भारतीय राजनीति के आजु के दौर मा एक अइसा बहस लगातार सोझुआय रही अहै, जे राजनीतिक बात-चीत कय विकास, पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य, रोजगार अउर सामाजिक नियाव जइसे बुनियादी सवालन से हटाय कय धरम कय पहिचान अउर आस्था के इर्द-गिर्द खड़ा कइ दिहिस अहै। ई बहस अहै – सनातन कय समर्थन बनाम सनातन कय विरोध। आजु देस मा एक कइती सनातन संस्कृति कय भारतीय जीवन कय सदा-सर्वदा कय आधार मानय वाली ताकतें हँइ, तउ दूसरी कइती कुछु अइसे राजनीतिक बयान अउर रवैया देखात हँइ जेका आम मनई सनातन विरोध के रूप मा देखत अहै।
सवाल ई नाही अहै कि कउनो विचारधारा से सहमति या असहमति काहे अहै, बल्कि सवाल ई अहै कि का राजनीति कय केंद्र धरम होय क चाही या आम जिन्दगी कय असली मुद्दा? भारत कय लोकतंत्र धरम-निरपेछ संविघान पर टिका अहै, जहाँ सरकार कय काम कउनो धरम कय पच्छ या विरोध करब नाही, बल्कि सब नागरिकन के अधिकारन कय रच्छा करब अहै। राजनीतिक दलन कय जिम्मेदारी भी यही होय क चाही कि ओ सबइ जनता कय समस्यान, विकास अउर देस कय एकता कय पहिली जगह देवें। मुदा पाछिल कुछु बरिसन मा धरम कय बहस राजनीति कय बहुते बड़ा केंद्र बनि गवा अहै।
सनातन खाली एक धरम कय सबद नाही अहै, बल्कि ई भारतीय सभ्यता कय सांस्कृतिक चेतना, जीवन-दर्शन अउर मूल परम्परा कय निशानी अहै। “सत्यं वद, धर्मं चर”, “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जइसे सूत्र इहै सनातन नजरिया के अंग हँइ। इही बरे जब कउनो राजनीतिक बयान सनातन कय लय कय अपमानजनक या आक्रामक भासा कय इस्तेमाल करत अहै, तउ ओकर असर खाली धरम पर नाही, बल्कि सांस्कृतिक अउर भावना कय स्तर पर भी पड़त अहै। तमिलनाडु मा द्रमुक नेता उदयनिधि स्टालिन कय सनातन धरम कय तुलना बेमारी से करय वाला बयान इहै कारन बहुत बड़े विवाद कय वजह बना रहा। विपेच्छ कय बहुते दल ओसे दूरी बनावै कय कोसिस कीहिन, काहे कि ई साफ रहा कि भारत जइसे देस मा करोड़न मनइन कय आस्थान कय दुख पहुँचावै वाला बयान राजनीतिक रूप से भी मुसकिल पैदा करी।
हिंया ई समझब जरूरी अहै कि द्रविड़ आंदोलन कय आपन ऐतिहासिक अउर सामाजिक पीठ-भूमि रही अहै। ओकर असली लड़ाई सामाजिक ऊंच-नीच अउर जाति के दबदबा के खिलाफ रही। मुदा जब सामाजिक सुधार कय बहस पूरे धरम या संस्कृति कय विरोध जइसन लागै लागत अहै, तब ओका जनता कय मंजूरी मिलना बंद होय लागत अहै। ई बात भी सच अहै कि बहुते विपेच्छी दल अपने आप कय सनातन कय विरोधी नाही, बल्कि सामाजिक बुराइन, जातिवाद अउर भेदभाव कय विरोधी बतावत हँइ। उनकर कहना अहै कि ओ सबइ सामाजिक नियाव अउर संविघान कय मूल्यन कय बात करत हँइ। ई नजरिया लोकतंत्र मा माने लायक अहै, काहे कि हर परम्परा मा अपने आप कय जाँचे अउर सुधारे कय जरूरत होत अहै। खुद भारतीय दर्शन मा भी बातचीत, बहस अउर आत्मचिंतन कय परम्परा रही अहै। बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, दयानंद अउर गांधी-सबइ समाज कय गड़बड़ियन पर सवाल उठाइन, मुदा ओ सबइ समाज कय तोड़े कय नाही, बल्कि सुधारे कय रास्ता चुनिन।
आफत तब आवत अहै जब राजनीतिक भासा आपन संतुलन खोइ देत अहै। जब आलोचना सुधार कय जगह नकारै कय भासा बनि जाइ, तब उ समाज मा ध्रुवीकरण कय जनम देति अहै। भारत जइसे अलग-अलग विचारन वाले देस मा ई बानि लोकतंत्र कय सेहत बरे नीक नाही कही जाइ सकत। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगवाई मा पाछिल दस बरिसन मा भारतीय राजनीति मा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अउर हिंदुत्व कय बात बहुत असरदार होय कय सोझे आयी अहै। राम मंदिर कय निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक, सांस्कृतिक धरोहरन कय फिर से सँवारे जइसे मुद्दन् से मनइन कय एक बड़े तबका मा सांस्कृतिक आतम-विस्वास मजबूत भवा अहै। ओसे भारतीय जनता पार्टी कय राजनीतिक फायदा भी मिला। दूसरी कइती विपेच्छी दल मनइन कय ई बदलत मिजाज कय समझै मा कई दाईं अचकचाने देखान। कहुँ ओ सबइ धरम-निरपेछता अउर आस्था के बीच संतुलन बनावै मा चूक कइ दिहिन, तउ कहुँ उनकर कुछु नेता लोगन कय बयान उनका मुसकिल मा डारि दिहिस। उत्तर प्रदेश से लै कय पच्छिम बंगाल तक चुनावी राजनीति मा ई देखा गवा कि अब खाली जाति कय समीकरण या पुराना वोट बैंक काफी नाही रहि गवा अहै। जनता सांस्कृतिक पहचान, विकास अउर देस कय मुद्दन् कय भी महत्त्व देय लागी अहै। अइसे मा जउ कउनो दल हिंदू आस्था के प्रति बेपरवाह देखात अहै, तउ ओकर राजनीतिक असर पड़ब तय अहै।
मुदा ई पूरी बहस कय दूसरा पच्छ भी अहै। का राजनीति कय मकसद खाली धरम कय पहचान पर वोट बटोरब होय क चाही? का देस के सोझे खड़ी बेरुजगारी, पढ़ाई-लिखाई, दवाई-बिरो, पर्यावरण, खेती-किसानी कय संकट, अमीरी-गरीबी कय खाई अउर आपसी भाईचारा कय टूटब जइसे सवाल पाछे छूट जाय क चाहीं? ई फिकर भी ओतने जरूरी अहै।
भारतीय राजनीति मा पाछिल कुछु बरिसन के बीच धरम, खास कइके सनातन अउर हिंदू आस्था कय लय कय कांग्रेस, सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक जइसे विपेच्छी दलन् अउर उनकर कुछु नेता लोगन कय दिहल बयानन कय आम जनता सनातन पर हमला या हिंदू भावनान कय अनदेखी के रूप मा देखिस, जेकर राजनीतिक असर भी सोझे आवा। मुदा ई बात कय खाली “हिंदू विरोध” बनाम “राजनीतिक विरोध” के रूप मा देखब काफी नाही होई। भारत एक लोकतांत्रिक अउर हर विचार कय आदर करय वाला देस अहै, जहाँ कउनो भी राजनीतिक दल कय सरकार, ओकर नीतियन या अगुआ कय विरोध करय कय पूर अधिकार अहै, मुदा जउ ई विरोध आस्था, संस्कृति अउर बहुसंख्यक समाज कय भावनान से टकराइ लागै, तउ ओकर राजनीतिक नुकसान उठावै कय पड़ि सकत अहै। इहै वजह अहै कि बहुते दलन् बरे ई बात चुनौती बनि गयी कि ओ सबइ सरकार के विरोध कय राजनीति करत-करत सांस्कृतिक अउर धार्मिक भावनान से दूर होय गइन। भारत मा सनातन खाली धरम कय पहिचान नाही अहै, बल्कि ई जीवन-दर्शन, रीति-रिवाज, संस्कृति, सहनशीलता अउर सभ्यता कय प्रतीक माना जात अहै, इही बरे ओकरे प्रति लापरवाही कय भासा या खराब ईसारा मनइन मा गुस्सा पैदा करत रहा अहै।
दूसरी कइती लोकतंत्र कय नीक परम्परा ई भी चाहत अहै कि राजनीतिक बहस मनइन, नीतियन अउर राज-काज के मुद्दन् पर रहे, न कि धरम कय नाँव पर बँटवारा करय पर। राजनीतिक दलन् बरे ई जरूरी अहै कि ओ सबइ मतभेद रक्खें, खिंचाई करैं, मुदा भारतीय समाज कय सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक संवेदनशीलता अउर आस्था कय आदर कय संतुलन बनाय रक्खें, काहे कि जनता आखिर मा उहै अगुआ कय स्वीकार करत अहै जे ओकर भावनान, परम्परा अउर देस कय मिजाज कय समझै कय कोसिस करत अहै। भारत कय राजनीति कय “धरम बनाम धरम” कय लड़ाई से ऊपर उठि कय “जनता बनाम जनता कय समस्या” के बहस कय कइती बढ़ै क चाही। राजनीतिक दलन् कय ई समझब होई कि जनता मंदिर भी चाहत अहै अउर रोजगार भी, आस्था भी चाहत अहै अउर अउसर भी, संस्कृति भी चाहत अहै अउर आधुनिकता भी। खाली धरम कय बँटवारा कउनो देस कय पक्का तरक्की कय आधार नाही बनि सकत।
आजु ई जरूरत अहै कि राजनीतिक दल सनातन विरोध या हिंदू विरोध जइसे आरोप-प्रत्यारोप कय राजनीति से बाहर निकरैं। जउ कउनो परम्परा मा सुधार कय बात करब अहै, तउ उ आदर वाली भासा अउर नीक नजरिया से होय क चाही। सामाजिक नियाव कय मतलब संस्कृति कय दुत्कारब नाही होय क चाही अउर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कय मतलब दूसर नजरिया कय खतम करब भी नाही होय क चाही। भारतीय सभ्यता कय ताकत ओकर विविधता अउर सहनशीलता रही अहै। हिंया शंकराचार्य भी हँइ, बुद्ध भी हँइ, महावीर भी हँइ, कबीर भी हँइ, वेद भी अहै अउर संविघान भी अहै। भारत हमेसा बातचीत कय लड़ाई से ऊपर रक्खेस अहै। इही बरे राजनीति कय भी ई जिम्मेदारी अहै कि उ समाज कय जोड़य वाली भासा बोलै।
आजु जब पूरी दुनिया लड़ाई-झगड़ा, सांस्कृतिक तनाव अउर पहिचान कय राजनीति से जूझत अहै, तब भारत के लगे “वसुधैव कुटुम्बकम्” कय संदेस अहै। इहै सनातन कय असली रूप भी अहै – सबका साथे लेब, दया अउर सहअस्तित्व। राजनीतिक दलन् कय अपने मन मा विचार करब होई कि ओ सबइ जनता कय कउन दिसा मा लय जाय चाहत हँइ – धरम कय टकराव कइती या देस बनावै कइती? जउ राजनीति खाली आस्था कय झगड़न् मा फँसी रही, तउ आम जिन्दगी कय असली सवाल पाछे छूटि जइहैं। मुदा जउ राजनीति संस्कृति कय आदर करत भवा विकास, पढ़ाई-लिखाई, दवाई-बिरो अउर सामाजिक भाईचारा कय केंद्र बनाई, तउ भारत एक संतुलित अउर मजबूत देस के रूप मा आगे बढ़ी। सनातन कय मतलब सदा रहय वाला अहै, अउर सदा उहै रहत अहै जे सबको साथे लय कय चलै। इही बरे कउनो भी तरह कय आँखि मूँदि कय विरोध या आँखि मूँदि कय समर्थन कउनो उपाय नाही होय सकत। जरूरत अहै समझदारी भरे नजरिया, संतुलित राजनीति अउर देस कय भलाई कय सबसें ऊपर रक्खै कय। भारतीय लोकतंत्र कय सयानापन इहै मा अहै कि उ आस्था कय आदर करै, मुदा राजनीति कय जनता कय भलाई कय जरिया बनावै। तभी लोकतंत्र भी मजबूत होई अउर समाज मा भी भाईचारा बनी।
– ललित गर्ग, लेखक, पत्रकार अउर स्तंभकार