अमेरिका क अब ई बात नीक तना समझ मा आइ गइ अहै कि चीन जइसन बढ़त महाशक्ति क रोकब ओकरे अकेले क बस क बात नाहीं रहि गवा अहै। इहै कारन अहै कि चीन से लगभग खाली हाथ लौटे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क अब उम्मीद क सबसे मजबूत किरन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क दरबार मा देखाइ देति अहै। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो क भारत दौरा दर असल इहै बदली भइ वैश्विक मजबूरी अउर रणनीति क इसारा अहै। ट्रंप जउने तना भारत मा अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से बातचीत क दौरान खुलेआम कहेन कि “मोका प्रधानमंत्री मोदी बहुत पसंद अहैं। मोदी महान अहैं अउर ओ हमार दोस्त अहैं।” ट्रंप तउ हियाँ तक कहि दिहिन कि “हम भारत क एतने नेड़े पहिले कबहूँ नाहीं रहेन अउर भारत मोरे अउर अमेरिका पर सौ फीसदी भरोसा कइ सकत अहै।” ई बयान खाली दोस्ती देखॉवै क नाहीं अहै, बल्कि ओ बदली भइ अमेरिकी नीति क इसारा अहै जेहमा वॉशिंगटन अब भारत क एशिया मा ताकत क संतुलन बनाइ रक्खै वाला सबसे जरूरी खंभा क रूप मा देखत अहै। दिलचस्प बात ई भी रही कि मार्को रुबियो अपने भारत दौरा मा ताजमहल क दीदार क कार्यक्रम भी रक्खेन। कूटनीतिक गलियारा मा एका खाली घूमे-फिरे क नाहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेस माना जात अहै, मनौ अमेरिका भारत क ई भरोसा देवावै चाहत होय कि ओ ई बार दबाव नाहीं, बल्कि मया अउर साझेदारी क पैगाम लेके आवा अहै।
देखा जाय तउ पिछले कुछ बरिसन मा अमेरिका क विदेश नीति मा भारी उतार-चढ़ाव देखै क मिला अहै। ट्रंप सरकार क दौरान “अमेरिका फर्स्ट” क नीति क वजह से साथी देसन मा घबराहट पैदा होइ गइ रही। कइउ देसन क लाग कि वॉशिंगटन अब भरोसेमंद साथी नाहीं रहि गवा अहै। लेकिन अब हालात बदलत अहैं। चीन क आर्थिक अउर फौजी ताकत जउने तेजी से बढ़ी अहै, ओसे अमेरिका क ई सोचै पर मजबूर होइ का पड़ा कि एशिया मा आपन दबदबा बनाइ रक्खै बरे भारत जइसन लोकतांत्रिक अउर बढ़त ताकत क साथे मजबूत रिस्ता जरूरी अहै।
ईरान जंग फिर से सुरू होवै क आशंका क बीच मोदी से मिले मार्को रुबियो, पीएम क दीहिन ट्रंप क खास संदेस
सच पूछो तउ, चीन खाली ब्यापार मा मुकाबला करै वाला नाहीं रहि गवा अहै। ओ अब दुनिया क सप्लाई चेन, टेकनोलॉजी, डिफ़ेंस क सामान बनावै अउर रणनीतिक निवेश क जरिया पूरी दुनिया मा आपन असर बढ़ावत जात अहै। दक्खिन चीन सागर से लेके ताइवान तक, बीजिंग क ई आक्रामक रवैया अमेरिका बरे बड़ी चुनौती बन चुका अहै। अइसन मा भारत अमेरिका बरे एक स्वाभाविक बिकल्प बनिके उभरा अहै। भारत एक अइसन देस अहै जेकर अरथब्यवस्था बहुत तेजी से बढ़ रही अहै, जेकरे पास बहुत बड़ा बजार अहै अउर जउन लोकतांत्रिक मूल्यन क बात करत अहै। अमेरिका ई भी समझ चुका अहै कि खाली फौजी ताकत से चीन क रोका नाहीं जाइ सकत। ओकरे बरे आर्थिक नेटवर्क, टेकनोलॉजी क साझेदारी अउर भरोसेमंद औद्योगिक ढांचा बहुत जरूरी अहै। इहै कारन अहै कि सेमीकंडक्टर, डिफ़ेंस मैन्युफैक्चरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिटिकल मिनरल्स अउर डिजिटल टेक्नोलॉजी जइसन क्षेत्रन मा भारत क साथे साझेदारी बढ़ावै पर जोर दीन जा रहा अहै।
ओहर, भारत बरे भी ई मौका कउनो छोट-मोट नाहीं अहै। बहुत दिनन तक भारत गुटनिरपेक्ष नीति अउर रणनीतिक आजादी क प्राथमिकता दीहिस। लेकिन अब नई दिल्ली ई बात समझ रही अहै कि दुनिया क ताकत क संतुलन मा बिना अगुआई कइले आपन फायदा सुरक्षित नाहीं रक्खा जाइ सकत। इहै वजह अहै कि भारत क्वॉड जइसन मंचन मा बढ़ि-चढ़ि के हिस्सा लेत अहै अउर अमेरिका, जापान अउर ऑस्ट्रेलिया क साथे सहयोग बढ़ावत अहै। हालांकि, भारत क चुनौती ई अहै कि ओ अमेरिका क साथे करीबी बढ़ावत हुए भी आपन आजाद विदेश नीति बनाइ रक्खे। रूस क साथे डिफ़ेंस क रिस्ता होय या पच्छिम एशिया मा संतुलन, भारत कउनो एक खेमा मा पूरी तना सामिल होवै से बचता रहा अहै। इहै ओकर सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत भी अहै।
एक चीज अउर साफ़ होइके आवत अहै कि अमेरिका क अब भारत क साथे रिस्तन मा खाली रणनीतिक बातन क नहीं, बल्कि असल मा निवेश क भी जरूरत अहै। अगर वॉशिंगटन सच मा चीन क असर कम करब चाहत अहै, तउ ओका भारत मा फैक्ट्री, टेकनोलॉजी अउर औद्योगिक ढांचा क मजबूत करै बरे गंभीर रूप से पइसा लगावइ का परी। खाली भाषण अउर समझौता से काम नाहीं चली। देखा जाय तउ भारत क भीतर कइउ अइसन क्षेत्र अहैं जहाँ अमेरिकी निवेश बड़ा बदलाव लाइ सकत अहै। ऊंच टेकनोलॉजी, डिफ़ेंस क सामान बनावै, डिजिटल डेटा सुरक्षा अउर सप्लाई चेन क क्षेत्र मा भारत तेजी से आगे बढ़ि सकत अहै। ओसे दूनो देसन क फायदा होई। एक तउ अमेरिका क चीन पर निर्भरता कम करै मा मदद मिली अउर दूसर भारत क दुनिया क प्रोडक्शन हब बनै क मौका मिली।
लेकिन ई साझेदारी क असली परीक्षा भरोसे पर होई। अमेरिका क पिछला रिकॉर्ड कइउ बार डाँवाडोल रहा अहै। अफगानिस्तान से अचानक फौजन क वापस बुलावब अउर बदलत नीतियन ने ओकरे साथियन क होसियार कइ दीहिस अहै। भारत इहै मारे हर कदम फूँक-फूँक के धरत अहै। वैसे भी आज क दुनिया मा गठबंधन खाली लड़ाई लड़ै बरे नाहीं बनत, बल्कि टेकनोलॉजी, ब्यापार, डेटा अउर सप्लाई चेन पर कब्ज़ा पावै बरे भी बनत अहै। अमेरिका अउर भारत क रिस्ता अब इहै नये दौर मा पहुँच चुका अहै। ई रिस्ता खाली दू देसन क बीच साझेदारी नाहीं अहै, बल्कि एशिया अउर दुनिया क नई ताकत क ढांचा क आधार बनि सकत अहै। मार्को रुबियो क यात्रा इहै बदलत भू-राजनीति क संदेस अहै। ई साफ इसारा अहै कि अमेरिका क अब भारत क जरूरत महसूस होइ रही अहै। अउर भारत भी ई समझ चुका अहै कि दुनिया क राजनीति मा अब बड़ा खिलाड़ी बनिके उतरै क बखत आइ गवा अहै।
एकरे अलावा, हाल क घटनान से ई बात भी साफ होइ गइ अहै कि अमेरिका क चीन नीति ओतनी कामयाब नाहीं रही, जेतनी क ट्रंप सरकार उम्मीद लगाइ बैठी रही। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हाल ही मा चीन क दौरा पर गए रहेन, लेकिन हियाँ ओन्हन क कउनो बड़ी रणनीतिक कामयाबी नाहीं मिली। ब्यापार, टेकनोलॉजी अउर भू-राजनीतिक तनाव जइसन मुद्दन पर बीजिंग अमेरिकी दबाव क आगे झुकै क कउनो संकेत नाहीं दीहिस। जानकारों क मानब अहै कि एकरे बादे वॉशिंगटन क फिर से ई अहसास भवा कि एशिया मा चीन क काबू मा रक्खै बरे खाली भारत क सहयोग ही काम आई। इहै वजह अहै कि ट्रंप क बोली अब बदली-बदली नजर आइ रही अहै।
ट्रंप क चीन यात्रा क तुरंतै बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत पहुँचेन अउर ओ भारत क “नेचुरल पार्टनर” बतावत रिस्तन क नई दिसा देवै क बात कहेन। माना जात अहै कि ट्रंप अपने बेहद करीबी लोगन मा गिने जाय वाले भारत मा अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर अउर विदेश मंत्री मार्को रुबियो क भारत क साथे रिस्तन क फिर से मजबूत करै क जिम्मेदारी सौंपेन अहै। खुद सर्जियो गोर खुलेआम कहेन कि ट्रंप भारत अउर प्रधानमंत्री मोदी क साथे रिस्तन क बहुत जरूरी मानत अहैं। सच तउ ई अहै कि अमेरिका अब समझ चुका अहै कि चीन क साथे “मुकाबला अउर सहयोग” क ओकर नीति क फायदा बहुत कम मिलत अहै, जबकि भारत क साथे मजबूत साझेदारी इंडो-पैसिफिक मा ओका कइउ गुना जादा मजबूत अउर भरोसेमंद सहारा देइ सकत अहै।
सायद इहै एक कारन अहै कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अपने दौरा क दौरान साफ-साफ कहेन कि भारत अब अमेरिका क “सबसे जरूरी रणनीतिक साथियन” मा सामिल अहै। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अउर विदेश मंत्री एस. जयशंकर क साथे बैठकन क बाद रुबियो इसारा दीहिन कि दूनो देसन क बीच बहुत दिनन से अटका ब्यापार समझौता अब आखिरी दौर मा पहुँच चुका अहै अउर आवै वाले कुछ हफ़्तन मा एह पर सहमती बनि सकत अहै। रुबियो ई भी साफ करेन कि ई साझेदारी खाली टैक्स या ब्यापार तक सीमित नाहीं अहै, बल्कि एकर मकसद टेकनोलॉजी, निवेश, सप्लाई चेन अउर सामरिक सुरक्षा मा गहिर सहयोग बनावब अहै। क्वॉड क लेके भी अमेरिका अब खाली दिखावटी बैठकन से आगे बढ़िके ओका असली आर्थिक अउर रणनीतिक गठबंधन क रूप मा बिकाश करब चाहत अहै, जेहमा समुंद्री सुरक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स अउर चीन क बढ़त असर क मुकाबला करब मुख्य मुद्दा होई। रुबियो क बयानेन से ई साफ झलकत अहै कि वाशिंगटन अब भारत क खाली दक्खिन एशिया क ताकत नाहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक रणनीति क मुख्य खंभा क रूप मा देखत अहै।
खैर, ई पूरा घटनाक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क नपा-तुला अउर दूर क सोच क कूटनीति क बड़ी सफलता क रूप मा देखा जात अहै। पिछले लगभग एक बरिस से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क ओर से भारत क खिलाफ तीखी बातन, ब्यापारिक दबाव अउर कइउ अइसन संकेत लगातार सामने आवत रहे जउन परेशान करै वाले रहे, लेकिन नई दिल्ली कबहूँ भी गुस्सा या बहकावे मा आइके कउनो बयानबाजी क रस्ता नाहीं चुनिहिस। मोदी सरकार धीरज, संतोष अउर रणनीतिक चुप्पी साधे रखत आपन देस क फायदा क ही सबसे ऊपर रक्खिस। भारत न तउ अमेरिकी दबाव क आगे झुकिस अउर न ही रिस्तन क लड़ाई-झगड़ा क तरफ जाय दीहिस। एकरे बदले सही बखत क इंतजार करत हुए भारत आपन आर्थिक ताकत, दुनिया मा साख अउर सामरिक जरूरत क अउर मजबूत करिस। आज हाल ई अहै कि वही अमेरिका, जउन कबहूँ भारत पर दबाव बनावै क कोसिस करत रहा, अब रिस्तन क सुधारै अउर भारत क आपन सबसे जरूरी रणनीतिक साझीदार बतावै पर मजबूर अहै। ई खाली कूटनीतिक जीत नाहीं अहै, बल्कि ई ओस आत्मविश्वासी भारत क मूरत अहै जउन दुनिया क देखाइ दीहिस कि मजबूत देस सोर-शराबा से नाहीं, बल्कि धीरज, संतुलन अउर सही रणनीति से दुनिया मा आपन जगह बनावत अहैं।
-नीरज कुमार दुबे
