संपादकीय

वैश्विक संकट के दौर मा दूरगामी सोच के परिणाम है प्रधानमंत्री क अपील

अइसन नाहीं है कि भारत विदेशी मुद्रा के मामला में कवनो संकट मा है, बल्कि हकीकत तौ ई है कि 10 अप्रेल, 2026 के आंकड़ा के बात करीं तौ भारत क विदेशी मुद्रा भण्डार आज सबसे ऊंच स्तर पर है। भारत के पास 700 बिलियन अमेरिकी डालर से जादे क विदेशी मुद्रा भण्डार है। एक मोट-मोटा अनुमान लगावा जाय तौ आवे वाला 11 महीना से जादे समय तक आयात क जरूरत ई पइसा से आसानी से पूरी होइ सकत है। विदेशी मुद्रा भण्डार मा एफसीए यानी कि विदेशी मुद्रा संपत्ति, सोना क भण्डार अउर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष मा आरक्षित पइसा पर्याप्त मात्रा मा उपलब्ध है। लेकिन ई सब के बावजूद अगर भविष्य मा आवे वाले संभावित संकट से निपटे क तैयारी समय रहते पूरी कइ ली जाय, तौ इसी के तौ दूरदर्शिता कहत हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क भविष्य के वैश्विक हालत साफ-साफ दिखात हैं। हालत सुधरे क संभावना निकट भविष्य मा तौ नाहीं दिखात है। अइसन मा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केवल एक साल खतिन अनावश्यक खर्चा मा कटौती करे क आग्रह देशवासीन से करे हैं। इसमें ईंधन बचाना, सोना ना खरीदब, विदेश यात्रा अउर विदेश मा शादी न करब, खाय वाले तेल के इस्तेमाल मा 10 प्रतिशत तक कटौती अउर खेती मा रासायनिक खाद के इस्तेमाल मा 50 प्रतिशत तक कटौती करे क सुझाव मुख्य है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के देशवासीन से कयिल आग्रह क लेइके आलोचक भले ही राजनीति करे क कोशिश करैं, लेकिन वैश्विक हालत आज सबके सामने है। देशवासीन का मालूम है कि पेट्रोलियम उत्पाद, जवने मा कच्चा तेल से लेइके गैस आदि शामिल है, खतिन हमका आयात पर जादे निर्भर रहेक पड़त है। देश मा 979 अरब अमेरिकी डॉलर क सालाना आयात होत है, जवने मा से करीब 38 प्रतिशत आयात सिर्फ अउर सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थन पर ही होत है। सोना-चांदी अउर इलेक्ट्रोनिक्स के साथ ही खाद के मामला मा भी विदेशन पर निर्भरता जादे है। लगभग 10 प्रतिशत पइसा सोना के आयात पर खर्च होत है। अगर कुल मिलाय के देखा जाय तौ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तेलंगाना के सिकन्दराबाद से देशवासीन से जवन आग्रह कीन है, ऊ कवनो तरह से देशवासीन खतिन मुसीबत वाला नाहीं है।

वैश्विक संकट के चलते देश-दुनिया की इकोनॉमी पर पड़ने वाले संभावित असर का देखत भये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क देशवासीन से ई दूरदर्शिता वाली अपील कोरोना काल क याद ताजा करत है, तौ कभूं-कभूं पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री के ओह समय के अन्न संकट के दौरान हफ्ता मा एक दिन के उपवास वाले आग्रह क याद दिलावत है। अमेरिका-इजरायल अउर ईरान युद्ध मा सीज़फायर क कवनो आसार अभी नाहीं दिखात है तौ दूसरी ओर दुनौ देशन की जिद के कारण हार्मुज जलडमरुमध्य से परिवहन बाधित होय के परिणाम दुनिया के देशन के सामने है। दुनिया के देशन का ई समझ लेएक पड़ि कि अमेरिका-ईरान युद्ध सिर्फ दुई-तीन देशन के बीच के युद्ध तक सीमित नाहीं है, बल्कि एकर असर से आज कवनो देश दूर-दूर तक अछूता नाहीं दिखात है। ई दुई देशन के अहंकार क लड़ाई नाहीं है, बल्कि ई हालत समूची मानवता का प्रभावित करे वाले हैं। आज दुनिया के देशन की एक-दूसर पर निर्भरता बढ़ी है। कवनो अउर देश के मदद के बिना कवनो भी देश अपने स्तर पर अपने देशवासीन की जरूरतन का पूरा करे क स्थिति मा नाहीं है। आर्थिक उदारीकरण के बाद से आज विश्व एक ‘विश्व ग्राम’ मा बदल गया है। एक बात ई भी साफ होय जाएक चाही कि आज अगर अमेरिका-इजरायल अउर ईरान संकट क हल निकल भी जाय, तब भी वैश्विक हालत सामान्य होय मा बहुत समय लाग जाई। युद्ध लड़त देश ई समझे क कोशिश नाहीं करत हैं कि उनके अहंकार के चलते दुनिया आज कई साल पीछे जात है। विकास रुकत है, आर्थिक गतिविधि प्रभावित होत है अउर हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़त ही जात हैं।

आज सबको मालूम है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते रास्ता जाम होय के कारण कच्चा तेल अउर प्राकृतिक गैस क आयात प्रभावित होत है। हार्मुज क रास्ता बन्द है। हालत क गंभीरता का ई बात से समझि सकत हैं कि ईरान का रोज 2800 करोड़ रुपया क कच्चा तेल समंदर मा बहावेक पड़त है। तेल उत्पादक अउर देश भी संकट से गुजरत हैं। अइसन मा जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल मा कमी लावब, सार्वजनिक परिवहन वाहनन के इस्तेमाल अउर ‘व्हीकल पूलिंग’ क एक साल क सुझाव या आग्रह दूरदर्शितापूर्ण अउर देशहित मा ही मानल जायक चाही। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनन के इस्तेमाल का बढ़ावा देब भविष्य के पर्यावरण संकट से बचाव अउर हरित ऊर्जा का बढ़ावा देवे मा ही मददगार होइ। अइसन ही हमारे देश मा सोना खरीदे के प्रति खास मोह रहत आया है, पर हालत का देखत भये व्यापक राष्ट्रहित मा अगर एक साल सोना ना खरीदीं तौ इससे कवनो फर्क नाहीं पड़े वाला है। अइसन ही सिर्फ दिखावा खतिन विदेश यात्रा करे से बचब अउर विदेश मा शादी करे के जगह स्थानीय पर्यटन अउर देश मा ही एक से बढ़कर एक बेहतरीन वेडिंग डेस्टिनेशंस पर शादी करे से खर्चा कम होइ, देश के जगहन क वैश्विक पहचान बढ़ी अउर विदेशी मुद्रा भी बची।

अइसन ही रासायनिक खाद के जादे इस्तेमाल से खेती अउर खेतन की उर्वरा शक्ति प्रभावित होय से आज देश जूझत है। जैविक खाद अउर जैविक खेती का बढ़ावा देवे पर जोर दीन जात है। अइसन मा रासायनिक खाद के इस्तेमाल का सीमित करे क आग्रह निश्चित रूप से सकारात्मक ही है। जहां तक मीटिंग्स क बात है, कोविड के बाद से सरकारी अउर गैर-सरकारी स्तर पर ज्यादातर मीटिंग्स अब हाइब्रिड मोड पर ही होय लागी हैं। ‘वर्क फ्रॉम होम’ का बढ़ावा जरूर दीन जा सकत है। सारांश ई है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जवन आग्रह देशवासीन से कीन है, उनमें से एक भी आग्रह अइसन नाहीं है जिससे हमारे रोजमर्रा के जीवन पर बुरा असर पड़त होय। एक भी बिंदु अइसन नाहीं है जिससे आम आदमी प्रभावित होत होय। सीधा-सीधा एक साल खतिन अपनी आदत अउर जरूरत मा जरूरी बदलाव करेक कहा जात है, ताकि वैश्विक संकट क असर देश की अर्थव्यवस्था अउर देश के आम लोगन का प्रभावित ही न कर सकै। एक साल सोना न खरीदब या ईवी वाहन या सार्वजनिक वाहन क इस्तेमाल करब या विदेश मा शादी अउर घूमब न करब से कवनो खास फर्क नाहीं पड़े वाला है। इसलिए इन सबसे बचब तौ देश वैश्विक हालत का जादे कुशलता से मुकाबला कर सकी अउर सबसे बड़ी बात कि स्वदेशी का बढ़ावा मिली। इसलिए आलोचना-प्रत्यालोचना से ऊपर उठैक पड़ि। ई देश नेता की एक आवाज पर आगे आवे वाला देश है, कोविड क समय अउर स्व. लालबहादुर शास्त्री के एक दिन के उपवास क आग्रह इसके साक्षात उदाहरण हैं।

– डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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