
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कय लइके कांग्रेस अउर ओकर वैचारिक साथी फेर वही पुरान शोर मचावत अहैं कि संघ पंजीकृत काहें नाहीं अहै? कर्नाटक कय मंत्री प्रियांक खरगे कय चिट्ठी अउर ओकरे बाद खड़ा कीन्ह गै राजनीतिक कोलाहल इ बात कय सबूत अहै कि संघ कय विरोध करय वाले के पास ना तौ तथ्य बचा अहै, न तर्क। ऊ खाली विवाद पैदा करय चाहत अहैं, काहें से कि जवन संगठन कय जनता कय भरोसा अउर समाज कय साथ मिला हो, ओका बदनाम करय कय सबसे आसान तरीका संदेह फैलावा होवत है।
मगर इ बार संघ भी साफ अउर सीधा जवाब दइ दिहिस। मोहन भागवत साफ कहेन, “हिंदू धर्म भी पंजीकृत नाहीं अहै।” इ ओ पूरी मानसिकता पर प्रहार अहै जवन मानत है कि भारत कय हर सांस्कृतिक चेतना कय सरकारी मुहर से ही वैधता मिली। भागवत कहेन कि संघ 1925 में स्थापित भवा रहा। का तब अंग्रेज से जाके पंजीकरण कराये जात? साथ ही आजादी कय बाद भी भारत कय संविधान कबहूँ इ अनिवार्य नाहीं कीन्ह कि हर स्वैच्छिक संगठन सरकारी रजिस्टर में दर्ज हो तभइ ऊ अस्तित्व में रह सकत है।
असल में कांग्रेस कय समस्या संघ कय पंजीकरण से नाहीं, संघ कय प्रभाव से अहै। जवन संगठन बिना सरकारी धन, बिना विदेशी मदद अउर बिना सत्ता कय सहारे सौ बरिस तक राष्ट्रजीवन कय दिशा दिहिस हो, ओसे कांग्रेस कय बेचैनी स्वाभाविक अहै। संघ चरित्र निर्माण करिस, अनुशासन दिहिस, समाज कय जोरिस, सेवा कय संस्कार दिहिस अउर राष्ट्रवाद कय जीवन कय व्यवहार बनाय दिहिस। दूसरी ओर कांग्रेस कय एक हिस्सा बरिसों तक विदेशी शक्ति के सामने वैचारिक समर्पण करत रहा। चीन कय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता करय वाली राजनीति आज संघ से राष्ट्रभक्ति कय सबूत मांगत है। इ विडंबना नाहीं तौ अउर का अहै?
भारतीय संविधान कय अनुच्छेद 19 नागरिकन कय संगठन बनाय कय आजादी देत है। इ नागरिकन कय मौलिक अधिकार अहै। संविधान कतहुँ नाहीं कहत कि हर सामाजिक संगठन कय पहिले सरकार के सामने सिर झुकाके अनुमति लेय कय पड़ी। सोसाइटी कानून, न्यास कानून अउर अन्य व्यवस्था खाली कानूनी सुविधा के लिए अहै, अस्तित्व के लिए नाहीं। संघ कय पंजीकरण प्रमाणपत्र देखय कय चाह राखय वाले प्रियांक खरगे, पवन खेड़ा अउर कांग्रेस कय नेता लोगन कय इ समझना होइ कि लोकतंत्र में मंत्री होय कय मतलब कानून से ऊपर होय नाहीं होवत है। कउनो मंत्री कय व्यक्तिगत इच्छा कानून नाहीं बन जात है। अगर कानून में अनिवार्यता नाहीं है, तौ खाली राजनीतिक नफरत के कारण कउनो संगठन कय कटघरे में खड़ा नाहीं कीन्ह जा सकत। इहे विधि कय शासन अहै, इहे संविधान कय आत्मा अहै।
संघ कय समझय के लिए ओकर मूल प्रकृति कय समझना जरूरी अहै। संघ कउनो पारंपरिक कार्यालयी संस्था नाहीं, बल्कि समाज आधारित आंदोलन अहै। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ओका सदस्यता कार्ड, शुल्क अउर कागजी ढांचा के बजाय शाखा, संस्कार अउर स्वयंसेवा कय आधार पर खड़ा कीन्ह। आज भी कउनो आदमी शाखा में जाके स्वयंसेवक बन सकत है। इहे कारण अहै कि संघ समाज कय बीच रहत है, कउनो फाइल में बंद नाहीं रहत।
इतिहास इ भी बतावत है कि संघ कय बार-बार राजनीतिक दमन कय सामना करय पड़ा। महात्मा गांधी कय हत्या कय बाद प्रतिबंध लगावा गवा, आपातकाल में हजारन स्वयंसेवक जेल भेजे गए, बाबरी कांड कय बाद भी हमला भवा। मगर हर बार संघ अउर मजबूती से निकलिस। ओकर कारण इ रहा कि संघ कय जड़ सत्ता में नाहीं, समाज में अहै। मोहन भागवत भी याद दिलायेन कि सरकारें संघ पर प्रतिबंध लगावत रहीं, ओकर मतलब इहे है कि सरकारें संघ कय अस्तित्व अउर प्रभाव कय मानत रही अहैं।
देखा जाय तौ संघ विरोधी बार-बार पारदर्शिता अउर टैक्स कय मुद्दा उठावत अहैं। मगर ऊ जानबूझके अदालत कय फैसला कय नजरअंदाज करत अहैं। “गुरु दक्षिणा” कय लइके अदालत पारस्परिकता कय सिद्धांत कय मान लिहे रहा। पटना हाईकोर्ट साफ मानिस कि स्वयंसेवकों कय स्वैच्छिक योगदान करयोग्य आय नाहीं मानि जा सकत। संघ कबहूँ कानून से छूट नाहीं मांगिस। ऊ खाली ओतना मानिस जवन कानून कहत है। कानून जहां लागू होवत है, वहां संघ कय सहयोगी संगठन विधिवत पंजीकृत अहैं, ऑडिट करावत अहैं अउर अपना रिपोर्ट भी प्रकाशित करत अहैं।
इहे ओ बिंदु अहै जहां कांग्रेस कय पाखंड खुलकर सामने आवत है। दशकन तक सत्ता में रहय वाली पार्टी आज संघ से पारदर्शिता मांगत है, जबकि खुद ओकर इतिहास पर आपातकाल, भ्रष्टाचार, परिवारवाद अउर विदेशी प्रभाव कय आरोप लाग अहैं। जवन दल लोकतंत्र कय कुचलें के लिए आपातकाल थोप सकत है, ऊ आज लोकतांत्रिक मूल्य कय उपदेश देत है। इ राजनीतिक मजाक से ज्यादा कुछ नाहीं।
मोहन भागवत बिल्कुल सही कहेन कि संघ खुलकर काम करत है, कउनो गुप्त संगठन कय तरह नाहीं। लाखन शाखाएं, हजारन सेवा प्रकल्प, शिक्षा, ग्राम विकास, आपदा राहत, सामाजिक समरसता, वनवासी कल्याण, गौ सेवा, पर्यावरण संरक्षण, संघ कय हर काम समाज के सामने अहै। अगर संघ में कुछ छिपा होत तौ ऊ सौ बरिस तक सार्वजनिक जीवन में इतने व्यापक रूप से स्वीकार नाहीं कीन्ह जात।
असल में संघ कय सबसे बड़ी शक्ति इहे अहै कि ऊ राष्ट्रवाद कय खाली नारा तक सीमित नाहीं रखिस। जब भी देश पर संकट आया, स्वयंसेवक सबसे पहिले खड़ा देखाये गए। विभाजन कय समय राहत काम होय, प्राकृतिक आपदा होय, महामारी कय दौर होय या सीमा पर सैनिकन कय परिवार कय सहायता, संघ कय कार्यकर्ता हर जगह सक्रिय रहेन। इहे कारण अहै कि भारत कय सामान्य नागरिक संघ कय कागजी संस्था नाहीं, राष्ट्रीय चेतना कय प्रहरी मानत है।
जो सौ बरिसन से राष्ट्र कय सब कुछ दइत अहै, ओका अपना परिचय देय कय जरूरत नाहीं परत। राष्ट्र खुद ओकर परिचय बन जात है। साथ ही संघ कय कउनो वंशवादी राजनीति से चरित्र प्रमाणपत्र लेय कय जरूरत नाहीं अहै। राजनीतिक दल सत्ता से बनत अउर मिट जात अहैं, लेकिन संघ जैसी राष्ट्रशक्ति पीढ़ियन तक समाज कय चेतना में जीवित रहत है। संघ कय मिटावे कय सपना देखय वाले आवत-जात रहेन, लेकिन संघ आज भी उतना ही दृढ़ अउर राष्ट्रनिष्ठ खड़ा अहै, काहें से कि ओकर आधार सत्ता नाहीं, भारत कय सनातन आत्मा अहै।
बहरहाल, जिस संगठन कय स्वयंसेवक रोज इहे मंत्र जपत हों, “तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें ना रहें”, ओसे अपना पंजीकरण करावैक कहब कांग्रेस नेता लोगन कय राजनीतिक हताशा ही नाहीं, बल्कि ओकर बेवकूफी भी देखात है।