हैं, वहीं न्यूजीलैंड के साथे 100 फीसद टैक्स-फ्री पहुँच भारतीय सामानन खातिर एक नया दुआरा खोल सकत अहै। अभी दुइनौ देसन के बीच व्यापार करीब 1.5 अरब डॉलर के आस-पास अहै, जवन कि पिछला साल के मुकाबले 49 फीसद बढ़ै के बादौ दुइनौ देसन के बजार क हिसाब से कमै अहै। अइसन मा अगिला पाँच साल मा एकरा का पाँच अरब डॉलर अउर 15 साल मा 20 अरब डॉलर निवेश तक लै जाब बहुतै बड़ा लक्ष्य अहै, पै अगर काम ठीक से भवा त ई नामुमकिन नाहीं अहै।

भारतीय निर्यातकों खातिर ई समझौता बहुत खास अहै। फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग क सामान, आईटी सेवा अउर खेती से जुड़े सामानन का बजार मा बढ़त मिली, त सेवा के क्षेत्र मा—खासकर आईटी, पढ़ाई-लिखाई अउर पेशेवर सेवाओं मा थोड़े दिन वाले वीजा क नियम भारतीय लरिका-बच्चन खातिर नया मौका खोल सकत अहैं। ई न खाली निर्यात बढ़ाई, बलुक रोजगार के नए मौका भी पैदा करी। हालांकि, चुनौतियां भी कम नाहीं अहैं। डेयरी अउर बागबानी जइसन नाजुक क्षेत्रन मा हमार देस के पैदावार करै वालन का चिंता होब स्वाभाविक अहै, काहे से न्यूजीलैंड क डेयरी उद्योग बहुतै तगड़ा अहै। अइसन मा समझौता मा तालमेल बनाउब, जइसे धीरे-धीरे बजार खोलब या कोटा तय करब बहुत जरूरी होई। इहे तालमेल इ समझौता क कामयाबी क असली कसौटी बनी।

गैर-टैरिफ बाधाएं भी बड़ी चुनौती अहैं। सामान क क्वालिटी क मानक, जैव-सुरक्षा नियम अउर प्रमाणपत्र क तरीका अगर आसान नाहीं कीन गवा, त न्यूजीलैंड के बजारन मा 100 प्रतिशत टैक्स-फ्री पहुँच क असली फायदा सीमित रहि जाई। ई नाते, खाली दस्तखत कइ देब काफी नाहीं अहै, लॉजिस्टिक्स, मानकीकरण अउर व्यापार मा सुगमता लाय खातिर ठोस सुधार जरूरी अहै। न्यूजीलैंड के किसानी गुटों क मिजाज देखत उंहा क राजनीति इ समझौता का असर डाल सकत अहै, पै दुइनौ देसन क साझा फायदा—भरोसेमंद आपूर्ति-श्रृंखला अउर चीन पर निर्भरता मा संतुलन इ समझौता का आगे बढ़ावै क बड़ी प्रेरणा देत अहै।

ई समझौता भारत खातिर पुरान बजारन से आगे बढ़ि के नया, मजबूत अउर भरोसेमंद साथी खोजै वाली ‘विविधीकरण की रणनीति’ क हिस्सा अहै। अगर एका सही ढंग से लागू कीन गवा, त ई न केवल व्यापार क आँकड़ा बढ़ाई, बलुक हिंद-प्रशांत क्षेत्र मा भारत क आर्थिक अउर रणनीतिक धाक भी मजबूत करी। ई कहब एकदम सही होई कि भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता घरेलू हित अउर दुनिया मा बढ़ै क चाहत के बीच एक सधा भवा कदम अहै, पै असली सफलता कागज प नाहीं, जमीन प तय होई।

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