संपादकीय

देश कइ वैश्विक पहचान बनावै अउर जड़न से जोड़इ मा कामयाबी मिली हइ

आजकल भारत कइ मीडिया मा बंदिसन अउर लोकतंत्र कइ सुकड़त जाय कइ किस्सा हवा मा तैरत हइँ। लोकतंत्र बचावै मा उ सबइ अगाड़ी हइँ जेकर सासन कइ कहानी खुदै उनकर मुंह चिढ़ावत हइ। मीडिया का दबै कइ, काबू मा रखइ कइ कहानी आजु कइ नाहीं आय। लेकिन मीडिया कइ हिम्मतौ आजु कइ नाहीं आय। हमरे देस मा पत्रकारिता कइ सुरुवातै जेम्स ऑगस्टस हिकी कइ क्रांतिकारी कलम से होत हइ, जे अंग्रेज लाट साहबन कइ बैंड बजाइ दिहिस। अंग्रेजी हुकूमत कइ खिलाफ आवाज उठाइके उ अंग्रेज होइकेव जेलन कइ हवा खाइस, जुरमाना भरेस अउर चुपचाप मउत पाइस। मुला हिकी ई बताइ गवा कि पत्रकारिता काहे अउर कइसे करइ कइ चाहत हइ। इकर बाद आजादी कइ आंदोलन मा यही पत्रकारिता ‘खबर’ कइ जगह ‘पैगाम’ देवइ वाली बनि गइ। जेकरे कारन सायर का कहइ का परा कि जब तोप मुकाबिल तो अखबार निकालो।

सुनइ अउर देखइ कइ समइ – हमरे देस कइ हर क्रांतिकारी अउर आजादी कइ नायकन सीधा या परोच्छ रूप से पत्रकारिता का एक हथियार नियर इस्तेमाल कीन। लोकमान्य तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे, गणेशशंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी सबइ पत्रकारिता कइ माध्यम से देस का जगाइन। पत्रकारिता कइ जोत आजादी कइ आंदोलनै तय कइ दिहे रहा। उ रहा जनता कइ पच्छ लेब, नियाव बरे लड़ब अउर सच कइ खोज। आजादी कइ बाद देस कइ नय निर्माण कइ काम होइ या आपातकाल विरोधी लड़ाई, हमरे पत्रकारन हर जगह अपने उज्जर निसान छोड़िन हइँ। आजु मीडिया कइ रूप बहुतै बड़ा होइ गवा हइ। उ कइयू मंचन से कीन जा रही हइ। प्रिंट, टीवी, रेडियो से अलग मोबाइल पर होइ वाली पत्रकारिता कमाल करत हइ। कहा जात हइ कि डिजिटल कइ सूरज कबौ नाहीं डूबत। इही बरे आप देखब तउ पायब कि मीडिया कइ पहूँच मोबाइल कइ जरिया से जादातर लोगन तक होइ रही हइ। मीडिया कन्वर्जेंस कइ जरिया मोबाइल बनि गवा हइ। अइसे मा जादातर चीजन सुनी अउर देखी जा रही हइँ। पढ़इ कइ समन्वा गंभीर चुनौती हइँ। तउव एतने बड़े देस मा जेकर कुछू हिस्साव पढ़त हइ तउ उ संख्या करोड़न मा पहुँच जात हइ। दुनिया कइ तमाम देस एकै भासा मा सोचत, पढ़त अउर बोलत हइँ। हिंदुस्तान 22 बड़ी भासान अउर कइयूँ बोलिन मा सुनत, पढ़त अउर देखत हइ। इही बरे भारत कइ मीडिया कइ आकार बहुतै बड़ा हइ।

वैश्विक पटल पर उभरत भारत – डिजिटल मीडिया हमरे माध्यमन का दुनिया भर मा फैलाए हइ। भारतीय भासान का वैश्विक बनाइ दिहे हइ। कबहूँ फिलिमें हमरे भारतीय समाज कइ दुनिया भर मा चेहरा बनावत रही। अब मीडिया एकरे बीच मा हइ। यू-ट्यूब, सोशल मीडिया, वेब माध्यम, ई-पेपर अउर ई-बुक्स से एक नई दुनिया बनि रही हइ, जे भारत कइ दुनिया मा सुंदर छबि बनावै कइ काम कीस हइ। आजु भारत अउर ओकर भासान कइ साथे अंग्रेजी भासा मा भी भारतीयन कइ खास पहिचान हइ। उ सबइ जे लिखत, कहत अउर करत हइँ, ओसे देस कइ नाव दुनिया मा रोसन होइ रहा हइ। हिंदुस्तानी जहँवा-जहँवा गइन, अपनी भासा अउर संस्कृति कइ साथे गइन अउर उहँवा एक छोटहन भारत खड़ा कइ दिहिन। ई छोटहन भारत आजु मीडिया अउर संचार कइ साधनन से ताकत पावत हइ। अपने जड़न से जुड़ा भवा महसूस करत हइ। एक समइ मा अपनी भासा कइ छपाई, अखबारन, पत्र-पत्रिकान, किताबन अउर मनोरंजन का पाब मुस्किल रहा, मुला डिजिटल साधनन ई सब असान कइ दिहिस हइ। दूरी, भूगोल अउर भासा कइ सब अंतर मिटाइके भारत आपके घरे पहुँच जात हइ। इससे भारत कइ ताकत बनि रही हइ। सॉफ्टपावर का कइ सकत हइ, ई हम सबइ महसूस करत हन।

नया भारत बनावै मा खास भूमिका – एक नवा भारत बनावै अउर ओका जोड़े मा भारतीय मीडिया कइ भूमिका का मानइ का चही। अपनी सुरुवातै से उत्तर से दच्छिन, पूरब से पच्छिम भारतीय पत्रकारिता अउर साहित्य कइ बोली एकै रही हइ। सबइ भारत कइ भावना का आवाज दिहिन हइँ। एकता का जमाइन हइँ। जगदगुरु शंकराचार्य कइ बाद भारत का एक करइ कइ काम पत्रकारिता अउर साहित्यै कीन हइ। अपने देसभक्ति कइ बिचारन वाले अखबार से तमिलनाडु कइ सुब्रम्यण्यम भारती जे काम करत रहेन, वही काम हिंदी मा माखनलाल चतुर्वेदी करत रहेन। उनकर साहित्य अउर पत्रकारिता दुनों मा भारत बोलत हइ। इही तरे हम देखत हन कि समाचार माध्यमन न सिर्फ खबरिन का लेन-देन कीन बल्कि पूरे देस मा एकै भावना भरि दिहिन। इहै हमरे पत्रकारिता कइ असली ताकत हइ। पत्रकारिता कइ नायक लोकमान्य तिलक कइ ई बात ‘स्वराज हमार जनमसिद्ध अधिकार हइ’, पूरे देस कइ आवाज बनि गइ। देस आजादी कइ सपना देखइ लाग। उनकर प्रेरणा से कइयूँ लोग पत्रकारिता मा आएन अउर उहै भावना कइ साथे आगे बढ़ेन। इनमा हिंदी कइ माधवराव सप्रे कइ उदाहरन सबसे खास हइ, जे तिलक जी कइ मराठी अखबार ‘केसरी’ से सीख लेइके ‘हिंदी केसरी’ सुरु कीन। अइसे कइयूँ नायक देस का जोड़े कइ तरीका खोजि-खोजि के पत्रकारिता कइ जरिया समन्वा आवत रहेन। सबइ भारतीय भासान कइ बड़े-बड़े संपाद कन इ दौर मा जे भावना कइ जोत जगवाइन, उ बेमिसाल हइ।

सांस्कृतिक बहाव हइ एकता कइ कारन – एतनी सारी भासान, बोलिन, खानपान, अउर स्थानीय पहिचानन का समेटे भवा देस अगर आजु एक हइ तउ इकर कारन हइ, ओकर सांस्कृतिक बहाव कइ एक होइब। लम्बी गुलामी, अउर वैचारिक गुलामी मा जकड़े बुद्धिजीवियन द्वारा कीन गइ लम्बी कुतर्कन कइ बादौ अगर इ देस कइ बुद्धि सोइ नाहीं गइ, तउ इकर कारन इ देस कइ गहिर सांस्कृतिक जड़न हइँ। समइ-समइ पर नायक आवत रहे हइँ, जे हमका याद दिलावत हइँ कि सब कुछ कबौ खतम नाहीं होइ सकत। भारतेंदु हरिश्चंद्र उनमा से एक हइँ, गांधी हइँ, बाद कइ दिनन मा दीनदयाल उपाध्याय, डा. राममनोहर लोहिया, अटलबिहारी वाजपेयी हइँ। ई सबइ पत्रकारिता का अपनी बात कहइ कइ जरिया बनाइन। मीडिया कइ माध्यम से समाज का ओकर पहिचान से जोड़िन। उहै समइ समाज का राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त याद दिलावत हइँ –
“हम का रहेन, का होइ गयेन, अउर का होइब अभी, आओ मिलिके आजु बिचारीं, ई सभै समस्या सभी।”
जाहिर हइ कि हमरी चुनौतियन अभी खतम नाहीं भइ हइँ। हमका रोजे अपने देस कइ समन्वा खड़ी मुसिबतन कइ ठोस अउर सही हल खोजइ कइ चही। पत्रकारिता, साहित्य अउर कला मा ई ताकत हइ कि उ सबइ समाज का सहारा देइके ओका एक जूट कइ सकत हइँ। ओका रस्ता देखाइ सकत हइँ। भारतीय पत्रकारिता कतहुँ न कतहुँ अपनी इ भूमिका पर आजुव टिकी हइ। अपनी इ भूमिका का अउर तेज करत भवे पत्रकारिता जगत का उ सब करइ कइ परी, जेकर उम्मीद हइ। इकर कसौटी भी तय हइ- जनता कइ पच्छ अउर सच कइ खोज। इहै मा भारतीय पत्रकारिता कइ भलाई हइ, इहै मा ओकर मान-सम्मान हइ।

प्रो. संजय द्विवेदी (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल मा जनसंचार विभाग कइ अध्यक्ष हइँ।)

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