संपादकीय

जी-7 शिखर सम्मेलन मां अमेरिका अलग-थलग, दुनिया जतात अहै मोदी पर भरोसा

जी-7 शिखर सम्मेलन इ बेर वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा अउर व्यापार कै मंच नाहीं, बलुक बदलत विश्व व्यवस्था कै आईना लागत रहा। फ्रांस मां आयोजित इ सम्मेलन मां जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहुँचिन, तौ ओकर सामने उ यूरोप खड़ा रहा जौन अब आँख मूँदकै वॉशिंगटन कै पीछे चलेक तैयार नाहीं दिखात अहै। लम्बे समय तक टैरिफ कै धमकी, कूटनीतिक दबाव, सार्वजनिक अपमान अउर अचानक फैसला के सामना करेक बाद अब यूरोपीय देशन मान लीन हय कि ट्रंप बदलत अमेरिकी सोच कै स्थायी चेहरा अहैं। यही कारण अहै कि इ बेर जी-7 सम्मेलन पर सबसे गहरी छाया अमेरिका अउर यूरोप के बीच बढ़त दूरी कै रही। देखैं तौ ईरान युद्ध के बाद पैदा भई वैश्विक बेचैनी इ सम्मेलन का अउर संवेदनशील बनाइ दिहिन हय। युद्धविराम कै घोषणा के बावजूद तेल बाजारन मां अस्थिरता बनी अहै, महंगाई के लेके चिंता बढ़त अहै अउर दुनिया कै अर्थव्यवस्था फिर अनिश्चितता के मोड़ पर पहुँचत देखात अहै।

ट्रंप इ सम्मेलन मां इ साबित करेक पहुँचिन कि उनकर आक्रामक अउर टकराव वाली विदेश नीति परिणाम देत अहै। उ चाहत अहैं कि दुनिया अमेरिकी प्राथमिकता का स्वीकार करै, चाहे मामला व्यापार कै होय, कृत्रिम बुद्धिमत्ता कै, सुरक्षा कै या फिर चीन का घेरेक रणनीति कै। लेकिन इ बेर यूरोप कै सुर बदल गवा अहै। उ अमेरिका के साथ तौ रहेक चाहत अहै, मगर ओकर हर बात पर सिर झुकाएक तैयार नाहीं अहै।

देखा जाय तौ यूरोप के भीतर इ बदलाव अचानक नाहीं आवा। फ्रांस कै राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों बरसन से यूरोप कै रणनीतिक स्वायत्तता कै वकालत करत रहे अहैं। उनकर तर्क साफ अहै कि यूरोप का अपनी सुरक्षा अउर अपने हितन कै रक्षा खातिर हमेशा अमेरिका पर निर्भर नाहीं रहेक चाही। इ बेर सम्मेलन कै मेजबानी करत मैक्रों साफ सब्दन मां कहि दिहिन हय कि इ अइसन समय अहै जब अमेरिकी, रूसी अउर चीनी नेतृत्व यूरोप के हितन के खिलाफ खड़ा देखात अहै। इहिकै नाते यूरोप का अब जागैक पड़ी अउर अपने हितन कै रक्षा खुद करैक पड़ी। हालाँकि मैक्रों कै रणनीति खाली विरोध कै नाहीं अहै। उ ट्रंप के साथ निजी सम्बन्ध बनाए राखे कै भरपूर कोशिश कइहीं अहैं। कबहूँ एफिल टावर पर भोज, कबहूँ सैन्य परेड मां विशेष सम्मान अउर कबहूँ नोट्रे डेम कैथेड्रल के पुनरोद्धार समारोह मां आमंत्रण देइके उ ट्रंप का साधैक कोशिश कइहीं अहैं। लेकिन ईरान युद्ध अउर ग्रीनलैंड विवाद के बाद यूरोप मां ट्रंप विरोध चरम पर पहुँच गवा।

दुनिया अब केवल अमेरिकी नेतृत्व पर निर्भर नाहीं, मोदी अहैं भरोसेमन्द

एक समय तौ हालत अइसन बनि गई रही कि यूरोपीय नेतान का लाग कि ट्रंप डेनमार्क के अधीन ग्रीनलैंड पर कब्जे खातिर अमेरिकी सेना भेज सकत अहैं। इ खाली एक भू-राजनीतिक विवाद नाहीं रहा, बलुक उ भरोसा के टूटेक प्रतीक रहा जौन दशकों से अटलांटिक गठबंधन टिका रहा। दरअसल, ग्रीनलैंड प्रकरण यूरोप का इ सोचैक मजबूर कइ दिहिन कि कहीं नाटो कै सबसे बड़ सैन्य ताकत ही ओकर खातिर सबसे बड़ खतरा न बनि जाय। यही कारण अहै कि अब यूरोपीय देशन मां इ बहस तेज होइ गई अहै कि अगर अमेरिका हर वैश्विक संकट मां नेतृत्व नाहीं करत या करेक नाहीं चाहत, तौ आगे कै दुनिया कइसन होई। इ चिंता नाटो अउर अटलांटिक गठबंधन कै नींव तक का हिलाइ दिहिन हय।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर भी इ बेर दबाव मां देखिन। घरेलू राजनीति मां चुनौती झेलत स्टारमर का ईरान पर अमेरिकी हमलन कै समर्थन न करेक कारण ट्रंप कै नाराजगी झेलैक पड़ी। ट्रंप सार्वजनिक रूप से ब्रिटेन कै मजाक उड़ाइन अउर ओका असहयोगी तक कहि दिहिन। नतीजा इ भवा कि ब्रेक्जिट के बाद अमेरिका के अउर करीब जाएक कोशिश करत ब्रिटेन अब फिर यूरोप की ओर झुकत देखात अहै। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, जौन कभी ट्रंप कै स्वाभाविक सहयोगी मानि जात रहिन, उ भी अब दूरी बनावत नजर आवत अहैं।

वैश्विक संकट के बीच मोदी कै कूटनीति कै दम

जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची इ सम्मेलन मां पहली बेर शामिल भईन अउर उ अमेरिका, यूरोप तथा पश्चिम एशिया के बीच संवाद कै कड़ी बनेक कोशिश कइहीं। साफ अहै कि दुनिया अब केवल अमेरिकी नेतृत्व पर निर्भर रहेक बजाय बहुध्रुवीय संतुलन की तरफ बढ़त अहै। देखैं तौ ट्रंप कै सबसे बड़ चुनौती इ भी अहै कि उ निजी कूटनीति का सार्वजनिक तमाशा मां बदल देत अहैं। पिछले बरिस नाटो प्रमुख मार्क रुटे के निजी सन्देश सार्वजनिक कइके उ इ देखाइ दिहिन कि यूरोपीय नेता निजी तौर पर अमेरिका के दबाव का स्वीकार करत अहैं, भले ही सार्वजनिक मंचन पर विरोध करैं।

इहिकै बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कै मौजूदगी इ सम्मेलन मां विशेष महत्व राखत अहै। जब पश्चिमी दुनिया भीतर से विभाजित देखात अहै, तब भारत एक अइसन संतुलित अउर भरोसेमन्द साझेदार के रूप मां उभर के आवा हय जौन पर हर शक्ति केंद्र भरोसा करेक चाहत अहै। मोदी रूस अउर अमेरिका दूनों से सम्बन्ध बनाए राखिन, पश्चिम एशिया के संकट मा संतुलन साधिन अउर ग्लोबल साउथ कै आवाज का मजबूती से उठाइन। यही वजह अहै कि आज दुनिया भारत का खाली एक बाजार नाहीं, बलुक स्थिर नेतृत्व वाली निर्णायक शक्ति के रूप मां देखत अहै। मोदी कै कूटनीति कै सबसे बड़ ताकत इ अहै कि उ भारत का कउनो एक खेमे मां सीमित नाहीं होएक दिहिन। जी-7 जइसन मंचन पर मोदी कै उपस्थिति इ बात कै संकेत अहै कि बदलत विश्व व्यवस्था मां भारत केंद्र मां आ चुका हय। जब दुनिया अविश्वास अउर टकराव से जूझत अहै, तब भारत संवाद, संतुलन अउर स्थिरता कै चेहरा बनि के उभरल हय।

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