
महाबली आफत मा हैं। ट्रंप क मुसीबतें दिन-ब-दिन बढ़त जात हैं। पुतिन जबसे ट्रंप का ईरान प दोबारा हमला न करै क चेतौनी दिहिन है, अउर ईरान परमाणु कार्यक्रम प कौनों समझौता न करै क एलान कइ दिहेस है, तबसे ट्रंप अउर अमेरिकी नीति बनावै वालन के सामने बड़ी भारी दुविधा आय गय है। ट्रंप का एक तरफ तौ आपन देस मा एक कड़क नेता वाली छवि बचाय रखै क है, तौ दूसर तरफ खाड़ी क्षेत्र मा फैलल अमेरिकी फौजी अड्डन अउर साथी देसन क सुरक्षा देखब भी जरूरी है। जउ न अमेरिका हमला करत है, तौ इलाकाई जंग क खतरा बढ़ि जाई, अउर जउ न ओ संयम देखौत है, तौ दुनिया भर मा ओकर साख प सवाल उठिहैं।
पच्छिम एशिया मा अमेरिका, रूस अउर ईरान के बीच जउन ई तीन-कोनिया तनाव बढ़त है, उ खाली ताकति क बंटवारा नाहीं है, बल्कि दुनिया क रणनीति क एक नई उलझन क ईशारा है। कतर, बहरीन अउर यूएई मा अमेरिका क फौजी अड्डे ओकर असली ताकत हैं। जउ न इनकै सुरक्षा प आंच आवत है, तौ ई खाली फौजी चुनौती नाहीं, बल्कि अमेरिका क इज्जत क सवाल बनि जाई। हाल के मामला से ई लगत है कि अमेरिका अब ओतनी पक्की सुरक्षा नाहीं दइ पाइ, जेहिसे ट्रंप क छवि प बुरा असर पड़ा है।
ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती ई है कि बिना अमेरिकी कांग्रेस क मंजूरी के उ जंग जइसन कार्रवाई नाहीं कइ सकत। ई संवैधानिक मजबूरी है, जेहिसे पार पाब आसान नाहीं है, यहि बरे उ थोड़े-बहुत फौजी कदम या खास हक्कान क सहारा लइ क बीच क रस्ता निकालै क कोसिस कइ सकत हैं। ट्रंप खाड़ी देसन से तौ नाहीं निकलिहैं, काहे से अइसा करै प चीन अउर रूस क मैदान मिलि जाई, पै ई दुविधा से निकरै खातिर ट्रंप के पास तीन रस्ता हैं— पहिला, थोड़ा-बहुत फौजी जोर दिखा के दबाव बनावब; दूसरा, बातचीत के जरिए तनाव कम करब; अउर तीसरा, धीरे-धीरे आपन दखल कम करब।
फिलहाल जउ न रूस ईरान क यूरेनियम भंडार क रखवाली करै वाला ‘तीसरा पक्ष’ बनि जात है, तौ ई एक नई कूटनीतिक शुरुआत होइ सकत है, पै बदले मा यूक्रेन जंग खतम करै जैसी अमेरिकी सरत पुतिन मानिहैं, ई मुसकिल लागत है। पुतिन अमेरिकी दबाव मा आपन आजादी नाहीं खोइहैं। ईरान अउर अमेरिका के बीच जउन ई ‘जुबानी जंग’ बढ़त है, उ असल मा मनोवैज्ञानिक दबाव बनावै क तरीका है। ईरान ‘अमेरिका-मुक्त भविष्य’ क बात कइके आपन मनई अउर साथी देसन का संदेसा देत है, वहीं अमेरिका कड़क बयान दइके अपने साथिन का भरोसा दिलावब चाहत है।
जहाँ तक जंग क डर या पक्की शांति क सवाल है, तौ अभी लच्छन ‘काबू वाले तनाव’ क ओर ईशारा करत हैं। भारी आर्थिक अउर राजनीतिक घाटा देखत हुए अमेरिका अउर इजराइल दूनों बड़ी जंग के पक्ष मा नाहीं हैं। बतकही के बावजूद अभी कुछु दिन शांति रहै क उम्मेद ढेर है। पच्छिम एशिया मा हाल ई है कि ‘न पूरी जंग, न पूरी शांति’। अब ट्रंप क रणनीति खाली ताकत देखौब नाहीं, बल्कि तालमेल बिठावै क कला प टिकी है। जउ न बातचीत अउर धीरज क रस्ता नाहीं अपनावा गवा, तौ ई मामला कौनों बड़े झगड़ा मा बदल सकत है, जेकर असर भारत प भी पड़ी।