
पश्चिम बंगाल के राजनीति में पिछले कछ हफ्ता के भीतर जउने तेजी से घटनाक्रम बदलल है, ओसे तृणमूल कांग्रेस अउर ओकर संस्थापक ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य पर गंभीर सवाल खड़ा होइ गए हैं। कभों बंगाल के राजनीति पर मजबूत पकड़ रखे वाली तृणमूल कांग्रेस आज आपन सबसे बड़का संकट से गुजरत है। विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथ मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर लम्बें समय से सुलगत असंतोष अब खुला बगावत में बदल चुका है। महज 13 दिन के भीतर घटना के अइसन सिलसिला सामने आवा, जउने 28 बरिस पुरान पार्टी का विभाजन के कगार पर पहुँचाय दिहिस। हम रउआ याद दिला दी कि तृणमूल कांग्रेस के स्थापना ममता बनर्जी 1998 में कांग्रेस से अलग होके की रहीं। एकरे बाद ऊ वाम मोर्चा के लम्बें शासन के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा कीन अउर 2011 में ऐतिहासिक जीत हासिल कइके बंगाल के सत्ता पर कब्जा जमाई लिहीं। 2016 अउर 2021 के चुनाव में भी पार्टी बढ़िया प्रदर्शन कीन। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथ मिली हार पार्टी के राजनीतिक जमीन हिला दिहिस। सबसे बड़का झटका इ रहा कि ममता बनर्जी का आपन पारंपरिक गढ़ भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ हार का सामना करे का पड़ा। एकरे साथ ही विधानसभा में टीएमसी के संख्या घटके केवल 80 विधायक तक सिमट गई।
टीएमसी में दू फाड़ के इनसाइड स्टोरी
चुनाव में हार के बाद से ही पार्टी के भीतर नेतृत्व का लेके असंतोष बढ़े लाग रहा। बहुत से विधायक का लागे लाग कि संगठन अउर निर्णय लेवे के प्रक्रिया में सांसद अभिषेक बनर्जी के प्रभाव लगातार बढ़त जात है। पार्टी के भीतर इ धारणा मजबूत होवे लागी कि तृणमूल के केंद्र धीरे-धीरे एक परिवार तक सीमित होत जात है। छह मई का नवनिर्वाचित विधायक के बैठक में ममता बनर्जी द्वारा अभिषेक बनर्जी के लिए खड़ा होके ताली बजाय के आग्रह कइल, इ असंतोष का अउर बढ़ावे वाला साबित भयल। पार्टी में मतभेद पहली बार खुलके 19 मई का सामने आवा, जब रिताब्रता बनर्जी अउर संदीपन साहा पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा दिहिन। ऊ लोग पूछिन कि चुनाव से हटे के घोषणा करे वाले विधायक जहांगीर खान के खिलाफ कार्रवाई काहे ना भयल? चूँकि जहांगीर का अभिषेक बनर्जी के करीबी मानल जात रहा, इहे कारन है कि एकरा सीधे तौर पर अभिषेक के प्रभाव का चुनौती मानल गयल। एकरे बाद घटना तेजी पकड़ ली।
22 मई का दिल्ली के बंग भवन में रिताब्रता बनर्जी अउर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के कथित मुलाकात राजनीतिक हलका में हलचल मचा दिहिस। रिताब्रता बाद में विपक्षी नेता का प्रशासनिक बैठक में बोलावे के शुभेंदु अधिकारी के फैसला के सार्वजनिक सराहना कइलन। एकरे बाद तृणमूल के भीतर संदेह अउर गहराय गयल। 25 मई का विवाद एक नया मोड़ लिहल, जब विधायक दल के नेतृत्व से जुड़ल दस्तावेज पर जाली हस्ताक्षर कइला के आरोप सामने आवा। रिताब्रता बनर्जी अउर संदीपन साहा विधानसभा अध्यक्ष से एकर औपचारिक शिकायत कइलन। मामला पुलिस अउर सीआईडी जांच तक पहुँच गयल। एकरे साथ ही पार्टी के भीतर के असंतोष खुला राजनीतिक लड़ाई में बदल गयल। स्थिति तब अउर गंभीर होय गई जब 30 मई का अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर में हमला भयल। हालांकि सब दल एकर निंदा कइलन, लेकिन तृणमूल के भीतर जइसन एकजुटता के उम्मीद रही, ऊ ना देखाय। एकसे साफ संकेत मिलल कि नेतृत्व अउर विधायक के एक हिस्सा के बीच दूरी बढ़ चुकी है।
31 मई का ममता बनर्जी आपन कालीघाट आवास पर बैठक बोलाइलन, लेकिन ओमें कम उपस्थिति इ साफ कर दिहिस कि पार्टी पर उनकर पकड़ कमजोर पड़त है। आखिरकार एक जून का पार्टी रिताब्रता बनर्जी अउर संदीपन साहा का निष्कासित कर दिहिस। लेकिन इ कदम बगावत रोके के बजाय ओका अउर तेज करे वाला साबित भयल। बागी खेमा आपन मुहिम का “ऑपरेशन क्राउन प्रिंस” नाम दिहल, जवने का अभिषेक बनर्जी के बढ़त प्रभाव के खिलाफ अभियान के रूप में देखल गयल। बुधवार का इ संकट निर्णायक मोड़ पर पहुँच गयल, जब 58 विधायक विधानसभा अध्यक्ष का पत्र सौंपके रिताब्रता बनर्जी का विधायक दल के नेता चुने के जानकारी दिहिन। विधानसभा अध्यक्ष इ दावा का स्वीकार कर लिहन। एकरे साथ ही बागी गुट का तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई। इ ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन के अब तक के सबसे बड़का चुनौती मानल जात है।
राजनीतिक विश्लेषक मानत हैं कि तृणमूल कांग्रेस के सबसे बड़का कमजोरी ओकर स्पष्ट वैचारिक आधार ना होब रहा है। वाम विरोध के राजनीति पार्टी का सत्ता तक पहुँचायस, लेकिन सत्ता मिलला के बाद संगठनात्मक एकता कमजोर पड़त गई। अब जब चुनावी हार पार्टी के ताकत कम कर दिहिस है, तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा अउर उत्तराधिकार के लड़ाई खुलके सामने आ गई है। फिर भी ममता बनर्जी का राजनीति से बाहर मानल जल्दबाजी होई। बंगाल के राजनीति में उनकर संघर्ष, जनाधार अउर राजनीतिक अनुभव अभी भी उनका एक मजबूत नेता बनावत है। लेकिन इहो सच है कि तृणमूल कांग्रेस अब आपन इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजरत है अउर आवे वाले समय में इ तय होई कि पार्टी इ संकट से उबर पाई या बंगाल के राजनीति में एक नया अध्याय के शुरुआत होई।
-नीरज कुमार दुबे