संपादकीय

राजनीतिक चर्चा क जरिया बनी झालमुढ़ी, अब बहुरिहें झालमुढ़ी बेचे वालन क दिन

पच्छिम बंगाल के चुनाव के नतीजा आ चुका हय। शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई में राज में नई सरकार बन चुकी हय। ममता बनर्जी की सरकार अब इतिहास के पन्ना में सिमट गई हय। वैसे त हर चुनाव अभियान के साथ ढेर सारी घटना इतिहास में समाती रहत हय, अउर कुछ का असर त बरसों तक रहत हय। पच्छिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव अभियान में एक अइसन घटना भई, जउन न सिर्फ पच्छिम बंगाल के वोटरन पर अमिट छाप छोड़ी, बल्कि बांग्ला खान-पान अउर संस्कृति से उन लोगन क भी परचित करा दियय, जउन अब तक ओसे बिल्कुले अनजान रहे।

पच्छिम बंगाल ही नहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पूरा बिहार, झारखंड अउर उड़ीसा में झालमुढ़ी खान-पान क एगो अभिन्न अंग हय। झालमुढ़ी में दुई शब्द हय। पहिला शब्द हय ‘झाल’, जउनकर मतलब होत हय तीखा… अइसन तीखापन, जउनकर असर सिर्फ जुबान पर ही नहीं महसूस होय, बल्कि जुबान के सिसियाहट के साथ नाक के रास्ते भी हल्की झलन क अहसास होय। इस शब्द क मूल में हय ‘मुढ़ी’, जउनके कतहूं मुड़ी त कतहूं मुरमुरा त कतहूं मुर्ही कहा जात हय। इसमें प्याज, टमाटर, नमकीन, हरी मिर्च, सरसों तेल, नमक अउर भुना जीरा आदि डाल के जउन मिश्रण तैयार कइया जात हय, ओके झालमुढ़ी या झालमुड़ी कहा जात हय।

इसी झालमुढ़ी क झारखंड से सटे पच्छिम बंगाल के झारग्राम जिला में 19 अप्रैल के दिन चुनाव प्रचार के बीच सड़क पर उतर के मात्र दस रुपिया में खरीद के जब प्रधानमंत्री वहां मौजूद मेहरारुन अउर बच्चन के साथ मिल के खाए रहे, तब झालमुढ़ी इंटरनेट सर्च के दुनिया में पहिला नंबर पर पहुँच गई।

झालमुढ़ी में कइयो बार भुना हुआ चना मिलाया जात हय त कतहूं भीगा हुआ कच्चा चना त कतहूं ओही चना से बनी घुघनी। जउन लोगन क घुघनी के बारे में पता नहीं हय, उनके जानकारी खातिर बता दीं कि भीगा हुआ चना क जीरा, हरी मिर्च अउर सरसों तेल में छौंक लगावे के बाद सूखा अउर कइयो बार प्याज-टमाटर आदि मिला के मसाला के साथ भी पकावा जात हय।

पच्छिम बंगाल ही काहे, पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार अउर झारखंड में मुढ़ी क खास कर के संझिया के चाय के वक्त खाया जात हय। इन इलाकन के स्कूलन, कॉलेज के बाहर, कचहरियन में स्टेशन के सामने झालमुढ़ी के ठेला अउर खोमचा खूब दिख जइहें। खास कर के बिहार, झारखंड अउर पच्छिम बंगाल में मुढ़ी तैयार की जात हय। एकरे खातिर पहिले धान क उबाला जात हय, फेर ओके सुखा के जउन चावल निकाला जात हय, ओके भुने के बाद मुढ़ी क रूप मिलत हय। अइसन कहि सकत अही कि मुढ़ी सेला चावल क भुना हुआ रूप हय।

पच्छिम बंगाल अउर मिथिलांचल में त मुढ़ी क पकौड़ा के साथ भी खाया जात हय। पच्छिम बंगाल में त ओके आलूचप के साथ खास तौर पर पसंद किया जात हय। अब सवाल उठ सकत हय कि आलूचप का होत हय? असल में उबला हुआ आलू क मसल के ओमें नमक, मसाला आदि मिला के ओकर टिक्की बनाई जात हय। फेर ओके बेसन में डुबो के छाना जात हय। इसी क आलूचप कहा जात हय। वैसे आलूचप पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा में खूब प्रचलित हय, खास कर के संझिया के चाय के वक्त।

झालमुढ़ी क पच्छिम बंगाल के राजनीति से खास रिश्ता हय। राजनीतिक, चुनावी चर्चा में चाय के साथ आसानी से मिलत झालमुढ़ी ही होती हय। कइयो बार सिर्फ मुढ़ी भी खाया जात हय। पूर्वी उत्तर प्रदेश में शादी-ब्याह, मुंडन-जनेऊ के हल्दी अउर मंडप बने के दिन खास तौर पर लोगन क सिर्फ मुढ़ी मिठाई या गुड़ के साथ नाश्ता में दी जात हय।

बहुत कम लोग जानत हय कि पच्छिम बंगाल के पिछला विधानसभा चुनाव नतीजा के बाद कोलकाता के एगो मैदान पर ममता बनर्जी बाबुल सुप्रियो के साथ झालमुढ़ी खाई रहिन। एकरे जरिए ऊ अपनी जीत, भाजपा से बेफिक्री अउर अपने लोगन क संदेश दिहिन। उन्नीस अप्रैल क झारग्राम में झालमुढ़ी खरीदत वक्त पता नहीं प्रधानमंत्री मोदी क ई पता रहे कि नहीं, लेकिन ऊ एकरे जरिए इतिहास रच दिहिन।

गांधी जी के बारे में कहा जात हय कि ऊ बड़े संचारक यानी कम्युनिकेटर रहे। प्रधानमंत्री मोदी भी बड़े संचारक हय। मात्र दस रुपिया के झालमुढ़ी के जरिए ऊ पच्छिम बंगाल के आम लोगन के दिल में जगह बना लिहिन। ऊ अपनी पार्टी क संदेश सीधे हर घर तक पहुँचा दिहिन।

जिन इलाकन में झालमुढ़ी खाई जात हय, उन इलाकन में देखब त हर राजनीतिक सम्मेलन, रैली के दौरान बाहर एकर ठेला अउर खोमचा लगल मिलत हय। कइयो बार नेता लोगन क इंतजार में समय काटे त कइयो बार भूख मिटावे क जरिया ई झालमुढ़ी ही होत हय। स्कूलन, कॉलेज अउर कचहरियन के आस-पास झालमुढ़ी अउर चना-चबेना क खोमचा अउर ठेला रउवा पच्छिम बंगाल, बिहार, झारखंड अउर पूर्वी उत्तर प्रदेश में खूब मिल जइहें। हाट-बाजार में भी संझिया के चाय के वक्त ई इलाकन क सबसे आसानी से सस्ते में उपलब्ध अउर पसंदीदा स्नैक यही झालमुढ़ी हय।

झालमुढ़ी आम लोगन अउर आम दुकानदारन से जुड़े क भी सबसे बड़ा जरिया हय। शायद यही वजह हय कि प्रधानमंत्री झारग्राम में सड़क किनारे के झालमुढ़ी क दुकान चुनलिन अउर मात्र दस रुपिया के झालमुढ़ी के लिफाफा के जरिए पच्छिम बंगाल के करोड़न दिलन में जगह बना लिहिन।

प्रधानमंत्री मोदी आत्मनिर्भर भारत अउर वोकल फॉर लोकल क नारा दिहिन हय। झालमुढ़ी उनकर ई दुनों नारन क भी प्रतिनिधित्व करत हय। झालमुढ़ी अउर ओमें शामिल तत्व क स्थानीय स्तर पर ही तैयार किया जात हय, स्थानीय लोगन में ई सबसे ज्यादा लोकप्रिय हय अउर एकरे जरिए स्थानीय स्तर पर एगो पूरी चेन क रोजी-रोटी चलत हय। इसलिए ई आत्मनिर्भर भारत क भी प्रतीक हय। चूँकि ओकर खरीद अउर खाए से स्थानीय रोजगार अउर पैदावार क सहयोग मिलत हय, इसलिए ई ‘वोकल फॉर लोकल’ के भी नजदीक हय।

पच्छिम बंगाल में अब सरकार बन चुकी हय। सरकार बने अउर जीत हासिल करे के बाद बीजेपी अउर उनकर नेता झालमुढ़ी क पार्टी कइले हय। उम्मीद करय के चाही कि आवे वाले दिनन में पच्छिम बंगाल के सरकार राजनीतिक विमर्श क जरिया बनी झालमुढ़ी अउर ओपर निर्भर लोगन क भलाई क दिशा में जरूर कदम उठाई।

-उमेश चतुर्वेदी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार अउर स्तम्भकार हय

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