भारत आजु एक ऐतिहासिक संक्रमण काल से गुजरत अहै। एक कइती देस विकसित भारत-2047 के संकरप (संकल्प) के साथ आगे बढ़त अहै, दुनिया क तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बने कइती अगुआइ करत अहै, दुनिया क मंचन पर भारत क मान-सम्मान लगातार बढ़त जात अहै, परधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगुवाई मा भारत दुनिया क राजनीति अउर कूटनीति के केंद्र मा उभरत अहै, तौ दूसरी कइती भारतीय राजनीति मा अपराध, धनबल अउर बाहुबल क बढ़ती पैठ लोकतंत्र क आत्मा क दुखावत अहै।
ई बड़ी विडंबना अहै कि जउन भारत क बिस्वगुरु बने क सुपना देखावा जात अहै, ओकर राजनीति अबहूँ अपराधमुक्त नहीं होइ पाई अहै। हालै मा पच्छिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सोझा आए आँकड़न ने ई चिंता क अउर गहिरा कइ दीन्ह अहै। अखबारन मा छपी एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिपोर्ट) क रिपोर्ट के मुताबिक पच्छिम बंगाल विधानसभा के करीब 65 फीसदी विधायक आपराधिक मामला वाले अहैं, जबकि 61 फीसदी विधायक करोड़पति अहैं। रिपोर्ट के अनुसार 294 विधायिकन मा से 190 विधायिकन ने अपने खिलाफ आपराधिक मामला घोषित कीन है अउर करीब 142 विधायिकन पर गंभीर आपराधिक मामला दर्ज अहैं। इनमा हत्या, हत्या क कोसिस, मेहरारू (महिला) के खिलाफ अपराध अउर दूसर गंभीर मामला भी शामिल अहैं।
ई खाली पच्छिम बंगाल क हाल नाइ अहै। संसद अउर देस क तमाम विधानसभा क हालत भी इससे बहुत अलग नाइ अहै। पिछले कुछ बरिसन के चुनावी विसलेसण बतावत अहैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना समेत कई राज्यन मा भारी संख्या मा अइसन जनप्रतिनिधि चुनिके आए अहैं जिन पर गंभीर आपराधिक आरोप अहैं। लोकतंत्र के मंदिरन मा अपराध अउर दागी छबि वाले लोगन क बढ़ती मौजूदगी आजु राष्ट्रीय चिंता क बिसय बनि चुकी अहै.
राजनीति मूल रूप से लोकसेवा, नैतिक अगुवाई अउर देस-बनाव (राष्ट्रनिर्माण) क जरिया मानी गय रही। महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, लाल बहादुर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेयी नियर नेतवन ने राजनीति क मलियार (मूल्य आधारित) दिसा दीन्ह। मुदा समय के साथ राजनीति मा वैचारिक प्रतिबद्धता क जगह धीरे-धीरे चुनावी गणित, धनबल अउर रसूखदार समूहन ने लेब सुरु कइ दीन्ह। आजु कइयो राजनीतिक दल उमेदवारी चुनइ मा योग्यता, चरित्तर अउर जनसेवा के बजाय “जीतइ क छमता” क पहिला धरम मानत देखात अहैं। यही कारन अहै कि दागी छबि वाले मनइन को भी टिकट देवै मा संकोच नाहीं कीन जात।
परधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र क राजनीति मा आवे के बाद कई मंचन से राजनीति के अपराधीकरन पर चिंता जताए अहैं। उइ संसद मा अउर बाहरी मंचन पर कइयो बार कहेन कि राजनीति क अपराधमुक्त बनाउब लोकतंत्र क मजबूती बरे जरूरी अहै। उइ जनप्रतिनिधियन से जुड़े माामलन् के जल्दी निपटाना बरे खास अदालतन क जरूरत पर जोर दीन्ह। मुदा चिंता क बात ई अहै कि आजु भी लगभग सभै राजनीतिक दलन क हालत एकै जइसन देखात अहै। चुनाव जीतइ क मजबूरी अउर राजनीतिक होड़ के कारन दल अपराधी अउर दागी उम्मीदवारन क टिकट देवै से बाज़ नाइ आवत अहैं।
ई हालत के पीछे कइयो कारन अहैं। पहिला कारन अहै चुनावन क बहुत ढेर खर्चीला होब। आजु चुनाव लड़ब आम मनई क बस क बात नाइ रहि गयी अहै। बड़े संसाधनन वाले अउर रुपिया-पैसा वाले रसूखदार लोग चुनावी प्रकिया मा जादे सरगरम रहत अहैं। दूसरा कारन अहै बाहुबल अउर धौंस क इस्तेमाल। कइयो इलाकन मा आजु भी राजनीतिक सिक्का जमावै बरे ताकत क दिखावा बहुत जरूरी माना जात अहै। तीसरा कारन अहै अदालती काररवाई क धीमी चाल। गंभीर अपराधन से जुड़े मामलन् क बरिसन तक लटके रहै के कारन आरोपी चुनाव लड़त रहत अहैं अउर जनप्रतिनिधि बनि जात अहैं।
राजनीति मा अपराधीकरन क दूसरा बड़ा पहलू अहै धनबल। पच्छिम बंगाल विधानसभा के आँकड़े बतावत अहैं कि 61 फीसदी विधायक करोड़पति अहैं। ई चाल पूरे देस मा देखात अहै। संसद अउर विधानसभा मा करोड़पति जनप्रतिनिधियन क संख्या लगातार बढ़त जात अहै। सवाल ई अहै कि का लोकतंत्र धीरे-धीरे आम नागरिक क पहुंच से दूर होत जात अहै? जउ कबहूँ राजनीति खाली अमीर अउर रसूखदार लोगन तक सिमट जाई, तौ लोकतंत्र क सबको साथे लै चलै वाली भावना कमजोर होइ जाई।
अइसन हालात मा नागरिक समाज अउर लोकतांत्रिक संगठनन क भूमिका बहुत जरूरी होइ जात अहै। ‘भारतीय मतदाता संगठन’ ई दिसा मा सराहनीय कोसिस कर रहल अहै। एकरे संस्थापक रिखबचंद जैन के अगुवाई मा लंबे समय से राजनीति क साफ-सुथरा अउर अपराधमुक्त बनावै बरे जन-जागरन अभियान चलाए जात अहैं। संगठन मतदाता जागरूकता, नैतिक मतदान, साफ-सुथरी राजनीति अउर जिम्मेदार नागरिकता क बढ़ावा देवै बरे काम कर रहल अहै। लोकतंत्र क खाली चुनावी प्रकिया नाहीं, बल्कि उसूलन पर टिकी व्यवस्था मानत हुए ई संगठन समाज क जगावै क कोसिस कर रहल अहै कि वोटर खाली जाति, धरम, इलाका या पार्टी की तरफदारी के आधार पर नाहीं, बल्कि उम्मीदवार क चरित्तर अउर ओकर समाजी जीवन देखिके वोट दें।
इसी तहरिया एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिपोर्ट) नियर संगठन भी चुनावी साफ-सफाई अउर जनप्रतिनिधियन क पुराना इतिहास जनता के सोझा लावै क जरूरी काम कर रहे अहैं। इन संगठनन क बदौलत आजु वोटरन क उम्मीदवारन के आपराधिक मामला, धन-दौलत अउर पढ़ाई-लिखाई क जानकारी मिलि पावत अहै। ई लोकतंत्र क मजबूत बनावै क दिसा मा एक बड़ा कदम अहै।
राष्ट्रीय चुनाव आयोग भी ई दिसा मा लगातार कोसिस कर रहल अहै। सुप्रीम कोर्ट के देस (निर्देश) के बाद राजनीतिक दलन क उम्मीदवारन क आपराधिक रिकार्ड जनता के सोझा लावै क हुकुम दीन्ह गवा अहै। उम्मीदवारन क हलफनामा मा अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, धन-सम्पत्ति अउर देनदारी क जानकारी देब जरूरी कीन गवा अहै। चुनाव आयोग लगातार मतदाता जागरूकता अभियान चलावत अहै। मुदा खाली कागजी कोसिस काफी नाहीं अहै। इन कोसिसन क अउर तेज, बड़ा अउर असरदार बनावै क जरूरत अहै।
आजु जरूरत अहै कि राजनीति के अपराधीकरन के खिलाफ देस के स्तर पर एक बड़ा आंदोलन खड़ा कीन जाय। इसके बरे कुछ मजबूत कदम जरूरी अहैं-
पहिला, जउन उम्मीदवारन पर हत्या, बलात्कार, अपहरण, भ्रष्टाचार नियर गंभीर आरोप अदालत से तय होइ चुके हों, उनके चुनाव लड़ै पर रोक लगावै बरे संजीदगी से सोचब चाही।
दूसरा, जनप्रतिनिधियन से जुड़े मामला क जल्दी निपटारा बरे खास अदालतन क संख्या बढ़ाई जाय ताकि बरिसन तक मुकदमा लटके न रहें।
तीसरा, राजनीतिक दलन क दागी उम्मीदवारन क टिकट देवै पर जवाबदेह बनावा जाय। उनकर जनता के सोझा बताना चाही कि साफ-सुथरी छबि वाले उम्मीदवार होवै के बावजूद दागी मनई क काहे चुना गवा।
चौथा, चुनावी खरच पर कड़ी लगाम अउर साफ-सफाई लाई जाय ताकि आम अउर लायक नागरिक भी राजनीति मा कदम रखि सकें।
पांचवां, मतदाता जागरूकता क एक जन-आंदोलन बनावा जाय। जब तक वोटर खुदै दागी उम्मीदवारन क नाकारि नाहीं देइहैं, तब तक सुधार अधूरा रही।
भारत आजु जेहि दिसा मा बढ़त जात अहै, हुंआ राजनीति क सुचिता अउर नैतिकता क जरूरत पहिले से कइयो जादे अहै। जउ हमन क 2047 तक विकसित भारत बने क अहै, जउ हमन क बिस्वगुरु बने क अहै, जउ भारत क दुनिया क अगुवाई करै क अहै, तौ राजनीति क अपराध अउर धनबल के असर से आजाद करै ही क होइ। आर्थिक ताकत, तकनीकी तरक्की अउर दुनिया मा इज्जत तबै काम आई जब लोकतंत्र क आत्मा सुरक्षित रही। राजनीति क मकसद खाली सत्ता पावे क नाहीं, बल्कि समाज बनावै क होवै चाही। लोकतंत्र खाली वोटन क जोड़-घटाव नाहीं, बल्कि भरोसा, नैतिकता अउर जनप्रतिनिधित्व क एक पवित्र व्यवस्था अहै। जउ राजनीति अपराधमुक्त होइ, तौ राज-काज अउर साफ-सुथरा होइ, जनता क भरोसा बढ़ी अउर देस बनावै क रफ़्तार भी तेज होइ।
आजु जरूरत खाली सरकारन या चुनाव आयोग क कोसिसन क नाहीं अहै, बल्कि समाज, मतदाता संगठनन, नागरिक संस्था, मीडिया अउर सचेत नागरिकन क एक साझी मुहीम क अहै। भारतीय मतदाता संगठन नियर कोसिस ई दिसा मा एक आस क किरिन अहै। इन कोसिसन क पूरे देस क रूप देवै क जरूरत अहै। भारत के विकसित भविस्सत क नींव खाली आर्थिक विकास नाहीं अहै, बल्कि साफ-सुथरी राजनीति भी अहै। काहे से अपराधमुक्त राजनीति ही विकसित भारत, समृद्ध भारत अउर बिस्वगुरु भारत क असली पहिचान बनि सकत अहै।
– ललित गर्ग, लेखक, पत्रकार अउर स्तंभकार