संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “विदेशी मुद्रा बचवै” के आह्वान के राजनीतिक-आर्थिक मतलब

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर आपदा क अवसर मा बदलब जानत हैं। पहिले कृत्रिम वैश्विक महामारी कोरोना (कोविड-19), फिर रूस-यूक्रेन जुद्ध अउर अब अमेरिका/इजरायल-ईरान जुद्ध के दौरान भी ऊ कुछ अइसने कइ न। फिलवक्त मौजूदा वैश्विक संकट से भारत क बचावै अउर एकर असर झेलत आम भारतीय मनई के हित क रक्षा करै खातिर ही ऊ विदेशी मुद्रा बचवै, आयातित सामान क इस्तेमाल मितव्ययिता से करै अउर एकर देशी विकल्प खोजत स्थायी हल निकालै अउर ओकर निर्भर रहै के दिशा मा जनसहयोग क आह्वान कइके सब क अचरज मा डाल दिहन। अइसन मानल जात है कि अमेरिका, चीन, यूरोप अउर अरब के कुछ देसन के द्वारा लगातार भारत विरोधी षड्यंत्र कयल जात है। कउनो अपना इस्लामिक एजेंडा भारत पर थोपै चाहत है त कउनो भारत-रूस के भरोसेमंद रिश्ता मा आग लगावै चाहत है अउर कउनो भारत क पाकिस्तान, बांग्लादेश अउर चीन के त्रिपक्षीय जाल मा फंसाइके अपना आर्थिक फायदा साधै चाहत है। जबकि, तेजी से आर्थिक अउर सैन्य उन्नति करत 21वीं सदी के भारत अब रूस-ईरान-इजरायल के सहयोग से मध्य एशिया, पश्चिम एशिया अउर यूरोप के बाजारन तक पहुँच बढ़ावै के दिशा मा आगे बढ़त है।

भारत-यूरोप के बढ़ती नजदीकी अउर ओका निकट भविष्य मा अउर मजबूती दै वाली बिभिन्न महत्वाकांक्षी योजनान क लागू करै से चिढ़ल अमेरिकी डीप स्टेट अउर उनके चीनी-अरबी पिट्ठू पहिले ईरान क बर्बाद करै अउर फिर इंडिया क ओकर तपिश मा झुलसावै के जउन जाल बुनें हैं, अब भारत ओकर भी काट खोज लिहिस है। इ बेर भारत ‘लोकल फ़ॉर वोकल’ अउर चीनी सामानन के बहिष्कार करै के जगह विदेशी मुद्रा बचवै खातिर बिभिन्न सकारात्मक पहल करै के आह्वान कइ न। प्रधानमंत्री मोदी कहिन कि मौजूदा सरकार अपनी त्रासदी से निबटै खातिर आप लोगों से कउनो सोना नाहीं मांगत है, बल्कि अगिला एक साल तक एकर खरीद कम करै के बात कहत है ताकि विदेशी मुद्रा बचै। इसी कड़ी मा ऊ उन तमाम वस्तुअन क जिक्र बारी-बारी से कइ न अउर कहिन कि इनपर विदेशी मुद्रा जियादा खर्च होत है, इहे खातिर अगिला 1 साल तक एकर संयमित इस्तेमाल करीं। दूसरों क भी इ खातिर प्रेरित करीं। साफ है कि इ सिर्फ “देशभक्ति” वाला संदेश नाहीं होत; बल्कि इ आर्थिक संकेत भी होत है कि सरकार क वैश्विक अनिश्चितता, मँहगा आयात, या डॉलर पर दबाव के चिंता है। अइसन इहे खातिर कि जब विदेशी मुद्रा पर दबाव होत है, तब देश कोसिस करत है कि रुपया पर जियादा दबाव न पड़ै, जरूरी आयात (तेल, दवा, रक्षा) जारी रह सकै, मँहगाई नियंत्रित रहै, विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहै।

इ ध्यान दै वाली बात है कि भारत के विदेशी मुद्रा कई बड़हन क्षेत्रन मा खर्च होत है, लेकिन सबसे जियादा खर्च आयात पर होत है। अगर “सबसे जियादा” की बात करीं, त आमतौर पर क्रम कुछ अइसन रहत है: 1. कच्चा तेल → 2. इलेक्ट्रॉनिक्स/मशीनरी → 3. सोना → 4. रसायन/उर्वरक → 5. रक्षा खरीद। हाल के बरिसन मा भारत के सबसे बड़हन विदेशी मुद्रा खर्च कच्चा तेल के आयात पर ही रहल है। उनके हाल के बयान की बात करीं त मौजूदा वैश्विक संकट (जैसे जुद्ध, तेल के दाम, सप्लाई-चेन दबाव) के बीच प्रधानमंत्री जब विदेशी मुद्रा (Forex) बचवै के बात कहिन, त एकर मतलब आमतौर पर इ होत है कि भारत डॉलर मा होवइ वाला खर्च क कम करै अउर कमाई बढ़ावै। इ ध्यान दैक लायक है कि अइसन आह्वानन के मुख्य बिंदु आमतौर पर इ होत हैं: आयात कम करै/ आत्मनिर्भरता बढ़ावै—खासकर तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, खाद्य तेल जइसन चीजिन मा विदेश पर निर्भरता घटावै। “लोकल खरीदै” अउर घरेलू उत्पादन बढ़ावै के बात इहे से जुड़त है।

इहे खातिर प्रधानमंत्री द्वारा “विदेशी मुद्रा बचवै” के बात के राजनीतिक-आर्थिक मतलब संदर्भ पर निर्भर करत है, लेकिन आमतौर पर एकर कई स्तर होत हैं। एकर मतलब का है? इसे अइसन समझीं।

पहिला, आर्थिक मायने: आयात बिल कम करै के संकेत। चूँकि भारत के बड़हन विदेशी मुद्रा खर्च तेल, सोना अउर इलेक्ट्रॉनिक्स आयात पर होत है। इहे खातिर जब सरकार विदेशी मुद्रा बचवै के बात करत है, त अक्सर मतलब होत है: घरेलू उत्पादन बढ़ाओ (“मेक इन इंडिया” जइसन नीति), आयातित वस्तुअन पर निर्भरता घटाओ, ऊर्जा बचत या वैकल्पिक ऊर्जा क बढ़ावा दओ अउर रुपया अउर व्यापार घाटा पर दबाव कम करो। काहेकि अगर बहुत जियादा डॉलर बाहर जात है त रुपया पर दबाव पड़ सकत है अउर व्यापार घाटा बढ़ सकत है। इहे खातिर विदेशी मुद्रा बचवै के संदेश बाजार क इ संकेत भी देत है कि सरकार बाहरी आर्थिक जोखिमन क लेके सतर्क है। चूँकि ऊर्जा सुरक्षा क मुद्दा अहम है इहे खातिर तेल आयात मँहगा होवइ पर सरकार कबो-कबो ईंधन बचत, एथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक वाहन, या घरेलू उत्पादन पर जोर देत है ताकि डॉलर खर्च कम होवै। साथ ही, विदेशी मुद्रा भंडार क मजबूत राखै से आयात भुगतान, संकट प्रबंधन अउर निवेशकन के भरोसा बनाय राखै मा मदद मिलत है।

दूसरा, राजनीतिक मायने: आत्मनिर्भरता के राजनीतिक कहानी जइसन संदेश अक्सर “देशी बनाम विदेशी निर्भरता” या आत्मनिर्भरता के नैरेटिव से जुड़त है—यानी आर्थिक राष्ट्रवाद के तत्व। साथ ही जनता से व्यवहार परिवर्तन के अपील के पीछे कबो-कबो सरकार जनता से कुछ आदतें बदलै (जैसे ऊर्जा बचत, आयातित वस्तुअन क कम इस्तेमाल) के नैतिक अपील करत है, ताकि नीति क सामाजिक समर्थन मिलै। इ कठिन आर्थिक समय के संकेत भी होत है। साफ है कि यदि बयान अइसन समय आवै जब तेल मँहगा हो, डॉलर मजबूत हो, या वैश्विक संकट हो, त इ आर्थिक सावधानी के संकेत भी मानल जा सकत है—हालाँकि जरूरी नाहीं कि संकट ही हो। जहाँ तक नीतिगत फैसला लेवै के पृष्ठभूमि तैयार करै के बात है त अइसन बयान आगे चलके कुछ कदम (आयात शुल्क, उत्पादन प्रोत्साहन, ऊर्जा नीति, निर्यात बढ़ावा) खातिर राजनीतिक आधार भी बना सकत हैं।

यहाँ पर हमलोग समझत हैं कि किन-किन चीजिन पर विदेशी मुद्रा जियादा खर्च होत है:

पहिला, कच्चा तेल अउर पेट्रोलियम आयात: भारत अपनी जरूरत के बड़हन हिस्सा तेल विदेशन से खरीदत है। इहे खातिर विदेशी मुद्रा के सबसे बड़हन खर्च तेल, गैस अउर पेट्रोलियम उत्पादनन पर होत है। उदाहरण: ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) जइसन घरेलू कंपनी उत्पादन करत हैं, फिर भी आयात बहुत जियादा है।

दूसरा, सोना आयात: भारत दुनिया के सबसे बड़हन सोना उपभोक्तान मा है। ज्वेलरी अउर निवेश खातिर भारी मात्रा मा सोना आयात कयल जात है, जवन डॉलर मा भुगतान करै क पड़त है।

तीसरा, इलेक्ट्रॉनिक्स अउर मशीनरी: मोबाइल फोन के पार्ट्स, सेमीकंडक्टर, कंप्यूटर उपकरण, औद्योगिक मशीनन आदि विदेशन से आवत हैं। जैसे एप्पल इंक. या अन्य ब्रांडन के कंपोनेंट्स के आयात।

चौथा, रक्षा उपकरण: लड़ाकू विमान, हथियार, रक्षा तकनीक अउर सैन्य उपकरणन के खरीद पर भी विदेशी मुद्रा खर्च होत है। उदाहरण: राफेल जइसन विमान खरीद।

पांचवां, रसायन, उर्वरक अउर दवई के कच्चा माल: खेती खातिर उर्वरक अउर दवई उद्योग खातिर कई सक्रिय रसायन विदेशन से मंगावल जात हैं।

छठा, विदेश यात्रा अउर शिक्षा: भारतीय जब विदेश मा पढ़ाई, इलाज, पर्यटन या बिज़नेस खातिर खर्च करत हैं, तब भी विदेशी मुद्रा बाहर जात है।

सातवां, विदेशी कंपनीन क भुगतान: टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर लाइसेंस, रॉयल्टी, निवेशकन क मुनाफा आदि के रूप मा भी डॉलर/विदेशी मुद्रा जात है।

आठवां, ऊर्जा बचत: तेल आयात भारत के बड़हन विदेशी मुद्रा खर्च है। पेट्रोल-डीजल के खपत कम करै, गैस/बिजली के बचत, वैकल्पिक ऊर्जा अपनावै—इकर सीधा असर डॉलर बचत पर पड़त है। वैश्विक संघर्षन से तेल आपूर्ति प्रभावित होवइ के चिंता सरकार भी जतइ है।

नौवां, स्थानीय उत्पादनन क बढ़ावा: विदेशी सामान के जगह भारतीय सामान खरीदै से डॉलर बाहर कम जात है। “वोकल फॉर लोकल” के आर्थिक मतलब इहे है।

दसवां, निर्यात अउर निवेश बढ़ावै: विदेश से डॉलर कमावै खातिर निर्यात, सेवाअन, अउर विदेशी निवेश आकर्षित करै पर जोर।

— कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार अउर राजनीतिक विश्लेषक

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