संपादकीय

गृहिणियां राष्ट्र निर्माता अहैं, समझि लीं कइसे? उनकै काम कै योगदान का कभी कम ना आंकैं

भारत कै सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) हालै मा गृहिणियन कै योगदान पर एक महत्वपूर्ण फैसला देत भइ कहा कि “गृहिणियां राष्ट्र निर्माता (Nation Builders) अहैं” अव उनकै घरेलू अव देखभाल संबंधी काम कै वास्तविक आर्थिक मूल्य अहै। सुप्रीम कोर्ट आपन प्रमुख टिप्पणी मा कहा कि गृहिणी का केवल “आश्रित” (dependent) मानब गलत अहै; असल मा पूरा परिवार उनकै मेहनत अव देखभाल पर टिकब अहै। एही कारण, मेहरियन द्वारा कीन्ह गय बिना वेतन कै घरेलू अव देखभाल वाला काम भारत कै GDP मा अनुमान से 15-17% तक योगदान देत अहै, फिर भी ओका पर्याप्त मान्यता ना मिलत। ओही गृहिणियां अहैं जउन बच्चन कै पालन-पोषण, शिक्षा, संस्कार अव मानव संसाधन बनावय कै जरिया राष्ट्र निर्माण मा सीधा भूमिका निभावत अहैं। एही से अदालत कहा कि घरेलू काम का आर्थिक विश्लेषण से बाहर रखब उचित ना अहै अव कानून का गृहिणियन कै मेहनत, सेवा अव त्याग कै मूल्य मानय का चाही। निष्कर्ष इ कि गृहिणियां राष्ट्र निर्माता अहैं, एही से उनकै काम कै योगदान का कम ना आंकैं।

देखा जाय तौ एक ऐतिहासिक कदम कै रूप मा सुप्रीम कोर्ट मोटर दुर्घटना मुआवजा कै मामला मा गृहिणी कै घरेलू योगदान का आंकत कम-से-कम ₹30,000 महीना कै मानक तय कीन्ह अहै अव “loss of domestic care” का अलग क्षतिपूर्ति मद कै रूप मा मान्यता दीन्ह अहै। बताइ दीं कि सुप्रीम कोर्ट पहिले भी कहा रहा कि, “गृहिणी कै घर मा कीन्ह गय काम ओकर दफ्तर जाय वाले मरद कै काम से कम कीमती ना अहै।” एही से न्यायपालिका कै नजरिया अब साफ तौर पर इ अहै कि गृहिणियां केवल परिवार सम्हारय वाली ना, बल्कि आर्थिक योगदान देय वाली अव राष्ट्र निर्माता अहैं। चुनौती अब इ अहै कि सरकारें, निजी संस्था अव समाज इ न्यायिक मान्यता का सामाजिक अव आर्थिक नीति मा कतना उतारत अहैं।

इ बात मा कउनौ दुइ राय ना अहै कि गृहिणियन कै योगदान भारतीय समाज अव अर्थव्यवस्था कै रीढ़ मानल जात अहै, लेकिन विडंबना इ अहै कि उनकै मेहनत का अक्सर “काम” कै जगह “कर्तव्य” मान लीन जात अहै। एही कारण उनकै योगदान का उ संस्थागत मान्यता ना मिल पावत जउनकै ऊ हकदार अहैं। सवाल इ अहै कि गृहिणियन कै आर्थिक योगदान कतना बड़ा अहै? तौ अर्थशास्त्रियन अव अलग-अलग अध्ययनन कै अनुसार जदि घर कै भीतर कीन्ह गय काम—जइसे खाना बनायब, बच्चन कै देखभाल, बुजुर्गन कै सेवा, घरेलू प्रबंधन, भावनात्मक देखभाल आदि—कै बाजार मूल्य जोड़ा जाय, तौ एकर योगदान GDP कै 15% से 40% तक आंका गय अहै। भारत मा कई अध्ययनन इका लगभग 15-17% या ओसे भी ज्यादा बतावा अहै।

# सवाल इ अहै कि फिर भी उनकै इ महत्वपूर्ण कामन का मान्यता काहे ना मिलत? तौ जवाब नीचे दिहा अहै:-

पहिला, जीडीपी कै गणना करय कै तरीका: GDP केवल उ सामान अव सेवा का गिनत अहै जउनकै बाजार मा लेनदेन होत अहै। गृहिणी कै मेहनत घर कै भीतर होत अहै, एही से उ राष्ट्रीय आय कै आंकड़ा मा सीधा ना देखात।

दूसर, ऐतिहासिक सामाजिक नजरिया: सदियन से घरेलू कामन का मेहरियन कै “स्वाभाविक जिम्मेदारी” मानल गय अहै। जब कउनौ काम का कर्तव्य मान लीन जात अहै, तौ ओकर आर्थिक मूल्य कम होय जात अहै।

तीसर, मेहनत कै अदृश्य होयब: एक गृहिणी दिनभर मा दर्जनों काम करत अहै, लेकिन उ सब छोटे-छोटे हिस्सा मा बंटा रहत अहैं। एही से उनकै मेहनत उतरी देखात ना अहै जतरी कउनौ दफ्तर या फैक्ट्री मा काम करय वाले व्यक्ति कै।

चौथा, नीति बनावय मा कम हिस्सेदारी: सत्ता अव नीति-निर्माण वाली संस्था मा लमहर समय तक मरदन कै दबदबा रहा। ओकर नतीजा इ भवा कि घरेलू मेहनत कै आर्थिक मूल्यांकन कै सवाल प्राथमिकता ना बन पाय।

पांचवां, वेतन अव मूल्य कै भ्रम: समाज अक्सर मानत अहै कि जउन काम कै बदला वेतन ना मिलत, ओकर आर्थिक मूल्य भी ना अहै। जबकि गृहिणी कै मेहनत परिवार कै कमाई अव उत्पादकता का सीधा बढ़ावत अहै।

# सवाल इ अहै कि निजी क्षेत्र अव सरकार का कर सकत अहैं? तौ उम्मीद इ रही:-

पहिला, घरेलू मेहनत कै नियमित आर्थिक मूल्यांकन।

दूसर, जनगणना अव राष्ट्रीय सर्वेक्षण मा गृहिणी कै मेहनत कै अलग हिसाब-किताब।

तीसर, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन अव बीमा योजना कै विस्तार।

चौथा, घरेलू कामन का “अनपेड वर्क” कै रूप मा नीति वाला कागजात मा मान्यता।

अव पांचवां, परिवारन मा घरेलू जिम्मेदारी कै अउर समान बंटवारा।

# जानि लीं, राष्ट्र निर्माण मा गृहिणियन कै भूमिका

गृहिणी केवल घर ना सम्हारत, उ भविष्य कै पीढ़ी बनावत अहै। एक मास्टर, डॉक्टर, फौजी, वैज्ञानिक, बिजनेसमैन या नेता बनय से पहिले हर आदमी कउनौ परिवार मा पलत-बढ़त अहै। उ प्रक्रिया मा गृहिणियन कै योगदान नीव जैसन रहत अहै। एही से इ कहब बढ़ा-चढ़ा के न होइ कि गृहिणियां केवल परिवार निर्माता ना, बल्कि राष्ट्र निर्माता भी अहैं। चुनौती इ अहै कि समाज अव संस्था इ योगदान का भावनात्मक सम्मान कै साथ-साथ आर्थिक अव नीतिगत मान्यता भी दें।

# भारतीय हिंदी साहित्य मा उनका श्रद्धा अव भक्ति कै नजर से देखल गय अहै

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो” — नामक कवि जयशंकर प्रसाद कै मशहूर पंक्ति भारतीय समाज मा मेहरियन कै सम्मान कै आदर्श दिखावत अहै। लेकिन आज इ सवाल स्वाभाविक अहै कि केवल श्रद्धा, सम्मान अव तारीफ कै शब्द से कब तक काम चली? जदि एक ओर मेहरिया का “देवी”, “शक्ति”, “मां” अव “राष्ट्र निर्माता” कहल जाय, अव दूसरी ओर उनकै मेहनत, अधिकार अव योगदान का उचित मान्यता न मिलै, तौ इ विरोधाभास ही मानल जाइ। गृहिणियन कै संदर्भ मा इ सवाल अउर भी जरूरी होय जात अहै। जदि ऊ परिवार कै नीव अहैं, बच्चन कै जरिया भविष्य कै नागरिकन का बनावत अहैं, उनकै बिना वेतन वाली मेहनत अर्थव्यवस्था मा बड़ा योगदान देत अहै, अव सर्वोच्च न्यायालय भी उनका “राष्ट्र निर्माता” मानत अहै, तौ फिर केवल कविता वाली तारीफ काफी ना अहै। एही से आज जरूरत अहै सम्मान कै साथ आर्थिक मान्यता कै, तारीफ कै साथ सामाजिक सुरक्षा कै, आदर्शवाद कै साथ नीतिगत बदलाव कै, अव प्रतीकात्मक गौरव कै साथ व्यावहारिक अधिकारन कै।

एही भावना का आधुनिक समय मा यों कहि सकत अहैं- नारी तुम केवल श्रद्धा हो, इ कहब अब काफी ना अहै, तुम मेहनत हो, सृजन हो, सामर्थ्य हो, तोहार मूल्यांकन भी जरूरी अहै। सम्मान कै शब्द मीठ अहैं, पर न्याय ओसे भी ज्यादा जरूरी अहै। दरअसल, 21वीं सदी कै मेहरिया-विमर्श कै एक बड़ा संदेश यही अहै कि मेहरिया का केवल पूजय या महिमामंडित करय कै बजाय उनकै योगदान का असली मौका, अधिकार अव मान्यता दीन जाय। तबे “नारी तुम केवल श्रद्धा हो” जइसन पंक्तियां आपन पूरा अर्थ मा सही साबित होइहैं।

– कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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