
पच्छिम बंगाल की राजनीति इस समय आपन सबसे उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रही अहै। कबहूं बंगाल की निर्विवाद ताकत मानी जाय वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अब अंदरूनी बगावत, सांसद अउर विधायक के पलायन तथा राजनीतिक अस्तित्व के संकट से जूझती देखात अहै।
दिल्ली में सोनिया गांधी के साथ ममता बनर्जी अउर राहुल गांधी के साथ अभिषेक बनर्जी की बैठकन ने इस संकट का अउर जियादा राजनीतिक रंग देइ दीहिन हय। भले ही कांग्रेस अउर तृणमूल दुनौ सार्वजनिक रूप से कउनो विलय की संभावना से इंकार करत होइहें, लेकिन घटनाक्रम यह संकेत देत अहै कि बंगाल की राजनीति में एक बड़ पुनर्संयोजन शुरू होइ गवा अहै। एक तरह से यह साफ नजर आवत अहै कि सिर्फ टीएमसी के सांसद, विधायक अउर पार्षद ही पाला नाहीं बदलत हयन, खुद टीएमसी प्रमुख आपन पार्टी का खतम कइके कांग्रेस में वापस लौटना चाहत अहीं।
हम आपन का बताइ दीं कि दिल्ली में राहुल गांधी अउर अभिषेक बनर्जी की डेढ़ घंटा लंबी मुलाकात अउर उससे पहिले सोनिया गांधी अउर ममता बनर्जी की बैठक ने राजनीतिक गलियारा में हलचल पैदा कइ दीहिन हय। तृणमूल कांग्रेस ने इन बैठकन का लोकतंत्र अउर संविधान बचावे की साझा प्रतिबद्धता बताइन, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकन का मानब अहै कि यह महज औपचारिक बातचीत नाहीं रही। बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह तृणमूल कांग्रेस कमजोर भई अहै अउर पार्टी के भीतर टूट की स्थिति बनि रही अहै, उसके बाद कांग्रेस से नजदीकी बनाब ममता बनर्जी की राजनीतिक मजबूरी बनि गै अहै।
स्थिति यह अहै कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर विद्रोह अब खुली चुनौती का रूप लइ चुका अहै। पार्टी के 80 में से 58 विधायक अलग होइके निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के साथ चलि गय हयन। इस गुट का विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता भी मिल चुकी अहै। रितब्रत बनर्जी लगातार दावा करत हयन कि वही “असली तृणमूल कांग्रेस” अहीं अउर कांग्रेस के साथ कउनो भी प्रकार के विलय या समझौता के खिलाफ हयन।
राजनीतिक जानकारन का मानब अहै कि कांग्रेस के साथ संभावित विलय या अत्यधिक नजदीकी की अटकलन ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर असुरक्षा अउर बेचैनी का अउर बढ़ा दीहिन हय। पार्टी के कई विधायक, सांसद अउर क्षेत्रीय नेता आपन पूरी राजनीतिक पहचान कांग्रेस विरोध की जमीन पर बनाइके आगे बढ़ रहे रहे। ऐसे में उनका यह डर सतावत अहै कि यदि ममता बनर्जी अंततः कांग्रेस के साथ विलय या व्यापक राजनीतिक समझौता की राह पर चलत हहीं, तौ उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान खतम होइ जाइ।
संकट सिर्फ विधानसभा तक सीमित नाहीं अहै। संसद में भी तृणमूल कांग्रेस की नींव हिलत देखात अहै। राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफा ने पार्टी की मुश्किलें अउर बढ़ा दीहिन हयन। उनसे पहिले सुष्मिता देव अउर सुखेंदु शेखर राय भी पार्टी अउर राज्यसभा से इस्तीफा देइ चुके हयन।
इन घटनान के बीच कांग्रेस की भूमिका बेहद दिलचस्प होइ गै अहै। बंगाल कांग्रेस के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आइ गय हयन। अधीर रंजन चौधरी अउर अब्दुल मन्नान जैसे वरिष्ठ नेता ममता बनर्जी के साथ कउनो भी तरह की नजदीकी के खिलाफ खुलकर बोलत अहीं।
हम आपन का याद दिवाई देईं कि ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक उदय ही कांग्रेस के खिलाफ विद्रोह की जमीन पर खड़ा रहा। साल 1998 में उन्होंने जोर-शोर से कांग्रेस से अलग होइके तृणमूल कांग्रेस का गठन कीन रहा। लेकिन अब जब तृणमूल कांग्रेस भीतर से टूट रही अहै, सांसद अउर विधायक पार्टी छोड़ रहे हयन, तब वही ममता बनर्जी एक बार फेर कांग्रेस की जड़न की ओर लौटत नजर आवत अहीं।
सच तो यह अहै कि बंगाल की राजनीति अब सिर्फ सत्ता की लड़ाई नाहीं रहि गै अहै, बल्कि यह अस्तित्व की जंग बनि चुकी अहै। फिलहाल इतना तय अहै कि बंगाल की राजनीति में शुरू भई यह हलचल सिर्फ राज्य तक सीमित नाहीं रहिहै, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष की राजनीति पर भी इसका गहरा असर पड़िहै। -नीरज कुमार दुबे
