सच कबहूँ-कबहूँ कल्पना सेउ बहुत जादा अजीब होत है। आज से पहिले शायदै कउनों अइसन सोचे होई कि एक्कौ अइसन समय आइ जाई जब मनइन मा अपने आप का कॉकरोच कहै की होड़ लग जाई। पूरे देस मा ‘मैं भी कॉकरोच’ नियर एक्कौ बड़ा अभियान सुरू होइ जाई। लोग, खास कइके लाखों जवान ‘मैं भी कॉकरोच’ जइसन मीम्स अउर बैनरन के सहारा न केवल अपने आप का कॉकरोच कहै मा गरब महसूस करिहैं, बल्कि हैशटैग के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एका जादा से जादा लोकपिरिय बनावै की कोसिसिउ करिहैं।
मुला अइसन भवा अउर इत्ती तेजी से भवा कि कउनो का सोचे-समझे का मौका तक नाहीं मिला। 15 मई का एक्कौ मामला की सुनवाई के दौरान देस के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत जेह तरह के सब्द अउर तेवर के साथे बेरोजगार जवानन का कॉकरोच से जोड़िन, ओसे देस मा एक्कौ नया तूफान खड़ा होइ गवा। हालांकि अगले ही दिन जस्टिस सूर्यकांत अपनी बात पै सफाई भी देहिन। मुला ओकरे बादौ विरोध की आवाजें बंद नाहीं भइँ।
पूरे देस मा सरकारी सिस्टम से खिसियाने लाखों जवान अलग-अलग तरीका से लगातार आपन गुस्सा तउ देखाइये रहे रहेन, मुला देस की राजधानी दिल्ली से लगभग 11,500 किमी दूर बैठे एक्कौ हिंदुस्तानी जवान अभिजीत दीपके (जे महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के रहै वाले अहइँ) के दिमाग मा एक्कौ जुगाड़ आवा अउर ऊ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तुरंतै ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बनाइ दिहिन।
ओकरे बाद देखत ही देखत भारत के लोकतंत्र मा कछू अइसन होत नजर आवा, जे इससे पहिले कउनो सोचेव नाहीं रहा होई। देखत-देखत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के फॉलोअर्स की गिनती 2 करोड़ 30 लाख तक पहुंचे वाली है। ई दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल होवै का दावा करै वाली भारतीय जनता पार्टी के इंस्टाग्राम पर फॉलोअर्स की कुल गिनती 93 लाख से लगभग ढाई गुना जादा बा। यहि बीच पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके भी लगातार चरचा मा रहे। पार्टी के एक्स (ट्विटर) अकाउंट पर कबहूँ रोक लगाई गइ तउ कबहूँ वेबसाइट का डाउन करै का आरोप लगावा गवा।
जैसे ही मनइन इ पार्टी के इतिहास-भूगोल का खंगालब सुरू कीन, घबराए अभिजीत दीपके तुरंतै सफाई देब सुरू कइ दिहिन। यहि बीच ऊ पार्टी के सरकारी इंस्टाग्राम पेज का हैक होवै का दावा भी कीन अउर जब ई ठीक भवा तउ बबाल खड़ा करै वाले पार्टी के संस्थापक मेघनन्द का उनकी ही पार्टी फॉलो करब बंद कइ चुकी रही। मतलब कतहुँ न कतहुँ, कछू तउ गड़बड़ बा। कछू तउ अइसन होत बा जे अभी साम्हे से देखात नाहीं बा मुला ओकर अहसास तउ होइयै रहा बा।
बीजेपी इ पार्टी का विदेशी धरती से चलै वाले विपक्षी दल का टूलकिट बतावत है, तउ हुवाँ कइयौ बड़े पत्रकार अउर बुद्धिजीवी लोग एका बीजेपी की ‘बी टीम’ के रूप मा पेस करत अहइँ। अभिजीत दीपके की भी कइयौ हरकतें संका पैदा करत बाटी। अभिजीत द्वारा एक्कौ खास पार्टी के समर्थक माने जाय वाले पत्रकारन का ही इंटरव्यू देब, विवादी मनई का अनफॉलो कइके पहिले कछू खास पत्रकारन का फॉलो करब अउर फिर ओन्हें भी अनफॉलो कइ देब। सोचौ जे मनई सुरू से ही इत्ता जादा सेलेक्टिव बा, ओकरे पीछे केतनी बड़ी टीम या केतना बड़ा दिमाग काम करत होई जे भारत के लोकतांत्रिक आंदोलन के मिजाज, भारत की मेनस्ट्रीम अउर नई मीडिया (यूट्यूबर्स) की आदतन का केतनी नीक तरह से समझत है।
आंदोलन के सहारा देस मा एक्कौ माहौल पैदा करै मा बीजेपी अउर आम आदमी पार्टी दोनों का महारत हासिल बा। दुक्ख की बात तउ ई बा कि देस की सबसे पुरान पार्टी जे देस पर सबसे जादा राज कीस है अउर जे आज के समय मा सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी आय, ऊ कांग्रेस बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाउब अउर ओका लोकपिरिय बनावै का तरीका भूलि चुकी बा।
ई बातौ पर धियान देवे लायक बा कि कॉकरोच जनता पार्टी का कछू बड़े पत्रकार अपने-अपने यूट्यूब चैनल पर जेतना जगह दे रहे हैं, ओसे भी कतहुँ जादा जगह मेनस्ट्रीम मीडिया देय रहा बा। हाल के सालन मा अइसन कबहूँ भवा रहा, याद करै की कोसिसिउ करौ। इ लेख के लिखइया अरविंद केजरीवाल के आंदोलन का बहुत सुरू से कवर कीन रहा, जेकर सबसे खास बात ई रही कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के न्यौता मा जेह केजरीवाल का नाम सबसे आखिर मा ‘और अरविंद केजरीवाल’ लिख के आवत रहा, ओही पार्टी मा अब खाली अरविंद केजरीवाल ही बचे रहि गय अहइँ।
याद करौ कि ओही समइयो मा अन्ना-अरविंद के आंदोलन पर सवाल उठावै वाले हर मनई का बेईमान के रूप मा देखा जाय लागत रहा, अउर आजौ जेकर तुहूँ कॉकरोच जनता पार्टी से सवाल पूछत अहा, तउ एक्कौ खास इको-सिस्टम के लोग (पत्रकार भी) तुरंतै साम्हे आइके तुम्हारी वफादारी पर सवाल उठावै लागत हैं अउर पूछै लागत हैं कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी से कउनो का का दिक्कत होइ सकत है? मुला अइसन कहै वाले लोग पुरान कहावत भूलि जात हैं कि ‘दूध का जरा मट्ठा भी फूँक-फूँक के पीत है’। वैसेउ लोकतंत्र की पहिली सरत तउ इहै होत है, ‘सवाल पूछै की आजादी’ अउर सवालन से ऊपर कउनो नाहीं होइ सकत। जे कउनो नेता या संगठन अपने आप का सवालन से ऊपर उठावै की कोसिसिउ करत है, ओकर एक्कै संदेस निकलत है कि ओकर नीयत साफ नाहीं बा।
ई बात बिल्कुलै सच बा कि सरकार के काम-काज का लेके मनइन मा, खास कइके जवानन मा बहुतै गुस्सा बा। मुला ई देस ओसे पहिले भी अइसन दौर से गुजर चुका बा जब देस के जवानन के गुस्सा का इस्तेमाल कछू खास लोगन अपने-अपने राजनीतिक फायदा खातिर कीन। अइसन लोग जवानन का सुनहरे भविस्स के सपना देखाइन, अइसन-अइसन झूठ अउर सुघर वादे कीन जेका पूरा करब कउनो आसान काम नाहीं रहा। यहि बरे इ बार भारत के मनइन का, खास कइके जवानन का होसियार रहै की जरूरत बा। देस मा बदलाव लावै का कउनो भी आंदोलन देस की धरती से ही चले का चाही, अउर कउनो भी नए मनई या संगठन पर भरोसा करै से पहिले मनइन का आँख मूँद के अपने आप से ई सवाल जरूर पूछे का चाही कि ओ नए संगठन, आंदोलन या मनई के अभियान से सबसे जादा फायदा कउन राजनीतिक दल या नेता का होई?
– संतोष कुमार पाठक, लेखक वरिष्ठ पत्रकार अउर राजनीतिक विश्लेषक अहइँ।