
अमेरिका अउर ईरान के बीच हाल मां जउन समझौता-ढांचा (Framework Agreement) सामने आवा अहै, अगर ओका पूरा कर लीन गवा, तव एकर असर सिर्फ दूनों देसन तक सीमित नाहीं रही, बल्किन पूरा पश्चिम एशिया, दुनिया कय ऊर्जा बाजार अउर विश्व राजनीति पय होई। समझौता मां जुद्ध-बिराम, परमाणु कार्यक्रम पय रोक, तेल पय पाबंदी मां ढील, ईरान कय फंसी संपत्ति कय वापसी अउर होर्मुज जलडमरूमध्य कय खोले जइसे मुद्दा शामिल अहैं। अगर ई समझौता ठीक से लागू भवा, तव ई इक्कीसवीं सदी कय सबसे बड़हन भू-राजनीतिक घटना मानि जाई। चला, एकर वैश्विक मायने का क्रम से समझीं:-
पहिला, दुनिया कय ऊर्जा बाजार का मिली बड़हन राहत: होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया कय तेल अउर एलएनजी (LNG) व्यापार कय बहुत जरूरी रास्ता अहै। ई रास्ता पय ईरान आपन मजबूती से कब्जा बनाय अहै। एहसे, एकर खुलिस अउर तनाव घटिस तव कच्चा तेल कय सप्लाई ठीक होइ जई, जवने से तेल कय दाम पय दबाव कम होई। समझौता कय खबर आवत ही दुनिया कय बाजारन मां तेल कय दाम गिरे अउर शेयर बाजार तेज भवा।
दूसर, पश्चिम एशिया मां घटि जुद्ध कय खतरा: अगर अमेरिका-ईरान कय टकराव कम भवा, तव लेबनान, इराक, सीरिया अउर खाड़ी कय इलाका मां भी तनाव घटे कय संभावना बढ़ि जई। समझौता कय तहत क्षेत्रीय झगड़न का शांत करे कय बात भी भई अहै। एकसे भारत का फायदा ई होई कि यूरोप, अरब देसन, मध्य एशिया अउर रूस के साथ जउन व्यापारिक कॉरिडोर बनत अहै, ओकर काम तेज होइ जई।
तीसर, परमाणु प्रसार पय रोक: ईरान द्वारा परमाणु हथियार न बनावे, यूरेनियम संवर्धन (enrichment) का सीमित करे अउर परमाणु गतिविधि पय रोक लगावे पय सहमति दुनिया कय खातिर बड़हन उपलब्धि अहै। एकसे मध्य पूर्व मां परमाणु हथियार कय दौड़ कुछ कम होइ सकत अहै। साथ ही, पाकिस्तान पय भी परमाणु हथियार हटावे कय दबाव बढ़ि जई।
चौथा, चीन अउर रूस कय रणनीति पय असर: पिछला कय बरिसन मां ईरान, चीन अउर रूस के बीच नजदीकी बढ़ि गई रही। एकसे भारत कय चिंता बढ़ि रही रही, काहे से ईरान-पाकिस्तान-अफगानिस्तान कय आतंकवादी कॉरिडोर का रोके मां अमेरिका-चीन कय चाल बाधक बनत रही। रूस भी मजबूरी मां ईरान का साथ देइ रहा। अइसे मां अगर अमेरिका-ईरान कय संबंध सुधरत अहै, तव तेहरान का पश्चिमी निवेश अउर बाजार मिल सकत अहै, जवने से चीन, रूस अउर पाकिस्तान पय ओकर निर्भरता कुछ कम होइ जई। ई दुनिया कय शक्ति-संतुलन मां बड़हन बदलाव होई।
पांचवां, भारत कय खातिर का मायने?: भारत कय खातिर ई समझौता कई कारन से बढ़िया होइ सकत अहै:- तेल आयात अउर अउर सामान सस्ता होइ सकत अहै। खाड़ी इलाका मां रहय वाले भारतीय अउर सुरक्षित होइ जइहैं। चाबहार बंदरगाह अउर भारत-ईरान व्यापार का नई गति मिल सकत अहै। पश्चिम एशिया मां स्थिरता भारत कय ऊर्जा सुरक्षा का मजबूत करी। इहवां चीनी दखल कम भे से भारत पश्चिमी मोर्चे पय मजबूत होइ जई।
छठा, लेकिन चुनौती अभी बाकी अहै: काहे से समझौता पय अभी पूरा सहमति नाहीं भवा अहै, काहे से चीन-रूस मन से ई नाहीं चाहत। एहसे, ईरान कय कट्टरपंथी गुट एकर विरोध करत अहैं अउर इजराइल-हिज्बुल्लाह मोर्चे पय तनाव अभी भी बा। चूंकि कट्टरपंथियन बलिदान देइके ईरान का बहुत मजबूत बनाय अहैं, एहसे उनकर खिलाफ कउनो ईरानी सरकार नाहीं जाइ सकत। इहे कारन अहै कि कई रिपोर्ट मां कहल गवा अहै कि आखिरी दस्तखत अउर अमल अभी अनिश्चित अहै।
निष्कर्ष: ई कहल जाइ सकत अहै कि अगर ई समझौता ठीक से लागू भवा, तव ई इक्कीसवीं सदी कय सबसे बड़हन भू-राजनीतिक घटना मानी जाई। एकसे तेल बाजार स्थिर होई, परमाणु संकट टलि जई, पश्चिम एशिया मां शांति कय संभावना बढ़ि जई अउर भारत समेत कइयौ देसन का आर्थिक फायदा मिली। लेकिन एकर स्थिरता एह पय टिकी अहै कि अमेरिका, ईरान, इजराइल अउर क्षेत्रीय ताकतन आपन वादा कय कतना मानत अहैं। हमार मानब अहै कि ई समझौता जेतना जल्दी होइ जाई, भारतीय हित ओतने जल्दी सधैं शुरू होइ जइहैं। – कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार अउर राजनीतिक विश्लेषक